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jamshedpur : आजादी के 70 दशक बाद भी विकास की बाट जोह रहा नरगा व बरारडीह के ग्रामीण, आवागमन के लिए एक अदद पक्की सड़क नहीं

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जमशेदपुर : झारखंड की आर्थिक राजधानी लौहनगरी जमशेदपुर भले मिनी मुंबई कहलाती है, लेकिन चकाचौंध भरे जमशेदपुर शहर से सटे ग्रामीण इलाकों में आज भी मूलभूत सुविधाओं की घोर कमी बदलते भारत और खुशहाल झारखंड की कहानी साफ बयां करती हैं. जहां आजादी के सत्तर दशक बीत जाने के बाद भी ग्रामीण विकास की बाट जोहते नजर आ रहे हैं. (नीचे भी पढ़ें)

सरकारें आयीं गयी मगर विकास के दावे खोखले ही साबित हुए. हम बात कर रहे हैं जमशेदपुर के जुगसलाई विधानसभा क्षेत्र की. जहां नरगा और बरारडीह गावों के ग्रामीण आज भी बोल्डर से बने सड़कों पर चलने को मजबूर है. हर गांव को प्रखंड और जिला मुख्यालय से जोड़ने का दावा यहां कागज पर ही नजर आ रहा है. (नीचे भी पढ़ें)

झारखंड अलग राज्य बने दो दशक बीत चुके हैं. लगभग हर कार्यकाल में यहां से निर्वाचित विधायक राज्य सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं, लेकिन यहां के ग्रामीणों के हिस्से विकास के नाम पर यही टूटी- फूटी और जर्जर सड़कें ही मय्यसर है. वैसे यहां कुछ स्थानीय समाजसेवियों द्वारा कुछ हद तक सड़कों पर मुरुम बिछाकर लोगों की परेशानियों को पाटने का कार्य किया जा रहा है, लेकिन वो नाकाफ़ी है. (नीचे भी पढ़ें)

ग्रामीणों के अनुसार 15 वर्ष पूर्व यहां ग्रेड वन की सड़क यानी बोल्डर और मुरुम से कच्ची सड़क का निर्माण विधायक निधि से कराया गया था, लेकिन जब यह कच्ची सड़क टूट गई उसके बाद ग्रामीणों ने क्षेत्र के विधायक, सांसद और जिला परिषद सदस्यों के अलावा जिले के आला अधिकारियों के दरवाजे भी खटखटाए, लेकिन नतीजा सिफ़र ही निकला.अब तो आलम ये है कि सड़क पर केवल बोल्डर नजर आते हैं. यहां के ग्रामीण बताते हैं, कि जनप्रतिनिधि से लेकर सरकारी अफसरों के चक्कर काट कर सभी थक चुके हैं, बावजूद इसके आज तक यह सड़क नही बना. स्थानीय समाजसेवियों के अनुसार ग्रामीणों को काफी असुविधाओं का सामना करना पड़ता है, लेकिन इनकी सुनने वाला कोई नही है. ये बताते हैं, कि गांव वालों की एक ही मांग है, कि यहां सड़क का निर्माण हो जाए, ताकि सुदूरवर्ती गांव भी मुख्य सड़क से जुड़ सके और यहां के ग्रामीणों की समस्या का समाधान हो सके. वैसे इस बार क्षेत्र की जनता ने पिछली सरकार में मंत्री रहे तीन बार के आजसू विधायक रामचन्द्र सहिस को छोड़ नए झामुमो विधायक मंगल कालिंदी पर भरोसा जताया है, लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी ग्रामीणों के वर्षों से लंबित मांग अबतक अधूरे ही हैं.

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