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tata-workers-union-टाटा वर्कर्स यूनियन के सौ साल पर शनिवार और रविवार को देश भर के जानकार जमशेदपुर में जुटेंगे, ऐसा ऐतिहासिक यूनियन यूं ही नहीं बना टाटा वर्कर्स यूनियन, जानिये पूरा इतिहास

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जमशेदपुर : टाटा वर्कर्स यूनियन के सौ साल पूरे होने पर जश्न मनाया जा रहा है. 7 व 8 मार्च को इसके पूरे साल भर चले कार्यक्रम का समापन होने जा रहा है. इसको लेकर भव्य तैयारी की गयी है. देश भर के जानकार 7 व 8 मार्च को भविष्य के ट्रेड यूनियन की राजनीति किस दिशा में जायेगी, इसको तय करेंगे और मंथन करेंगे कि वर्तमान हालात में, जहां नौकरियां बचनी मुश्किल हो रही है, वहां कैसे यूनियन का वजूद बच पायेगा और कैसे यूनियन को और बेहतर किया जा सके. 7 मार्च को सुबह साढ़े नौ बजे से साढ़े ग्यारह बजे तक ‘भविष्य के यूनियन’ विषय पर परिचर्चा होगी, जिसमें टाटा स्टील के एमडी टीवी नरेंद्रन हिस्सा लेंगे. इस दौरान कर्मचारियों के लिए सौ साल पूरे होने पर 50 ग्राम का चांदी का सिक्का को रिलीज किया जायेगा, जिसको सारे कर्मचारियों के बीच वितरित किया जायेगा. इसके अलावा उसी दिन मौजूदा हालात में यूनियन की स्थिति पर चार सीइओ द्वारा अपना पक्ष रखा जायेगा, जिसमें टाटा मोटर्स के प्लांट हेड विशाल बादशाह, टाटा स्टील लांग प्रोडक्ट के एमडी आशीष अनुपम, होंडा कंपनी के वीपी और टाटा वर्कर्स यूनियन में उपाध्यक्ष रह चुके हरभजन सिंह वक्ता के रुप में मौजूद रहेंगे जबकि मॉडरेटर एसएनटीआइ के चीफ प्रकाश सिंह होंगे. शाम को होने वाले कार्यक्रम में दस कॉलेजों के बच्चे भी भविष्य के ट्रेड यूनियन पर प्रकाश डालेंगे, जिसमें श्रम के जानकार ओंकार शर्मा हिस्सा लेंगे. स्कूली बच्चों के बीच लेख और भाषण प्रतियोगिता आयोजित की जायेगी, जिसके प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले को 35 हजार रुपये जबकि द्वितीय स्थान पाने वाले को 25 हजार रुपये का इनाम दिया जायेगा. इसके जज की भूमिका में टाटा वर्कर्स यूनियन के उपाध्यक्ष शहनवाज आलम और हरिशंकर सिंह होंगे जबकि मैनेजमेंट की ओर से संजय विरमानी मौजूद रहेंगे. इसके बाद 8 मार्च को सीएचआरओ सम्मेलन आयोजित होगा, जिसमें टाटा मोटर्स के सीएचआरओ, भूषण स्टील के संदीप धीर रहेंगे जबकि जुबिन पालिया इसमें मॉडरेटर की भूमिका में होंगे. इस दौरान स्कूल ऑफ होप के बच्चों को एक साल का रहने पर होने वाले खर्च का बड़ा डोनेशन भी यूनियन देगी. इसके बाद ट्रेड यूनियन के बेस्ट प्रैक्टिस पर भी परिचर्चा होगी, जिसमें टाटा मोटर्स वर्कर्स यूनियन के महासचिव आरके सिंह, टाटा वर्कर्स यूनियन के डिप्टी प्रेसिडेंट अरविंद पांडेय, सीएट कंपनी के यूनियन के अध्यक्ष और टाइटन यूनियन के पदाधिकारी हिस्सा लेंगे.

