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jamshedpur-new-park-with-great-love-story-जमशेदपुर में बन रहा एक ऐसा पार्क, जहां पिता-पुत्र और पति-पत्नी के अनूठे प्रेम और समर्पन को बयां करेगा यह पार्क, जानें जमशेदपुर में कहां बन रहा है, एक ऐसा पार्क जहां पति के साथ पत्नी की भी लग रही प्रतिमा

सर दोराबजी टाटा की याद में बन रहा पार्क में बनाया गया वह गोल्डन डायमंड के आकार का स्ट्रक्चर, जिसको मेहरबाइ टाटा ने टाटा स्टील के कर्मचारियों के वेतन के लिए गिरवीं रखवा दी थी.

जमशेदपुर : वैसे तो प्रेम कहानियां कई सारी है, लेकिन एक ऐसी कहानी एक ऐसे व्यक्तित्व की है, जो पिता-पुत्र के प्यार और समर्पण भाव को परिलक्षित करता है तो पति-पत्नी के बीच के मोहब्बत के साथ समर्पण भाव को भी सामने लाता है. ऐसे ही व्यक्तित्व थे टाटा संस के पूर्व चेयरमैन सर दोराबजी टाटा. उनके नाम पर जमशेदपुर के ऐतिहासिक कीनन स्टेडियम के सामने दोराबजी टाटा पार्क की स्थापना की गयी है. पहले उसको मोदी पार्क के नाम से जाना जाता था. सर दोराबजी टाटा के इस पार्क को 16 सितंबर 1995 को समर्पित किया गया था. उस वक्त टाटा संस के निदेशक एसए सबावाला ने इसका उदघाटन किया था. दो रोज गार्डेन, तीन फाउंटेन और सर दोराबजी टाटा की प्रतिमा यहां स्थापित है, जिसकी स्थापना टाटा स्टील के टाउन डिवीजन (अब जुस्को) लॉरेंस फ्रांसिस और जतिंदर सिंह ने संयुक्त रुप से बनाया था. करीब 25 साल के बाद इसको नया लुक दिया जा रहा है, जिसमें बदलाव तो हो रहा है, लेकिन इस बदलाव के साथ ही सर दोराबजी टाटा के अपने पिता के प्रति कर्तव्य और प्रेम को दर्शाता है जबकि सर दोराबजी टाटा के साथ इस बार उनकी पत्नी लेडी मेहरबाई टाटा की भी प्रतिमा को भी यहां स्थापित किया जायेगा. यह पहला पार्क होगा, जहां पति के साथ पत्नी की भी प्रतिमा स्थापित होगी. दरअसल, टाटा स्टील की स्थापना का सपना जमशेदजी नसरवानजी टाटा ने देखा था, लेकिन वे इस सपने को साकार नहीं कर पाये थे क्योंकि उससे पहले ही उनकी मौत हो गयी थी. उनकी मौत के बाद उनके बड़े बेटे सर दोराबजी टाटा ने इसकी कमान संभाली और उनके ही मेनत के बल पर 26 अगस्त 1907 को 2,31,75,000 रुपये की मूल पूंजी के साथ टाटा स्टील (पहले टिस्को नाम था) को पंजीकृत कराया और फिर 1908 में टाटा स्टील का निर्माण शुरू हुआ और आज 113 साल के बाद भी टाटा स्टील ना सिर्फ जमशेदपुर बल्कि पूरे झारखंड, बिहार और पूर्वोत्तर भारत ही नहीं बल्कि दुनिया में भारत की पहचान बन चुकी है. इस तरह सर दोराबजी टाटा ने कंपनी की स्थापना कर अपने पिता को दिये गये वादे को निभाया.

सर दोराबजी टाटा की प्रतिमा, जिसके साथ मेहरबाई टाटा की भी प्रतिमा स्थापित होगी.

टाटा स्टील में एक वक्त ऐसा भी आया, जब सर दोराबजी टाटा के पास कर्मचारियों को वेतन देने का पैसा नहीं था. वर्ष 1924 में यह हालात उत्पन्न हुए थे. उस वक्त सर दोराबजी टाटा ने अपने मोती जड़ित टाइपिन और उनकी पत्नी लेडी मेहरबाइ टाटा को गिफ्ट में दिये गये जुबिली डायमंड को गिरवीं रख दिया था, जिसको इंपीरियल बैंक ने एक करोड़ रुपये उनके इन गहनों को रखने के बाद व्यक्तिगत लोन के तौर पर दिया था. इस जुबिली डायमंड के बारे में कहा जाता है कि वह डायमंड कोहिनूर के आकार से भी दोगुना था और क्वीन विक्टोरिया के साथ ऐसा गहना था और यह दुनिया का सबसे बड़ा डायमंड में से एक था, जिसको सर दोराबजी टाटा ने पेरिस से खरीदकर अपनी पत्नी लेडी मेहरबाई टाटा को गिफ्ट दिया था. एक पत्नी के तौर पर लेडी मेहरबाइ टाटा ने अपनी भूमिका निभायी थी, जिसको सर दोराबजी टाटा ने ही गिफ्ट में दिया था, लेकिन संकट के वक्त अपने सबसे महंगे और प्यारे गहने को भी गिरवीं रखने के लिए दे दी थी. इस तरह मेहरबाइ टाटा की भूमिका भी यादगार है. इसको देखते हुए वहां सर दोराबजी टाटा की प्रतिमा के साथ पहली बार उनकी पत्नी मेहरबाई टाटा की भी प्रतिमा स्थापित की जा रही है. लेडी मेहरबाई टाटा की प्रतिमा के साथ ही यहां एक बड़ा सा डायमंड आकार का स्ट्रक्चर भी तैयार किया जा रहा है, जो जुबिली डायमंड के सामान होगा और उस वक्त लेडी मेहरबाई के उठाये गये कदम को यहां यादगार के तौर पर इसको संजोया जा रहा है. इस पार्क में एक पति के प्रति पत्नी के दायित्व, प्यार और कर्तव्यपरायणता को भी दर्शाया जायेगा तो एक पिता के साथ किये गये वादे को सर दोराबजी टाटा द्वारा पूरा जिस तरह से किया गया था, उसको भी दर्शाया जा रहा है. इसको हर हाल में सितंबर में पूरा कर लेने का लक्ष्य है.

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