spot_img
रविवार, अप्रैल 11, 2021
More
    spot_imgspot_img
    spot_img

    incab-industries-वर्षों से बंद पड़ी केबुल कंपनी में कानूनी लड़ाई का दिन रहा गुरुवार, कलकत्ता हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी, एनसीएलएटी में न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखा

    Advertisement
    Advertisement

    जमशेदपुर : जमशेदपुर में वर्षों से बंद पड़े केबुल कंपनी (इंकैब इंडस्ट्रीज) के मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय में टाटा स्टील लिमिटेड द्वारा इन्कैब इंडस्ट्रीज लिमिटेड की सुरक्षित देनदारियों (त्रृणों) को आईसीआईसीआई बैंक, एक्सिस बैंक और एसेट रीकंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा गैरकानूनी तरीके से प्राईवेट कंपनियों (कमला मिल्स, फस्का इन्वेस्टमेंट, पेगाशस एसेट रिकन्सट्रक्शन) को सौंप देने के खिलाफ कलकत्ता उच्च न्यायालय में 2018 में दायर रिट पिटीशन नंबर 14251, 14253 और 15541 में बुधवार को कमला मिल्स की बहस पूरी हो गयी. अगली सुनवाई 13.05.2021 को होगी, जिसमें टाटा स्टील की ओर से वरीय अधिवक्ता एस कुंडू अपनी बहस समाप्त करेंगे. उसके बाद अदालत अपना निर्णय लेगी. कमला मिल्स के अधिवक्ता ने फिर से कहा कि आईसीआईसीआई बैंक लिमिटेड (2010 10 एससीसी1) में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में बैंकों द्वारा अपनी गैरनिष्पादित त्रृणों को प्राईवेट कंपनियों को बेचने पर रोक नहीं लगायी है. उन्होंने यह भी कहा कि खरदा कंपनी (एआइआर 1962 एससी 1810) मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा फैसला भी उन पर लागू नहीं होता है. उन्हें बैंकों ने संपत्ति स्थानांतरण अधिनियम, 1882 की धारा 6 के तहत अपने गैरनिष्पादित त्रृणों की बिक्री की है. उन्होंने यह भी कहा कि रिजर्व बैंक के 13.07.2005 और 28.06.2019 के नोटिफिकेशन केवल बैंकों और संपत्ति पूनर्निमाण कंपनियों पर लागू हैं प्राईवेट कंपनियों पर नहीं. ज्ञातव्य है कि जमशेदपुर कर्मचारियों के अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव ने अदालत में कहा था कि 1993 से पहले और उसके बाद 2002 तक बैंक अपनी गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) का प्रतिभूतिकरण नहीं कर सकती थी. वे अपने त्रृणों की वसूली के लिए दीवानी अदालत या कंपनी के परिसमापन के लिए कंपनी कोर्ट जा सकती थी. 1993 में त्रृण वसूली न्यायाधीकरण अधिनियम के तहत त्रृण वसूली न्यायाधीकरण की स्थापना हुई और इस त्रृण वसूली न्यायाधिकरण को गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) पर निर्णय देने का पूर्ण अधिकार मिला. उन्होंने आगे बताया कि 2002 में पहली बार नये कानून वित्तीय परिसंपत्तियों का सुरक्षितिकरण और पुनर्निर्माण अधिनियम, 2002 (सिक्यूरिटाइजेशन व रिकंस्ट्रक्शन ऑफ फाइनांसियल एसेट व इनफोर्समेंट ऑफ सिक्यूरिटी इंटरेस्ट एक्ट 2002) के तहत बैंकों को अपनी गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के प्रतिभूतिकरण (सिक्यूरिटीज) करने की व्यवस्था नये अधिनियम में की गयी. इस अधिनियम के तहत परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी (एआरसी) के रिजर्व बैंक से पंजीकरण की व्यवस्था की गयी. ये कंपनियां बैंकों के गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) को खरीद सकती हैं और बैंकों