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टाटा वर्कर्स यूनियन ऐसे रह गया सौ साल तक, क्या है इतिहास जानिये
27 अगस्त 1907 को टाटा आयरन एण्ड स्टील कंपनी के नाम से योजना पत्र प्रकाशित हुआ. 27 फरवरी 1908 को कारखाना लगाने के लिए काम की शुरूआत हुई. टाटा घराने के अनवरत् प्रयासों के परिणाम स्वरुप 16 फरवरी 1912 को इस्पात की पहली सिल्ली बनकर दुनिया के सामने आयी. इस तरह कंपनी की स्थापना के बाद प्रकृति की गोद में बसा और कल तक नदियों, पहाड़ों, झरनों और जंगलों से अटखेलियॉ करने वाला छोटा सा गांव ‘साकची’ एक आदर्शनगर के रूप में परिवर्तित होता गया. देश-विदेश से हजारों मजदूर यहां काम पर लगे. 2 जनवरी 1919 को इस शहर का नाम ‘साकची’ से ‘जमशेदपुर’ और ‘कालीमाटी रेलवे स्टेशन’ का नाम ‘टाटानगर’ किया गया.

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टाटा स्टील में प्रथम हड़ताल
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद टाटा आयरन एण्ड स्टील कंपनी में कार्यरत मजदूरों के बीच जागृति की भावना पैदा होने लगी. इसके कई कारण थे. 1916 में कंपनी को अनुमान से अधिक लाभ हुआ था,
किन्तु निश्चित क्षमता से अधिक उत्पादन करने के बावजूद श्रमिकों की मजदूरी में किसी प्रकार की बढ़ोत्तरी नही की गयी. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद दैनिक उपभोग की वस्तुओं में भारी बढ़ोत्तरी होने के कारण टाटा आयरन एण्ड स्टील कंपनी के श्रमिक समुदाय का आर्थिक संतुलन बिगड़ने लगा. इस तरह मजदूरों के बीच असंतोष और असुरक्षा की भावना पैदा होने लगी. देश गुलाम था और कंपनी के अधिकांश विभागों में हेड के पदों पर रिटायर्ड आइसीएस अधिकारी कार्यरत थे जो
अंग्रेज थे. कंपनी के जेनरल मैनेजर के पद पर टी डब्लू ट्यूटवीलर पदस्थापित थे जो एक अंग्रेज थे. भारतीय मजदूरों के प्रति उनका अमानवीय व्यवहार आक्रोश का एक प्रमुख कारण था. कारखाना में कार्यरत अधिकांशत: मजदूर अशिक्षित थे, सरकार की ओर से कोई कानून भी नही बनाया गया था, जिसके कारण श्रमिक वर्ग अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रहा था. 1920 के जनवरी माह में कंपनी में कार्यरत कुछ तेज-तर्रार मजदूरों ने प्रबंधन के समक्ष एक ‘मांगपत्र’ भी सौंपा लेकिन एक माह बीत जाने के बाद भी प्रबंधन ने उस पर विचार तक नही किया. इसके बाद मजदूरों ने फरवरी के प्रथम सप्ताह में एक सभा के दौरान सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया कि यदि प्रबंधन एक सप्ताह के भीतर उनके मांग पत्र पर विचार कर निर्णय नही लेती है तो मजदूर हड़ताल करने को विवश हो जाएंगे. इसके बावजूद स्थानीय प्रबंधन ने मांगपत्र पर विचार नही किया तो अंतत: विवश होकर मजदूरों ने 24 फरवरी 1920 को टाटा आयरन एण्ड स्टील कंपनी (टिस्को) में हड़ताल कर दिया.

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जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन का गठन
कंपनी में 24 फरवरी 1920 को आरंभ हुई प्रथम हड़ताल के दौरान मजदूरों ने तत्काल बंगाल के
जाने माने स्वराज्यवादी नेता व्योमकेश चक्रवर्ती से संपर्क साधा. योमकेश चक्रवर्ती आग्रह पर हड़ताल के दौरान ही 5 मार्च 1920 को एक सभा के दौरान कलकता उच्च न्यायालय के विख्यात बैरिस्टर एसएन हल्दर के नेतृत्व में टाटा स्टील के मजदूरों के बीच ‘जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन’ नामक मजदूर संगठन की स्थापना की गयी. हड़ताली मजदूरों को संबोधित करने के लिए पंजाब केसरी लाला लाजपत राय भी जमशेदपुर पधारे और उचित मार्गदर्शन दिया.

