political-analysis-गुजरात, हिमाचल, दिल्ली के चुनाव नतीजे और उसके राजनीतिक मायने : एक विश्लेषण

राशिफल

दुर्योधन सिंह / शार्प भारत डेस्क : गुजरात एवं हिमाचल प्रदेश की विधानसभाओं के साथ ही दिल्ली महानगरपालिका तक के चुनाव संपन्न हो चुके हैं. गुजरात में एक बार फिर भूपेंद्र पटेल की ही ताजपोशी होनी तय है. हिमाचल प्रदेश में बहुमत प्राप्त कांग्रेस अपना नेता चुनने की कवायद में जुटी हुई है तो एमसीडी चुनाव में उलटफेर करनेवाली अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी पर अभी जीत का खुमार हावी है. लेकिन इस पूरी चुनावी कवायद में जीत-हार से अलग भी कई बातें सामने आई हैं, जो देश की भावी राजनीति की दिशा तय करेंगी.

गुजरात में एंटी इनकंबेंसी की चर्चाओं को धता बताते हुए भारतीय जनता पार्टी ने जो प्रचंड बहुमत हासिल किया. पार्टी की इस जीत ने यह स्पष्ट किया कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन कर दिल्ली भले शिफ्ट हो गये हों, लेकिन प्रदेश में उनका जादू अभी बरकरार है. राज्य में पार्टी को मिले प्रचंड बहुमत में राज्य सरकार के काम से अधिक मोदी फैक्टर ने काम किया यह साफ है. विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का धुआंधार प्रचार अभियान मतदाताओं को बांधे रखा तो यह मोदी का जादू ही कहा जायेगा. यही नहीं, इस चुनाव ने गृहमंत्री अमित शाह की ताकत को भी और पुख्ता किया. हां, हिमाचल प्रदेश में पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा तो इसका कारण पार्टी की अंदरूनी खींचतान ही रही. चुनाव के ऐन पहले पार्टी के कई नेताओं का बगावत कर पाला बदल लेना पार्टी के लिए भारी साबित हुआ. पार्टी नेतृत्व भी इस बात को मान रहा है एवं इस स्थिति से निपटने के लिए पार्टी के अंदरखाने कवायद भी शुरू हो गयी है.

 कांग्रेस पार्टी चुनाव वाले दोनों राज्यों में प्रचार के समय से ही ढीली पड़ने लगी थी, जिसकी पुष्टि वहां के चुनाव परिणामों ने भी कर दी. कांग्रेस की इस शिथिलता का कारण तो वही जाने, पर गुजरात में कभी 149 सीटें जीतनेवाली कांग्रेस पार्टी इस विधानसभा चुनाव में 20 का आंकड़ा भी नहीं छू पायी. हिमाचल प्रदेश में पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी से सत्ता तो हथिया ली, किन्तु अब मुख्यमंत्री के चयन के लिए उसे भारी कवायद करनी पड़ रही है. पार्टी आलाकमान के भेजे तीन पर्यवेक्षकों की निगरानी में पार्टी विधायक दल के नेता के चुनाव में जितना विलंब होगा, पार्टी आलाकमान का सिरदर्द उतना ही बढ़ता जायेगा. पार्टी की ओर से अपने विधायकों को कहीं और सुरक्षित रखने की घोषणा से उसका संकट साफ नजर आ रहा है. पार्टी नेतृत्व इसको लेकर प्रतिद्वंद्वी भाजपा से तो डर ही रही है, अपने विधायकों एवं प्रदेश के आला नेताओं की आपसी खेमेबंदी भी उसे डरा रही है. विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी दोनों राज्यों में कोई खास चमत्कार भले न कर पायी हो, लेकिन इससे वह राष्ट्रीय राजनीतिक दल का दर्जा पाने की दावेदार बन गई है, जो उसके लिए बड़े संतोष की बात है. पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल सहित सभी आला नेताओं के चेहरों पर खिली मुस्कान भी यही स्पष्ट कर रही है. पार्टी नेताओं पर एमसीडी चुनाव में मिली जीत का खुमार हावी है. पार्टी नेता इसी के कारण मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अभी से ‘पीएम मटीरियल’ के रूप में प्रचारित करते दिख रहे हैं, जैसे पीएम के चुनाव के लिए इनकी सत्ता वाले दिल्ली और पंजाब के मतदाता ही काफी हैं. वैसे भी संसदीय चुनावों में अभी समय है और तब तक देश के राजनीतिक महा समुद्र में अभी कितनी और कैसी-कैसी लहरें आयेंगी किसी को पता नहीं. लेकिन आम आदमी पार्टी के नेताओं की कवायद जारी है. वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में आप जितना उछलकूद मचा ले, केंद्रीय राजनीति में आज भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख विपक्ष की भूमिका में कांग्रेस ही नजर आती है. अब यह कांग्रेस पर है कि वह अपनी इस छवि का किस तरह इस्तेमाल करती है. भारतीय जनता पार्टी पर धार्मिक ध्रुवीकरण का आरोप लगानेवाली विपक्षी पार्टियों में सबसे अधिक चर्चित असदुद्दीन ओवैसी की एआइएमआइएम की इन विधानसभा चुनावों में हुई दुर्गति एवं सपा नेता आजम खान के रामपुर में भाजपा को मिली जीत से साफ है कि भाजपा को अल्पसंख्यक वर्ग का दुश्मन बतानेवाली पार्टियों के लिए अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने की जरूरत होगी.

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