से त्रृण लेने वाली कंपनियों से कानूनी प्रक्रिया द्वारा वसूली कर सकती हैं. अधिवक्ता ने आगे बताया कि 2002 से 2005 तक केवल परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियाँ ही बैंकों की गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) खरीद सकती थी. उन्होंने आगे कहा कि 13.07.2005 से रिजर्व बैंक ने बैंकों को भी दूसरे बैंकों से उनकी गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) को खरीदने और उसे कानूनी प्रक्रिया द्वारा वसूलने का अधिकार दिया पर 2019 तक परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियों को बैंकों की गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) को दूसरी परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियों को बेचने को मंजूरी नहीं दी. यह मंजूरी केवल 28.06.2019 से दी गयी. उन्होंने आगे कहा कि बैंकों की गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के प्रतिभूतिकरण और निष्पादन का कानून यहीं तक है. इसमें प्राईवेट कंपनियों को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है. ज्ञातव्य है कि कमला मिल्स और उसकी सहायक कंपनियों और पेगासस एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी ने इंकैब कंपनी के बैंकों की गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (NPAs) को गैरकानूनी ढंग से 2006 में अपने नाम कर लिया और उन्होंने एनसीएलटी में 21.63 करोड़ की जगह 2339 करोड़ का दावा ठोक दिया. इतना ही नहीं इन प्राईवेट कंपनियों ने बैंकों की इन्हीं गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के असाईन्मेन्ट का दावा कर गैरकानूनी तरीके से एनसीएलटी में लेनदारों की कमिटी में शामिल होकर फर्जीवाड़ा कर एनसीएलटी में एक आवेदन देकर इंकैब कंपनी के परिसमापन का आदेश पारित करा लिया. ज्ञातव्य है कि पिछली बहस में अधिवक्ता ने कलकत्ता उच्च न्यायालय को बताया था कि उच्च न्यायालय, दिल्ली ने अपने 06.01.2016 के आदेश में टाटा स्टील को इंकैब कंपनी का अधिकार संभालने को कहा था और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने सभी देनदार बैंकों के कंसोर्शियम के कस्टोडियन की हैसियत से इंकैब कंपनी से पूर्ण और अंतिम भुगतान के रूप 21.63 करोड़ रूपया लेना स्वीकार किया था. उन्होंने बताया कि उक्त आदेश में बैंकों की सुरक्षित देनदारियों को प्राईवेट कंपनियों को सौंपने की कोई बात नहीं है. दिल्ली उच्च न्यायालय के इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय ने 01.07.2016 अपने के फैसले में सही भी ठहरा दिया तो कमला मिल्स, फस्का इंवेस्टमेंट और पेगासश एसेट रिकंस्ट्रक्शन जैसी प्राईवेट कंपनियाँ, बैंकों द्वारा अपनी सुरक्षित देनदारियों को इन्हें सौंप देने का दावा कैसे कर सकती हैं? उन्होंने आगे बताया था कि दिल्ली उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के उक्त दोनों आदेशों के आधार पर इन प्राईवेट कंपनियों का कोई दावा इंकैब कंपनी पर नहीं बनता है. उन्होंने अदालत को सूचित किया था कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने 06.01.2016 के अपने उक्त आदेश द्वारा इंकैब की देनदार बैंकों की कुल सुरक्षित देनदारियों को जहां 21.63 करोड़ रूपये पक्का कर दिया था. वही आज कमला मिल्स, पेगासश और फस्का जैसे फर्जी दावेदारों द्वारा एनसीएलटी में उसे