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5 मजदूरो की हुई शहादत
प्रथम हड़ताल के दौरान 15 मार्च 1920 को शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे श्रमिकों पर घुड़सवार पुलिस के द्वारा अचानक फायरिंग की गयी जिसमें पांच श्रमिक सेवा सिंह, डमरू
लोहार, रघुनाथ भुइयां, कालुन माता और लीलाधर चौबे प्रदर्शन करते हुए शहीद हो गए. इस घटना के 21 मजदूर घायल भी हुए थे. परिणामत: इस घटना की जानकारी लगते ही कंपनी के तत्कालीन चेयरमैन सर दोराबजी टाटा जमशेदपुर पहुंचे. 19 मार्च को समझौता हुआ. 20 मार्च से मजदूर काम पर वापस गए. लेबर एसोसिएशन और टाटा स्टील प्रबंधन के बीच हुए महत्वपूर्ण समझौते के परिणामस्वरुप टाटा स्टील में मजदूरों के वेतन में 20 से 45 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी, सवेतन छुट्टी, ग्रेच्युटी, प्रोविडेन्ट फंड तथा कामगार दुर्घटना छतिपूर्ति योजना लागू की गयी. जमशेदपुर लेबर
एसोसिएशन को मान्यता प्रदान की गयी.

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टाटा स्टील में दूसरी हड़ताल
1922 लेबर एसोसिएशन द्वारा एक मांग पत्र को लेकर प्रबंधन और एसोसिएशन के बीच मतभेद हुआ जो 20 सितंबर से हड़ताल में परिवर्तित हो गया. 22 अक्टुबर 1922 को एक
मौखिक आश्वासन के बाद यह हड़ताल समाप्त हुई जिसे जिसपर बाद में अमल नही होने के कारण मतभेद पुन: बढ़ता गया. इन्ही परिस्थितियों के बीच 1924 के आरंभिक दिनों में अपनी अस्वस्थता के कारण लेबर एसोसिएशन के अध्यक्ष बैरिस्टर एसएन हल्दर ने लेबर एसोसिएशन से विदा ले लिए.

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कांसिलिएशन कमिटी का गठन
लेबर एसोसिएशन के प्रथम अध्यक्ष बैरिस्टर एसएन हल्दर को जाने के बाद एसोसिएशन को संचालित करने के लिए एक ‘कांसिलिएशन कमिटी’ का गठन किया गया जिसके चेयरमैन देशबंधु चितरंजन दास बनाए गए और सदस्यों में दीनबंधु सीएफ एण्ड्रूज भी शामिल थे.

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दीनबंधु सीएफ़ एण्ड्रूज का बने एसोसिएशन के दुसरे अध्यक्ष
कुछ समय तक ‘कांसिलिएशन कमिटी’ के सदस्य के रूप में काम करने के बाद कमिटी ने मजदूरों की सहमति से 1924 में ही दीनबंधु सी़एफ़ एण्ड्रूज को लेबर एसोसियेशन के द्वितीय अध्यक्ष के रुप में चुना.

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1925 में महात्मा गॉधी ने कराया समझौता
दीनबंधु सी़एफ़ एण्ड्रूज ने लेबर एसोसिएशन का अध्यक्ष पद संभालने के बाद उन्होंने देशबंधु
चितरंजन दास के सहयोग से प्रबंधन और मजदूरों के बीच की दूरी को यथासंभव कम करने का प्रयास किया. आरडी टाटा से भी श्री एण्ड्रूज को सहयोग मिलता रहा. 1925 में 7 अगस्त को महात्मा गांधी जमशेदपुर पधारे. उन्होंने लेबर एसोसिएशन और कंपनी के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता कराया. जिस चेक-ऑफ सिस्टम के तहत कंपनी मजदूरों का चंदा काटकर यूनियन के एकाउंट में जमा करती है, उसे देश में पहली बार महात्मा गांधी ने ही 1925 में टाटा स्टील में लागू कराया था. क्वार्टर नंबर एच-6/1 साउथ पार्क, बिस्टुपुर में उन्होंने एसोसिएषन का कार्यालय भी खुलवाया था. दीनबंधु सी़एफ़ एण्ड्रूज देश-विदेश के विभिन्न स्थानों में सामाजिक आंदोलनों से जुड़े थे इसलिए 1928 के आरंभिक दिनों में वे चले गए. उनके जाने के बाद एकबार फिर एसोसिएशन नेतृत्वविहीन हो गया और विभागीय हड़तालों का सिलसिला शुरू हो गया.

