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sir-dorabji-tata-birthday-सर दोराबजी टाटा-एक पुत्र, जिसने अपने पिता के सपने को साकार किया, अगर सर दोराबजी नहीं होते तो टाटा स्टील नहीं बनता, जमशेदपुर का अस्तित्व नहीं होता, ओलंपिक में भारतीय टीम को पहली बार भेजने वाले यहीं शख्स थे, जानें उनकी जीवनी

सर दोराबजी टाटा की फाइल तस्वीर.

जमशेदपुर : टाटा स्टील आज बड़ी कंपनी है जबकि जमशेदपुर अग्रणी शहर में एक है, लेकिन हकीकत यह है कि अगर सर दोराबजी टाटा नहीं होते तो ना तो जमशेदपुर बस पाता, ना कंपनी लग पाती और ना ही भारत ओलंपिक तक का सफर शुरू कर पाता क्योंकि इन सबके पीछे सर दोराबजी टाटा की भूमिका अहम रही. भले ही जमशेदजी नसरवानजी टाटा ने इसका सपना देखा था और उसकी प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन टाटा स्टील की स्थापना के अपने पिता के देखे गये सपने को साकार सर दोराबजी टाटा ने किया और आज यह कंपनी और यह जमशेदपुर विश्व में अपना नाम बना चुका है. सर दोराबजी टाटा जमशेदजी नसेरवानजी टाटा और हीराबाई टाटा के ज्येष्ठ पुत्र थे. उनका जन्म 27 अगस्त, 1859 को मुंबई (तब बम्बई) में हुआ था. (नीचे पूरी खबर पढ़ें)

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सर दोराबजी टाटा और उनकी पत्नी मेहरबाई टाटा की फाइल तस्वीर.

उनकी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई के प्रोप्राइटरी हाई स्कूल में हुई थी. बाद में उन्होंने केंट, इंगलैंड में निजी शिक्षा प्राप्त की. 1879 में वे भारत वापस लौटे और सेंट जेवियर्स कॉलेज, मुंबई से आर्ट्स में स्नातक की डिग्री हासिल की. स्नातक के बाद 1884 में उन्होंने अपने पिता की कंपनी के कॉटन डिवीजन में काम करना शुरू किया. 1897 में एक पारसी व मैसूर राज्य के पहले भारतीय ’इंस्पेक्टर-जनरल ऑफ एजुकेशन‘ डॉ. होरमुसजी भाभा की पुत्री लेडी मेहरबाई टाटा के साथ उनका विवाह हुआ. उनका कोई बच्चा नहीं था. ये सर दोराबजी टाटा ही थे, जिन्होंने 1907 में भारत की पहली एकीकृत इस्पात कंपनी (टिस्को, वर्तमान टाटा स्टील), 1910 में एक हाइड्रो इंलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट (टाटा पॉवर) और 1911 में एक रिसर्च इंस्टीट्यूट (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस) की स्थापना कर अपने पिता के सपने को अमलीजामा पहनाया. (नीचे पूरी खबर पढ़ें)

सर दोराबजी टाटा के साथ मीटिंग करते जमशेदजी नसरवानजी टाटा व अन्य.

सर दोराबजी एक उत्साही खिलाड़ी थे. वे एक उम्दा टेनिस खिलाड़ी, एक विशेषज्ञ रोवर और शानदार घुड़सवार थे. वे कैम्ब्रिज फुटबॉल और टेनिस टीमों के सदस्य थे. सर दोराबजी टाटा ने ही ओलंपिक खेलों में भारत का परिचय कराया, जब उन्होंने एंटवर्प ओलंपिक गेम्स, 1920 में हिस्सा लेने के लिए चार एथलीटों और दो पहलवानों का चयन किया और उन्हें वित्त पोषित किया. उन्होंने पेरिस में 1924 के ओलंपियाड में भारत का प्रवेश सुनिश्चित करने में अग्रणी भूमिका निभायी, जिसके बाद उन्हें इंटरनेशनल ओलंपिक कमिटी का सदस्य चुना गया। वे भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष भी रहे. 1931 में ल्यूकेमिया के कारण लेडी मेहरबाई टाटा की मृत्यु हो गई. उनकी मृत्यु के बाद, सर दोराबजी टाटा ने रक्त संबंधी बीमारियों के अध्ययन को आगे बढ़ाने के लिए लेडी टाटा मेमोरियल ट्रस्ट की स्थापना की. सर दोराबजी टाटा ने परोपकार के उद्देश्य से एक ट्रस्ट की स्थापना की और इस ट्रस्ट के लिए तीन करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति उपलब्ध करायी. 3 जून, 1932 में सर दोराबजी टाटा ने बैड किसिंजर, जर्मनी में अंतिम सांस ली. उन्हें ब्रूकवुड क्रीमेट्री, वर्किंग, इगलैंड में उनकी पत्नी लेडी मेहरबाई टाटा के साथ दफनाया गया. ब्रिटिश भारत में उद्योग के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए 1910 में सर दोराबजी टाटा को नाइट की उपाधि ने नवाजा गया. टाटा स्टील ने सर दोराबजी टाटा को उनकी 162वीं जयंती पर याद किया.

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