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शुक्रवार, मई 14, 2021
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Jamshedpur : योग का दूसरा रूप है नृत्य, शरीर थिरकता है तो आत्मा तक उस पर ताल देती है : संजना

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जमशेदपुर : प्रत्येक वर्ष अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस पूरे विश्व में 29 अप्रैल मनाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस की शुरुआत 29 अप्रैल 1982 से हुई। ‘बैले के शेक्सपियर’ की उपाधि से सम्मानित एक महान रिफॉर्मर एवं लेखक जीन जार्ज नावेरे के जन्म दिवस की स्मृति में यूनेस्को के अंतर्राष्ट्रीय थिएटर इंस्टीट्यूट की डांस कमेटी ने 29 अप्रैल को अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस के रूप स्थापित किया है। जीन जार्ज नावेरे ने 1760 में ‘लेर्टा ऑन द डांस’ नाम से एक पुस्तक लिखी थी, जिसमें नृत्य कला की बारीकियों को प्रस्तुत किया गया। जबकि नृत्य की उत्पत्ति भारत में ही हुई है, यहां की नृत्य कला अति प्राचीन है। कहा जाता है कि यहां नृत्य की उत्पत्ति 2000 वर्ष पूर्व त्रेतायुग में देवताओं की विनती पर ब्रह्माजी ने की और उन्होंने नृत्य वेद तैयार किया। तभी से नृत्य की उत्पत्ति संसार में मानी जाती है। इस नृत्य वेद में सामवेद, अथर्ववेद, यजुर्वेद व ऋग्वेद से कई चीजों को शामिल किया गया और जब नृत्य वेद की रचना पूरी हो गई, तब नृत्य करने का अभ्यास भरत मुनि के सौ पुत्रों ने किया। नृत्य के कई प्रकार हैं जिनमें भरतनाट्यम, कुचीपुड़ी, छाउ, कथकली, मोहिनीअट्टम, ओडिसी आदि है। मनुष्य की प्रवृत्ति है, सुख और शांति की तलाश, जिसमें नृत्य-कला की महत्वपूर्ण भूमिका है। नृत्य खुशी, शांति, संस्कृति और सभ्यता को जाहिर करने की एक प्रदर्शन-कला है। खुद नाचकर या नृत्य देखकर हमारा मिजाज भी थिरक उठता है और हमारी आत्मा तक उस पर ताल देती है। नृत्य जीवन की मुस्कान और खुशियों की बौछार है।

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शहर की जानी मानी युवा कत्थक नृत्यांगना रमणी नगर, बारीडीह निवासी कत्थक नृत्यांगना संजना बोस कत्थक की तालीम पंडित संदीप बोस एवं सौमि बोस से ले रही है। संजना कत्थक नृत्य में प्रयाग संगीत समिति, प्रयागराज से “मास्टर्स इन कत्थक” की छात्रा है। संजना के उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए शहर के कई प्रतिष्ठित नृत्य कार्यक्रमों में सम्मानित किया गया है। संजना ने इस लॉकडाउन में राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय ऑनलाइन कार्यक्रम में अपनी प्रस्तुति दी है।

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विश्व नृत्य दिवस पर संजना ने कहा, ‘मेरे लिए नृत्य दिन का विशेष महत्व है क्योंकि विश्वभर में नृत्य द्वारा एक-दूसरे की संस्कृति, सभ्यता और रीति-रिवाज को समझने के लिये हम संकल्पबद्ध होते हैं। मैं उदितोदित नृत्य-साधकों से कहूं कि वे अकेले या अकेली नहीं हैं। उनकी तरह एक बड़ा नृत्य समुदाय है जो बदलाव और पुनर्संरचना के दौर से गुजर रहा है। वे मानती हैं कि नृत्य इन दिनों एक कठिन साधना बन चुका है। कोरोना काल के इन निराशाजनक स्थितियों के बावजूद मैं नृत्य के भविष्य को लेकर आशान्वित हूं।’

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