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1928 में हुई तीसरी हड़ताल
1 जून 1928 से कंपनी में तीसरी बार हड़ताल हुई. कोई नेतृत्व नही था, कर्मचारी असमंजस में थे और हडताल के दौरान ही उन्होंने कलकाता जाकर उभरते क्रांतिकारी नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संपर्क किया. नेताजी सुभाष चंद्र बोस आए वस्तुस्थिति को समझने के बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस 18 अगस्त 1928 को जमशेदपुर आए. 20 अगस्त 1928 को उन्हें लेबर एसोसिएशन के तीसरे अध्यक्ष के रुप में सर्वसम्मति से चुना गया. नेताजी सुभाष चंद्र बोस को अध्यक्ष बनने के बाद प्रबंधन के साथ उनकी सकारात्मक वार्ता शुरू हुई. उस समय टाटा स्टील में सबसे बडी हड़ताल हुई थी जो तीन महीने बारह दिनों तक चली. अंतत: नेताजी सुभाष चंद्र बोस और टाटा स्टील के तत्कालीन चेयरमैन सर एनबी़ सकलतवाला के हस्तक्षेप से 12 सितंबर 1928 को एक ऐतिहासिक समझौता संपन्न हुआ, जिसकी देश भर में प्रशंसा की गयी. यह हड़ताल उस समय हुई थी जब विष्वव्यापी मंदी की शुरुआत हुई थी और कंपनी को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा था. 1934 में मंदी के शिकार होते हुए भी टाटा कंपनी ने नेताजी के आग्रह को स्वीकारते हुए अपने मजदूरों के लिए भारत में पहली बार प्रॅाफिट-शेयरिंग-बोनस देने की घोषणा की. 1928 से 1937 के बीच अपने अध्यक्षकाल में नेताजी ने मेटरनिटी लीव, प्रॅाफिट-शयरिंग-बोनस, एक्टिंग पर आधारित प्रमोशन, शिशु कक्ष, सेफ्टी के लिए कमिटी सहित कई मुद्दे पर महत्वपूर्ण समझौते कराए. नेताजी टाटा कंपनी में मात्र 8 साल के बीच हुई 3 बड़ी हडतालों से सहमत नही थे. उन्होंने जमशेदपुर में टाटा स्टील के मजदूरों को इस तरह मार्गदर्षित किया कि 1928 के बाद यहॉं प्रबंधन और मजदूरों के बीच विवाद से बचते हुए हड़ताल का सामना नहीं करना पडा़. सर्वप्रथम नेताजी की ही हार्दिक इच्छा थी कि टाटा स्टील में एक ऐसा संयक्त फोरम बने जिसके माध्यम से श्रमिकों से जुड़े मामले सुलझाए जा सकें. राष्ट्रीय गतिविधियों में लिप्त होने के कारण नेताजी जब विदेश चले गए तो उन्होंने वहां से पत्रों के माध्यम से हरसंभव मजदूरों का मार्गदर्शन किया. विदेश से ही उन्होंने वापस आने में असमर्थता जताते हुए अपने स्थान पर किसी दूसरे नेता को लेबर एसोसिएशन का अध्यक्ष चुनने की सलाह दी.

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प्रो़ अब्दुल बारी आए लेबर एसोसिएशन से टाटा वर्कर्स यूनियन:
1936 में बिहार की तत्कालीन अंतरिम सरकार ने लेबर इन्क्वायरी कमिटी का गठन किया था जिसके सदस्य के रूप में विख्यात गांधीवादी नेता प्रो़ अब्दुल बारी कई बार जमशेदपुर आकर यहां के मजदूरों के हालात देखा करते थे. सबकी सहमति मिलने के बाद वे लेबर एसोसिएशन का नेतृत्व करने को तैयार हुए. आते ही उन्होंने सबसे पहले 1937 में ‘जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन’ का नाम बदलकर ‘‘टाटा वर्कर्स यूनियन’’ कर दिया. प्रबंधन को एक मांग पत्र भी दिया जिसे स्वीकार कर
लिया गया. 9 दिसंबर 1938 को संगठन के नए नाम ‘‘टाटा वर्कर्स यूनियन’’ का सरकार द्वारा पंजीकरण किया गया जिसमें अध्यक्ष-प्रोअब्दुल बारी, महासचिव-माइकल जॉन और कोषाध्यक्ष-टीपी सिन्हा पंजीकृत किए गए.

