experience-of-a-teacher-in-MGM-Hospital : एमजीएम में 80 वर्षीय पिता के पॉजिटिव से निगेटिव होने के बाद शिक्षिका ने साझा किये अनुभव, कहा-निजी अस्पताल में मरीज को आइसोलेट कर जहां आधा मार दिया जाता है, वहीं एमजीएम में अपनों से जोड़ कर बीमारी को आधा खत्म कर दिया जाता है

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प्रोफेसर शीतल पांडेय.

Jamshedpur : इलाज के मामले में जहां हर कोई निजी अस्पतालों की ओर भागता नजर आता है, वहीं आये दिन अपनी खानियों के लिए सुर्खियों में रहने वाले एमजीएम अस्पताल की भी सराहना इस कोरोना काल में हो रही है. साकची स्थित करीम सिटी कॉलेज की प्रोफेसर शीतल पांडेय ने शार्प भारत के साथ एमजीएम से जुड़े अपने अनुभव साझा किये हैं, जो सुकून देनेवाले हैं. प्रो शीतल पांडेय कहती हैं-शहर के लोकल न्यूज़ पेपर में रोज कोरोना से जुडी खबरें पढ़ कर रुह कांप जाती थी. शहर के एकमात्र सुप्रसिद्ध निजी अस्पताल की दुरव्यवस्था, लापरवाही और मनमाना व्यवहार से जुडी खबरें रोज ही दृष्टिगोचर हो जाती थी. हम शहरवासी इलाज के लिए तो बस इसी अस्पताल की ओर ही टकटकी लगाए रहते थे. कारण हमारे पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं. इलाज के लिए हम कभी सरकारी अस्पताल एमजीएम लेकर जाते? कदापि नहीं. एमजीएम के प्रति मैं भी नकारात्मक भावनाओं से भरी हुई थी. लेकिन मेरे साथ घटित एक घटना ने एमजीएम के प्रति मेरे नज़रिये को बदल कर रख दिया. मैं नतमस्तक हूँ एमजीएम के प्रति.आज कोरोना काल में मरीजों की देखभाल में शहर के सरकारी अस्पताल जो जिम्मेदारी उठा रहे हैं, वह सबकुछ अपनी आंखों से देखा और अनुभव किया.

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उन्होंने बताया कि आज मेरे पापा को गये 16 दिन हो गये. वो कोरोना पॉजिटिव थे. एकदिन अचानक उन्हें सांस लेने मैं तकलीफ हुई और मैं उन्हें लेकर शहर के उसी निजी अस्पताल में गई. पापा को तुरंत चिकित्सा की जरूरत थी. हाथ पैर जोड़ा, पर इस अस्पताल ने उन्हें एडमिट लेने से इंकार कर दिया. वजह नो बेड.. एक 80 वर्षीय मरीज की तड़प भी उनकी सोइ हुई मानवता को जागा नहीं पाई. वो तड़प रहे थे और उनको एडमिट करवाने के लिए मैं सारे सोर्स अप्लाई कर रही थी. एक घंटे के जद्दोजहद के बाद हारकर बेमन से उन्हें लेकर एमजीएम आई. मेरे एक फोन पर पापा को रिसीव करने के लिए वहां कर्मचारी तैयार थे. उनका बेड और ऑक्सीजन उनकी प्रतीक्षा कर रहा था. बिना किसी कागजी कार्रवाई की औपचारिकता निभाए उन्हें सबसे पहले चिकित्सा दी गई. तब मुझे उनका पेपर बनाने के लिए भेजा गया.यहाँ कोरोना मरीजों के इंतज़ाम, जो मैंने देखा वो मेरी कल्पना से परे था. कोरोना मरीज़ की देखभाल के लिए घर का अटेंडर एलाउ किया गया था. सोचिये निजी अस्पताल में मरीज को आइसोलेट कर जहां आधा मार दिया जाता है वहां एमजीएम में इस भयानक बीमारी में अपनों से जोड़ कर बीमारी को आधा ख़त्म कर दिया जाता है. मरीज घर का खाना खा सकता है. डॉक्टर जब राउंड पर आते हैं तो मास्क लगा कर. मरीजों की नब्ज़ को खुद जाँचते हैं. उनका हौसला बढ़ाते है. निजी अस्पताल और एमजीएम की व्यवस्था की स्वयं तुलना करते जाइये. ये एमजीएम की सुन्दर व्यवस्था थी की मेरे पापा जो बेहद क्रिटिकल थे वो 15 दिन तक जूझारू योद्धा बनकर कोरोना से लड़ते रहे और कोरोना फाइटर बने. उनकी जिद्द थी कि जबतक नेगेटिव नहीं हो जाता घर नहीं जाऊंगा.

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प्रोफेसर शीतल पांडेय कहती हैं कि उनके पिता ने कोरोना को हरा दिया पर हार्ट फेल हो गया.संतोष इस बात का है कि 80 साल के इस अत्यंत क्रिटिकल मरीज़ के बचने की उम्मीद न थी, पर वो घर आ सके और हमें अपनी अर्थी को कन्धा देने का सौभाग्य प्रदान कर सके. ये संभव हो सका, क्योंकि वो शायद शहर के उस निजी अस्पताल में नहीं थे बल्कि एमजीएम में थे, जहाँ उनके बेटे उनके साथ थे. जो उन्हें घर का खाना खिलाते थे. उनकी सेवा कर उनका मनोबल बढ़ाते थे. ऐसी बीमारी में अपनों का साथ बीमारी से लड़ने की ताकत देता है और अपनों से काट कर अलग करने से बीमारी से लड़ने की ताकत भला बुजुर्गो को कहा से आएगी, जो खुद से उठकर बैठ भी नहीं सकते. एमजीएम की इस सुन्दर व्यवस्था के लिए वह राज्य के स्वास्थ्य मंत्री की भूरी-भूरी प्रशंसा करती हैं. साथ ही उनसे एमजीएम को भी दिल्ली के एम्स जैसा बनाने की अपील करती हैं. वह बताती हैं कि एमजीएम अध्यक्ष अपनी व्यस्त दिनचर्या में स्वतः कोविड वार्ड में जाकर मरीजों का हाल जानते हैं. राजेश बहादुर हर संभव सहायता के लिए तत्पर रहते है. वह कही हैं कि मैं सपरिवार एमजीएम के प्रति ताउम्र अहसानमंद रहूंगी.

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