अविश्वसनीय तरीके से बढ़ा कर 2339 करोड़ रूपये का दावा किया गया है. इससे यह पता लगता है कि इंकैब कंपनी, इसके मजदूरों, कर्मचारियों और तमाम हितधारकों के खिलाफ कितनी बड़ी धोखाधड़ी इन प्राईवेट कंपनियों द्वारा की गयी है. अधिवक्ता ने अदालत को यह भी बताया था कि दस्तावेजों को देखने पर पता चलता है कि आईसीआईसीआई बैंक ने एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी को इंकैब की अपनी सुरक्षित देनदारियां सौंप दी, जो कानूनन सही था पर एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी ने इन सुरक्षित देनदारियों को रमेश घमंडीराम गोवानी की कंपनी आर आर केबल्स को सौंप दिया जिसने फिर उसी रमेश घमंडीराम गोवानी की दूसरी कंपनियों-कमला मिल्स और फस्का इनवेस्टमेंट नामक की कंपनियों को बेच दिया. फिर एक्सिस बैंक ने इंकैब की अपनी सुरक्षित देनदारियों को पेगासश एसेट रिकंस्ट्रक्शन नाम की कंपनी को बेच दिया जबकि एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी 28.06.2019 तक इन सुरक्षित देनदारियों को तो दूसरी किसी एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी को भी नहीं बेच सकती थी. इंकैब कर्मचारियों की तरफ से सुनवाई में कलकत्ता उच्च न्यायालय में अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव और आकाश शर्मा ने हिस्सा लिया.
    एनसीएलटी के आदेश के खिलाफ अपीलीय न्यायधिकरण में हुई सुनवाई
    गुरुवार को ही एनसीएलटी द्वारा 07.02.2020 को इंकैब इंडस्ट्रीज लिमिटेड के खिलाफ दिये गये परिसमापन आदेश के खिलाफ दिल्ली स्थित अपीलीय न्यायाधीकरण में इंकैब इंडस्ट्रीज के मजदूरों द्वारा दायर अपील पिटीशन पर सुनवाई हुई. बहस की शुरुआत करते हुए कोलकाता के मजदूरों के अधिवक्ता ऋषभ बनर्जी ने कहा कि कमला मिल्स के मालिक और निदेशक रमेश घमंडीराम गोवानी इंकैब इंडस्ट्रीज के भी निदेशक रहे हैं. अतः कमला मिल्स और फस्का इन्वेस्टमेंट लेनदारों की समिति (कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स) के सदस्य नहीं हो सकते. यह बात परिसमापन शशि अग्रवाल को पूरी तरह पता था और उन्होंने रमेश घमंडीराम गोवानी को इससे अवगत भी करा दिया था कि कमला मिल्स और फस्का इन्वेस्टमेंट संबंधित पार्टियां हैं. अतः वे (लेनदारों की समिति (कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स) के सदस्य नहीं हो सकते हैं पर एमवी साह जिन्हें रमेश घमंडीराम ने इंकैब कंपनी का निदेशक बनवाया था, ने बंबई उच्च न्यायालय में एक हलफनामे द्वारा इस बात का खुलासा कर दिया कि परिसमापक शशि अग्रवाल की रमेश घमंडीराम गोवानी और उनकी पत्नी के साथ दो बार मुलाकात हुई और उसके बाद परिसमापक शशि अग्रवाल के साथ मिलकर रमेश घमंडीराम गोवानी ने कमला मिल्स और फस्का इन्वेस्टमेंट को लेनदारों की समिति का सदस्य बनाकर एनसीएलटी में लेनदारों की फर्जी समिति द्वारा एक फर्जी आवेदन देकर धोखाधड़ी से इंकैब कंपनी के परिसमापन का आदेश पारित करवा लिया. उन्होंने कहा कि परिसमापक शशि अग्रवाल रमेश घमंडीराम गोवानी का एजेंट है और उसने बहुत बड़ा फर्जीवाड़ा किया है इसे तुरंत हटाना चाहिए. उन्होंने कहा कि न केवल कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स का गठन गलत हुआ है बल्कि कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स ने परिसमापक के साथ साजिश कर इंकैब कंपनी के परिसमापन का रिजोल्यूशन पारित