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पंडित नेहरू और डा राजेन्द्र प्रसाद पधारे
1939 में कंपनी के शीटमिल के मुदे को लेकर प्रबंधन और यूनियन में कुछ मतभेद पैदा हो गए
थे. उस समय टाटा स्टील और टाटा वर्कर्स यूनियन के महत्व को समझते हुए अगस्त के महीने में विख्यात नेता डॉ राजेन्द्र प्रसाद और पंडित जवाहरलाल नेहरु जमशेदपुर आए और दोनों नेताओं ने चार दिनों तक अवलोकन करने के बाद प्रबंधन और टाटा वर्कर्स यूनियन के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता कराया. प्रो अब्दुल बारी ने 1937 से 1947 के बीच कंपनी प्रबंधन के
साथ वार्ता कर 3 समझौते कराए.

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1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में ऐतिहासिक भूमिका
1942 के राष्ट्रीय आंदोलन में यूनियन का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. प्रो अब्दुल बारी, माइकल जॉन, सरदार त्रेता सिंह, वीजी गोपाल, टीपी सिन्हा, मनी घोष, नारायण मुखर्जी और टाटा स्टील में कार्यरत सैकड़ों मजदूरों ने ऐतिहासिक सत्याग्रह किया, गिरफ्तारियां दी. इसी क्रम में सत्याग्रह के
दौरान 7 अगस्त 1943 को पटना के बांकीपुर सेन्ट्रल जेल में यूनियन के तत्कालीन उपाध्यक्ष सरदार त्रेता सिंह शहीद हो गए थे. जेल से वापसी के बाद यूनियन नेताओं ने पुन: कार्य आरंभ किया. आजादी से पॉच माह पूर्व 28 मार्च 1947 को कार द्वारा पटना जाते समय फतुहा रेलवे स्टेशन के पास मजदूर आंदोलन के मसीहा प्रो अब्दुल बारी की हत्या हो गयी.

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माइकल जॉन बने अध्यक्ष और वीजी गोपाल महासचिव
आपात परिस्थिति में यूनियन कार्यकारिणी की बैठक बुलाकर तत्कालीन महासचिव माइकल जॉन को टाटा वर्कर्स यूनियन का नया अध्यक्ष और सहायक
सचिव रहे वीजी गोपाल को महासचिव चुना गया.

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इंटक की स्थापना में योगदान
टाटा वर्कर्स यूनियन के लिए यह गर्व की बात है कि आजादी के समय भारतीय राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस (इंटक) की स्थापना में टाटा वर्कर्स यूनियन संस्थापक सदस्य के रूप में सक्रिय रही है. यूनियन के अध्यक्ष माइकल जॉन और महासचिव वीजी गोपाल ने इंटक की स्थापना में कदम-कदम पर योगदान दिया. आगे चलकर 1952 और 1961 में जॉन साहब दो बार इंटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे.

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सुपरवाइजरी यूनिट की स्थापना
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1948 में टाटा
वर्कर्स यूनियन द्वारा अपने सुपरवाइजरों और टेक्निशियनों के लिए सुपरवाइजरी एवं टेक्निशियन यूनिट की स्थापना की गयी थी. 1954 में टाटा वर्कर्स यूनियन में पहली बार डिपुटी प्रेसिडेन्ट का पद सृजित किया गया.

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1956 का टाटा-जॉन समझौताॉ

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1956 में टाटा स्टील के चेयरमैन ज़ेआऱडी़ टाटा ने टाटा वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष माइकल जॉन ने प्रबंधन और यूनियन के आपसी सामंजस्य से ऐसे समझौते को हस्ताक्षरित किया, जो श्रम कल्याण के क्षेत्र में ‘मील का पत्थर‘ साबित हुआ है. इस समझौते के परिणामस्वरुप प्रबंध में श्रमिकों की भागीदारी आरंभ करने और संयुक्त परामर्श प्रणाली के आधार पर विभिन्न समितियां गठित करने तथा सरप्लस कर्मचारियों को नये सिरे से प्रषिक्षित कर अन्य विभागों में समायोजित करने, टाटा वर्कर्स यूनियन को अनंतर मान्यता प्रदान करने एवं अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर भी सहमति हुई. लगभग 30 वर्षों से भी ज्यादा समय तक अध्यक्ष पद सुशोभित करने के बाद 3 अगस्त 1977 को टाटा वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात मजदूर नेता माइकल जॉन की मृत्यु हो गयी.

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वीजी गोपाल अध्यक्ष और यूएन प्रसाद महासचिव

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जॉन साहब की मृत्यु के उपरांत वी़जी़ गोपाल यूनियन के अध्यक्ष और युएन प्रसाद महासचिव चुने गए. 1978 में टाटा वर्कर्स यूनियन द्घारा यूनियन की सामाजिक गतिविधियों में बड़े पैमाने पर विस्तार किया गया. यूनियन ने अपने दिवंगत अध्यक्ष प्रो़ अब्दुल बारी की स्मृति में एक बड़े भवन का निर्माण किया.

