TATA STEEL INTERVIEW : टाटा स्टील के प्रेसिडेंट आनंद सेन ने रिटायरमेंट के पहले साझा किये अपने अनुभव, कहा-किसी को बताना मत, क्योंकि मैं बहुत अच्छा मेटलर्जिस्ट नहीं था, एमबीए करना मुश्किल था, जानिये आनंद सेन क्या सोचते थे, यह प्रबंधन सीखने वाले जरूर पढ़े

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आनंद सेन का शानदार कैरियर, एक नजर में :

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1981-स्नातक प्रशिक्षु
1991-मैनेजर, मार्केटिंग डिवीजन
1993- डिप्टी मार्केटिंग मैनेजर, मार्केटिंग डिवीजन
1995- सेल्स मैनेजर, मार्केटिंग डिवीजन
1996- एरिया सेल्स मैनेजर, दिल्ली
1997-सीनियर मार्केटिंग मैनेजर, फ्लैट प्रोडक्टस
1999- असिस्टेंट जनरल मैनेजर, मार्केटिंग
2000- चीफ मार्केटिंग
2001- चीफ, स्ट्रैटेजिक प्लानिंग एंड कारपोरेशन मार्केटिंग
2001- चीफ, एमएंडएस, फ्लैट प्रोडक्टस्
2004- वाइस प्रेसिडेंट, फ्लैट प्रोडक्टस
2008- वाइस प्रेसिडेंट, टीक्यूएम एंड फ्लैट प्रोडक्टस
2010- वाइस प्रेसिडेंट, टीक्यूएम एंड शेयर्ड सर्विसेज
2012- वाइस प्रेसिडेंट, टीक्यूएम एवं केपीओ
2013- वाइस प्रेसिडेंट,टीक्यूएम एवं स्टील बिजनेस
2013- प्रेसिडेंट, टीक्यूएम एंड स्टील बिजनेस

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जमशेदपुर : टाटा स्टील में प्रेसिडेंट टीक्यूएम एंड स्टील बिजनेस आनंद सेन एक अक्तूबर से सेवानिवृत हो रहे है. वे पहले प्रेसिडेंट है, जिनको कंपनी के इस पद पर आसीन किया गया. आनंद सेन ने अपना उत्कृष्ट कार्यकाल पूरा किया है. आनंद सेन का शानदार कैरियर रहा है. वे एक तल्ख अधिकारी के रुप में जाने जाते है, लेकिन उनके कैरियर के कई अनछुए पहलु है. हाल की में एक अनौपचारिक बातचीत के क्रम में आनंद सेन ने टाटा स्टील में अपने कैरियर से जुड़े कई पहलुओं पर प्रकाश डाला. उन्होंने अपनी सुखद यादों से लेकर कंपनी के साथ अच्छे संबंध समेत विभिन्न विषयों पर बातचीत की. इसे टाटा स्टील ने अपने इन हाउस मैगजिन में छापा है, जिसको साभार हम लोग छाप रहे है.