कर लिया और एडजुडिकेटिंग ऑथोरिटी, एनसीएलटी ने स्थापित कानूनों की अवहेलना कर कंपनी का गैरवाजिब परिसमापन आदेश पारित कर दिया. उन्होंने अपीलीय न्यायाधीकरण से उक्त आदेश को रद्द करने की मांग की. उन्होंने यह भी कहा कि बैंकों का अपनी देनदारियों को प्राईवेट कंपनियों को बेचना गलत है. जमशेदपुर के मजदूरों के अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव ने बहस का समापन करते हुए कहा कि उन्होंने कहा कि लेनदारों की समिति (कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स) और परिसमापक शशि अग्रवाल के अधिवक्ताओं ने अदालत को गुमराह किया है और इन्होंने अपनी पूरी बहस में रमेश घमंडीराम गोवानी का बचाव किया है और यह साबित करने की कोशिश की है रमेश घमंडीराम गोवानी इंकैब कंपनी का निदेशक नहीं रहा है जबकि रमेश घमंडीराम गोवानी ने इन दोनों अधिवक्ताओं को कोई वकालतनामा नहीं दिया है. उन्होंने कहा अपीलीय न्यायाधीकरण में वरीय अधिवक्ताओं को झूठ बोलते देखना दयनीय स्थिति है. उन्होंने एनसीएलटी के 07.02.2020 आदेश के अनुच्छेद 72 का जिक्र करते हुए कहा कि एनसीएलटी ने अपने आदेश में यह लिखा है कि रमेश घमंडीराम गोवानी ने इंकैब कंपनी की संपत्तियों से होने वाली आय, किराये और पुणे की विनिर्माण इकाई से होने वाली आय को हिसाब किताब में नहीं दिखाया है और सारे पैसे हड़प लिये हैं. इस मामले में हमें यह निर्देशित करने में कोई हिचक नहीं है कि परिसमापक शशि अग्रवाल उसकी जांच करेंगे और उसकी रपट माननीय एनसीएलटी को सौंपेंगे. उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि अगर रमेश घमंडीराम गोवानी इंकैब का निदेशक नहीं रहा है तब उसने इंकैब के पैसे कैसे हड़प लिये? उन्होंने अपीलीय न्यायाधीकरण को बताया कि परिसमापक शशि अग्रवाल ने एनसीएलटी के उक्त आदेश के बाद भी न तो इसने इंकैब के पैसे हड़पे जाने की जांच की न ही एनसीएलटी को कोई जांच रपट सौंपी जबकि इस आदेश को पारित किये हुए एक वर्ष से ज्यादा हो गया. उन्होंने कहा की वरीय अधिवक्ता श्री दत्ता ने अदालत में सरेआम झूठ बोला है क्योंकि इसी परिसमापक शशि अग्रवाल ने एनसीएलटी को यह बताया था कि रमेश घमंडीराम गोवानी ने इंकैब के तथाकथित निदेशकों की एक फर्जी बैठक द्वारा इंकैब कंपनी की पुणे में स्थित 50 करोड़ के दो फ्लैटों को दो करोड़ से भी कम में खुद को बेच दिया. उन्होंने आगे कहा कि इस परिसमापक शशि अग्रवाल ने एनसीएलटी में आवेदन देकर उस हस्तांतरण को रद्द करने की मांग नहीं की बल्कि एनसीएलटी को सिर्फ इतल्ला दिया इससे यह स्पष्ट है कि परिसमापक शशि अग्रवाल व रमेश घमंडीराम गोवानी के आर्थिक हितों के पक्ष में और इंकैब इंडस्ट्रीज कंपनी के आर्थिक हितों के खिलाफ काम करता रहा है. इसके साथ ही अपीलीय न्यायाधीकरण ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया. न्यायाधीकरण ने अधिवक्ताओं से संक्षेप में अपनी अपनी जिरह की ब्रिफ देने को कहा. कर्मचारियों की तरफ से उक्त सुनवाई में अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव, संजीव मोहंती, चन्द्रलेखा और आकाश शर्मा ने हिस्सा लिया.

    Advertisement
    Advertisement

    Advertisement
    Advertisement

    Leave a Reply

    This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

    spot_imgspot_img

    Must Read

    Related Articles

    Don`t copy text!