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jamshedpur-adarsh-nagar-society-सोनारी के चर्चित आदर्श सहकारी गृह निर्माण स्वावलंबी समिति को लेकर न्याधिकरण का ऐतिहासिक फैसला, सोसाइटी का एसडीओ की देखरेख में तीन माह में चुनाव कराने का आदेश, वाइएन यादव और उनके बेटों को चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराया, जानें क्या है मामला

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जमशेदपुर : जमशेदपुर के सोनारी के चर्चित आदर्श सहकारी गृह निर्माण स्वावलंबी समिति के वाइएन यादव और उनके समूह के लोगों को जोरदार झटका लगा है. झारखंड हाईकोर्ट के निर्देश पर शुक्रवार को न्यायाधिकरण ने फैसला सुनाया और वाइएन यादव को सोसाइटी से अलग कर दिया. वाइएन यादव और उनके पुत्र राजेश कुमार को चुनाव से अलग करते हुए नये सिरे से तीन माह के भीतर चुनाव कराने का आदेश दिया है. झारखंड सेल्फ सपोर्टिंग को-ऑपरेटिव सोसाइटी के न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) ने इस फैसले में कहा गया है कि जो चुनाव वाइएन यादव और अन्य लोगों ने कराया था, वह अवैध था, जिसको खारिज किया जाता है. इस आदेश में कहा गया है कि आदर्श सहकारी गृह निर्माण स्वावलंबी समिति लिमिटेड द्वारा इस आदेश के तीन माह के भीतर चुनाव फिर से कराया जायेगा. इस चुनाव की सारी देखरेख की जिम्मेदारी जमशेदपुर के एसडीओ को दी गयी है. इसके अलावा यह कहा गया है कि वाइएन यादव और उनके पुत्र राजेश कुमार इस चुनाव में किसी भी पद पर भाग नहीं ले सकते है और ना ही निदेशक के पद को ही संभाल सकते है. यह भी आदेश में कहा गया हैकि जेनरल बॉडी का कोरम सारे सदस्यों में से एक चौथाई या 25 फीसदी की उपस्थिति में पूरी होगी. कोर्ट ने यह भी कहा है कि झारखंड के को-ऑपरेटिव सोसाइटी के रजिस्ट्रार इस सुनवाई में हाजिर नहीं हुए थे. उनको वाइएन यादव और अन्य लोगों की जांच करने को कहा गया है. इसको लेकर आदेश की कॉपी को रिसीव करने को कहा गया है. सोसाइटी रजिस्ट्रार को कहा गया है कि तीन माह में इसकी जांच कर तत्काल न्यायाधिकरण को सूचित किया जाये.
क्या है पूरा मामला :
अप्रैल 2016 में सोनारी के आदर्शनगर के 9 और 10 फेज के सदस्यों ने मिलकर आदर्श वेलफेयर सोसाइटी का गठन किया था. इस गठन के पीछे उद्देश्य था कि सभी सदस्यों को अच्छी साफ-सफाई की व्यवस्था और सुरक्षा उपलब्ध करा सके क्योंकि आदर्श सहकारी गृह निर्माण स्वावलंबी समिति की सेवाएं काफी निम्न स्थिति की थी और शुल्क बहुत ही अधिक था. इस कदम का पहले वाइएन यादव ने स्वागत किया और कार्यालय की चाबियां उनको सौंपी गयी, लेकिन जल्द ही वाइएन यादव और उनके लोगों ने सारे सदस्यों को परेशान करना शुरू कर दिया गया. कई प्रकार से पैसों का दोहन शुरू हो गया. सदस्यों को अपमानित करना शुरू हो गयी. बिना सेवा दिये बिलों में सेवा शुल्क जोड़ा जाने लगा. विरोध पत्रों को कोई अहमियत नहीं दी जाती थी. अंतत: सारे सदस्यों ने इस मामले को लेकर झारखंड हाईकोर्ट की शरण ली. चार साल हाईकोर्ट मेंकेस चलने और कोई नतीजा नहीं आने के बाद इस केस को ट्रिब्यूनल (न्यायाधिकरण) में स्थानांतरित किया गया. इस ट्रिब्यूनल ने तीन माह में दोनों तरफ की दलीलें सुनने के बाद 13 मई को यह फैसला सुनाया. आदर्श वेलफेयर सोसाइटी के सदस्यों ने इसे ऐतिहासिक जीत करार दिया है.

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