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सवाल : आपकी पहली नौकरी टाटा स्टील में थी, जब आप 1981 में टाटा स्टील से जुड़े थे, सही है न ?
आनंद सेन : मैं सबसे पहले 1981 में पुणे में टेल्को में शामिल हुआ था. लेकिन मैं वहां केवल डेढ महीने ही रहा. जब मैं टाटा स्टील में शामिल हुआ, तो मैं स्पष्ट था कि मुझे एक तकनीकी व्यवसायिक क्षेत्र में काम करना है. मेरे पास कोई आइडिया नहीं था कि मैं वहां कैसे पहुंचू. हर साल आइआइएम की प्रवेश परीक्षा में बैठता था. यह विचार था कि एमबीए कर लूं और एक वाणिज्यिक भूमिका के लिए कोशिश करूं. किसी को बताना मत, क्योंकि मैं बहुत अच्छा मेटलर्जिस्ट नही था, इसीलिए मुझे इस तरह की चीजें करनी पड़ी.
सवाल : तब आपने अपना एमबीए पूरा कर लिया ?
आनंद सेन
: हर बार कुछ न कुछ हुआ और मैं जाते-जाते रह गया. मैं चार बार आइआइएम में गया. जब अवसर आया, मैं एक एप्लीकेशन इंजीनियर बन गया और फिर अपने एमबीए दो साल के अध्ययन अवकाश के अलावा मैंने मार्केटिंग और सेल्स में लगभग 20 वर्षो का समय दिया. (श्री सेन आइआइएम कोलकाता से मार्केटिंग में पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया और इंसीड फ्रांस में सीईडीईपी से एग्जीक्टूटिव एमबीए भी किया है)
सवाल : आपका कैरियर लंबा व शानदार रहा और कई पुरस्कार व सम्मान भी मिले. इसमें श्रेष्ठ क्या रहा ?
आनंद सेन
: मैं ईमानदारी से कह सकता हूं कि पुरस्कार किसी भी चीज का मापक नहीं है. मुझे आइआइटी खड़गपुर का डिस्टिग्विश्ड अलम्नस अवार्ड (सम्मानित पूर्व छात्र) प्राप्त हुआ. जो अन्य पुरस्कारों की तुलना में मेरे लिए अधिक मूल्यवान है. अन्यथा, यह आम तौर पर काफी सामान्य कैरियर रहा. इस तरह देखे तो मैंने साधारण चीजें अच्छी तरह से की. यह मौलिक रुप से यही कहना चाहूंगा कि इतमें लंबे समय तक हम कैसे बने रहे. देखिए नौकरी में अच्छा वेतन मिला. कोई दबाव नहीं था. हमारे पास अच्छे लोग थे, एक शांतिपूर्ण जी‌‌‌‌वन था. ऐसे में आप टाटा स्टील के अलावा और कहां काम करेंगे.
सवाल : आपको किस क्षण का गर्व है ?
आनंद सेन
: श्री बी मुथुरमन के तहत कार्य करने का समय था. जब बाजार के गिरने के बाद चीजें काफी कठिन थी. मुझे समस्या पर ध्यान देने के लिए कहा गया था र हमने कुछ बेहतरीन चीजें की. जिसमें कंपनी की ब्रांडेड उत्पादों और वितरण, मोटर वाहन बाजार में लगातार वृद्धि, टीओसी के माध्यम से सप्लाई चेन इंटरवेशन की यात्रा शामिल रही. 1991 से पहले स्टील की मार्केटिंग और बिक्री इस तरह नहीं होती थी कि क्योंकि मूल्य निर्धारण, जिसे आप बेंचेगें, आप कितना बेचेगें आदि जैसे अधिकांश मापदंडों को संयुक्त संयंत्र समिति द्वारा निर्धारित किया जाता था, लेकिन हम एक विशेष स्टील ग्रुप थे. इसीलिए प्रथम दिन से हम ग्राहक केंद्रित हो गए. हमे अपने ग्राहकों को पंसदीदा आपूर्तिकर्ता बनने के लिए जो कुछ भी करने की आवश्यकता थी, वह करना था. हम भाग्यशाली थे कि हम ऐसा कर पाए, और फिर निश्चित रुप से गुणवत्ता को लेकर मेरा खास जुनून है, जो हमारे डेमिंग प्राइजेज, टीक्यूएम आदि से परिलक्षित है.
सवाल : आपने कभी कोई जागरुक कैरियर निर्णय लिया ?
आनंद सेन : सच कहूं, तो मैंने कभी भी कैरियर का निर्णय नहीं लिया. सिर्फ पहलेवाले को छोड़कर, जब मैंने महसूस किया कि मैं मार्केटिंग और सेल्स में जाना चाहता हूं. मुझे लगता है कि हम अक्सर ओवर प्लान करते है और अवसरों का विशलेषण करते है. यह भी देख ले कि क्या यह आपके दीर्घकालिक लक्ष्य संरेखित है. बाकी आप अपना रास्ता खुद बना लेंगे.
सवाल : कंपनी ज्वाइन करने वालों के लिए आप की क्या सलाह है?
आनंद सेन : वह चीज जिस पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है. वह यह है कि खुद को समझना और अपनी ताकत और गुणों को समझना. उतना ही महत्वपूर्ण यह समझना भी है कि आप किस चीज के बारे में भावुक है. यह सिर्फ बॉक्सेज में टिक लगाने वाली बात नही है. यह उन गुणों पर जोर देने के बारे में है कि जिसमें आप अच्छे हो, खासकर यदि आप समान चीजों के बारे में कुछ भावुक है. यदि आप किसी चीज में अच्छे है और इसके बारे में भावुक भी है, तो सफलता की संभावना नाटकीय रुप से बढ़ जाती है. आपको यह भी अच्छी समझ लेनी चाहिए कि कंपनी आपको कैसे दिखती है. कंपनी लगातार मूल्यांकन कर रही है. निर्णयकर्ता हमेशा देख रहे है. ऐसे में यदि आप कुछ यादें बनाते है, मान ले एक साल काम करने के दौरान यदि आपने अपने प्रभाव क्षेत्र में कुछ 2-3 बड़ी यादें बनायी है तो यह शानदार है.
सवाल : आप अपने प्रदर्शन का मूल्यांकन कैसे कर सकते है ?
आनंद सेन : प्रत्येक दिन के अंत में आपको अपने आप से दो प्रश्न पूछने चाहिए. क्या मैंने आज कंपनी में कुछ मूल्यवर्दन किया? इस प्रश्न का उतर देने से आपको कंपनी में बने रहने के अपने अधिकार की समझ मिलती है. दूसरा सवाल है क्या कंपनी ने मेरा मूल्यवर्दन किया. क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता है तो आप एक व्यक्ति के रुप में विकसित नहीं हो पा रहे है. एक अधिक सक्षम व्यक्ति नहीं बन सकते है. यदि आपको महीने में कम से कम दो बार दोनों उतर हां में मिले है तो आप अच्छा कर रहे है. ऐसा नही सोचे कि आपको हर दिन सकारात्मक जबाव मिलेगा. जब हम अपनी नौकरियां को देखते है तो हम कुछ रोमांचक करना चाहते है. हममें से बहुत कम लोग इतने भाग्यशाली होते है, जिसके पास हमें दिए गए कुल कार्य का 20 प्रतिशत से अधिक कुछ रोमांचक होता है. लेकिन आपको 80 प्रतिशत करने की जरूरत है. संभवत: आप वह 80 प्रतिशत करते हुँ कंपनी में अधिक मूल्य जोड़ते है. तब कंपनी उस 20 प्रतिशत में मूल्यवर्दन करती है.

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