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East Singhbhum District Congress : नयी शिक्षा नीति को लेकर झारखंड सरकार पर उठे सवालों को लेकर कांग्रेस ने किया भाजपा पर पलटवार, कहा-विभिन्न राज्य सरकारों के विरोध व आपत्तियों को दरकिनार कर एकतरफा तरीके से नयी शिक्षा नीति लागू करना संविधान का उल्लंघन

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Jamshedpur : नयी शिक्षा नीति (New education policy) को लेकर भाजपा नेताओं द्वारा झारखंड सरकार पर उठाये गये सवाल पर पूर्वी सिंहभूम जिला कांग्रेस (East Singhbhum District Congress) के अध्यक्ष बिजय खां ने वर्जुअल प्रेस वार्ता कर पलटवार किया है. उन्होंने कहा है कि केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न राज्य सरकारों के विरोध व आपत्तियों को दरकिनार कर एकतरफा तरीके से नयी शिक्षा नीति को लागू करना संविधान का पूरी तरह से उल्लंघन है. इस प्रकार की नीति पर संसद में चर्चा होनी चाहिए थी और सरकार ने इसका आश्वासन भी दिया था. केंद्र सरकार ने अब खुले तौर पर निजीकरण का ऐलान किया है. लेकिन वो इसे स्वायत्तता के पर्दे से ढक रही है. केंद्र सरकार शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च करने की बात कर रही है, जबकि लंबे समय से छात्र इसे 10 प्रतिशत करने की मांग कर रहे हैं. यूपीए-2 के अंतिम वर्ष में शिक्षा पर जीडीपी का 4.14 प्रतिशत खर्च किया गया था, लेकिन केंद्र की भाजपा सरकार के कार्यकाल में यह केवल 3.2 प्रतिशत रह गया है.

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बिजय खां ने कहा है कि केंद्र सरकार ने शत-प्रतिशत नामांकन के लिए ऑनलाइन व पत्राचार के माध्यम से शिक्षा देने का विचार किया है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि देश में इंटरनेट और कंप्यूटर की पहुंच समाज के बड़े तबके तक नहीं है. यहां तक कि सरकारी स्कूलों में अब तक इसकी उपलब्धता सुनिश्चित नहीं हो सकी है. ऐस सबको ऑनलाइन शिक्षा देने की बात कल्पना अधिक व यथार्थ कम प्रतीत होती है. उन्होंने कहा है कि यूपीए सरकार ने उच्च शिक्षा में दलितों व महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए उन्हें उच्च शिक्षा में आरक्षण दिया था. लेकिन मौजूदा शिक्षा नीति दलित, अल्पसंख्यक व महिलाओं को शिक्षा में आरक्षण देने के मामले में मौन हैं.

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कांग्रेस जिलाध्यक्ष बिजय खां ने कहा है कि नयी शिक्षा नीति में सबसे बड़ा बदलाव तीन से छह साल उम्र के बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से औपचारिक शिक्षा में प्रवेश कराने को लेकर माना जा रहा है, लेकिन क्या आंगनबाड़ी केंद्र इसके लिए सक्षम हैं. क्योंकि आंगबाड़ी केंद्रों के कार्यकर्ता व उनके सहायक शिक्षण कार्य में भी दक्ष नहीं होते. ऐसे में उनसे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे देश के बच्चों की शिक्षा की नींव रख सकेंगे. हालांकि सरकार ने उन्हें छह महीने का डिप्लोमा कोर्स करा कर दक्ष बनाने की लक्ष्य तय किया है, लेकिन इस तरह दक्ष अध्यापक की कमी को पूरा नहीं किया जा सकता है. उन्होंने कहा है कि सरकार ने चंद दिनों पहले सभी विश्वविद्यालयों और अन्य शिक्षण संस्थानों को अपने स्तर से बाजार से फंड की व्यवस्था करने का निर्देश दिया था. यह साबित करता है कि उसके पास उच्च शिक्षण संस्थानों का खर्च उठाने की स्थिति नहीं रह गयी है. ऐसे में सरकार के पास इतना धन कहां से आयेगा कि वह जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च करते हुए इतना बड़ा लक्ष्य हासिल कर ले.

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