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टाटा स्टील के राष्ट्रीयकरण के विरोध में उतरी यूनियन
1979 मे जब तत्कालीन केन्द्र सरकार के द्घारा टाटा स्टील के राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया शुरू की गयी तो सबसे पहले टाटा वर्कर्स यूनियन ने ही विरोध में आंदोलन शुरू कर दिया. परिणामत: राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया सरकार को तत्काल रद कर देनी पड़ी. इस बीच 1978, 1983 तथा 1989 में एनज़़ेसी़एस के आधार पर टाटा वर्कर्स यूनियन द्वारा प्रबंधन से बातचीत कर समझौते कराए गए.

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माइकल जॉन की स्मृति में बना सेन्टर
1984 में टाटा वर्कर्स यूनियन के द्घारा अपने पूर्व अध्यक्ष माइकल जॉन की स्मृति में एक भव्य प्रेक्षागृह तथा माइकल जॉन शोध एवं मानव संसाधन विकास केन्द्र की स्थापना की गयी.इनमे भव्य पुस्तकालय, शोध केन्द्र भी स्थापित किया गया है. माइकल जॉन स्मृति व्याख्यानमाला का शुभारंभ किया गया. इस आयोजन के तहत यूनियन के द्वारा अब तक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई हस्तियों को उनकी विशिष्ट उपलब्धियों के लिए गोल्डमेडल से सम्मानित किया जा चुका है. सामाजिक गतिविधियों और उपलब्धियों के इस दौर में कार्यशील रहने के दौरान 14 अक्टूबर 1993 को कुछ अपराधियों के द्वारा यूनियन प्रांगण में ही अध्यक्ष वीज़ी ग़ोपाल की गोली मारकर निर्मम हत्या कर दी गयी इस तरह मजदूर आंदोलन के इस मसीहा का महाप्रयाण हुआ. टाटा स्टील में अपने 55 वर्षों की मजदूर सेवा के दौरान स्व़ वीजी़ गोपाल ने औद्योगिक शांति और संबंधों को कायम रखने में अद्घितीय भूमिका निभायी.

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एसके बेन्जमिन अध्यक्ष और डी के सिंह महासचिव
गोपाल बाबु के बाद लंबे समय तक महासचिव रहे एसक़े बेन्जमिन को टाटा वर्कर्स यूनियन का नया अध्यक्ष तथा सुपरवाइजरी एवं टेक्निशियन यूनिट के मानद सचिव के पद पर कार्यरत डीके सिंह को महासचिव चुना गया. अपने नौ वर्षो के कार्यकाल में बेन्जमिन साहब और उनकी टीम ने मजदूर हितों की रक्षा के लिए हरसंभव प्रयास किए.

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आऱबी़बी़ सिंह अध्यक्ष और डी के सिंह महासचिव
2002 में हुए यूनियन चुनाव में पहली बार कर्मचारियों के बीच से आरबीबी सिंह टाटा वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष चुने गए. 2003 में टाटा स्टील और टाटा वर्कर्स यूनियन के बीच आद्योगिक
शांति और सामंजस्य के गौरवपूर्ण 75 वर्ष पूरे हुए. इस ऐतिहासिक उपलब्धि को टाटा स्टील प्रबंधन और टाटा वर्कर्स यूनियन के द्वारा संयुक्त रूप से 2004 में एक भव्य आयोजन के रुप में मनाया गया जिसमें भारत के राष्ट्रपति की सारगर्भित उपस्थिति भी हुई.

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रघुनाथ पांडेय अध्यक्ष और एसएन सिंह महासचिव

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2006 के यूनियन चुनाव में रघुनाथ पाण्डेय नए अध्यक्ष और एसएन सिंह महासचिव के पद पर निर्वाचित हुए. 2009 के चुनाव में अध्यक्ष पद पर रघुनाथ पांडेय लगातार दूसरी बार चुने गए जबकि महासचिव के पद बी के डिन्डा जी आए जो लगातार तीन बार चुने जाते रहे. 2012 में उच्च न्यायालय के आदेश में सुपरवाइजरी यूनिट का मेन यूनिट मजर्र हुआ.

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