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jharkhand-assistant-policemen-झारखंड के सहायक पुलिसकर्मियों का दर्द सुनिये मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जी, यह पीड़ा है, जो छलक रहा है, ये भी आपके ही राज्य के आदिवासी-मूलवासी है, देखिये-video-कैसे बिलख रहे है, नक्सलियों और अपराधियों से लोहा लेने वाले सहायक पुलिसकर्मी इतने बेबस है आपके ही शासन मेंं-video, पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के कार्यकाल में दी गयी थी नौकरी, रघुवर दास उनके पास पहुंचे तो रो पड़े सहायक पुलिसकर्मी

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सहायक पुलिसकर्मी का दर्द देखिये-video-वीडियो

रांची : झारखंड की राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में 24 दिनों से सहायक पुलिसकर्मी अपने वेतन और स्थायी नौकरी देने की मांग को लेकर आंदोलनरत है. वे लोग अपने बच्चों के साथ वहां बैठे हुए है. ये सारे लोग सरकार से गुहार लगा रहे है कि उनको नौकरी दे दी जाये. उनको सहायक पुलिसकर्मी के तौर पर रघुवर दास की सरकार के वक्त बहाल किया गया था और कहा गया था कि उनको सरकार स्थायी नौकरी पर बहाल कर लेगी. इसके लिए बकायदा शारीरिक जांच भी हुई और दौड़ भी लोगों ने लगायी, सारी जांच से वे लोग गुजरे, लेकिन आज तक उनको नौकरी और पैसा तक नहीं मिल पाया. हालात यह है कि सारे लोग गुस्से में है. ये सहायक पुलिसकर्मी अपने बच्चों के साथ मोरहाबादी मैदान में डटे हुए है. बुधवार को पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवर दास जब उनसे मिलने पहुंचे तो उनका दर्द छलक गया. सहायक पुलिसकर्मियों ने तो हेमंत सोरेन की सरकार पर सवाल उठाया कि वे लोग भी आदिवासी ही है, उनको भी पैसे चाहिए, नौकरी चाहिए, वे लोग 24 दिनों से ऐसे बैठे है, फिर भी क्यों नहीं सरकार पूछने आ रही है. बाद में खुद रघुवर दास ने वहां ऐलान किया कि अगर झारखंड की हेमंत सोरेन की सरकार एक सप्ताह में उनकी मांगों को लेकर संवेदनशीलता नहीं दिखाती है और फैसला लेती है तो वे खुद धरना देंगे. (नीचे देखे वीडियो और पूरी खबर)

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सहायक पुलिसकर्मी का बयान वीडियो-video

उन्होंने इसको लेकर एक पत्र भी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को लिखी है. उन्होंने अपने पत्र में कहा है कि झारखंड अति नक्सल प्रभावित राज्यों में से एक है. यहां के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की आर्थिक स्थिति दयनीय होने के कारण नक्सली गतिविधियों में यहां के युवा मजबूरी में शामिल होते रहे हैं. हमारी (रघुवर दास-भाजपा) सरकार ने काफी विचार विमर्श के पश्चात नक्सल क्षेत्र के युवक एवं युवतियों को विकास की मुख्यधारा में शामिल करने के उद्देश्य से राज्य में सहायक पुलिसकर्मी की नियुक्ति की महत्वकांक्षी योजना प्रारंभ की थी, जिसमें नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के युवक एवं युवतियों को सहायक पुलिस के रूप में नियुक्त कर तीन वर्षों का पुलिस प्रशिक्षण दिया गया था, जिसे भविष्य में राज्य में उपलब्ध होने वाली पुलिस पदों की नियुक्तियों में प्राथमिकता देकर समायोजित किया जाना था. सहायक पुलिस के रूप में प्रशिक्षित ये कर्मी अब काफी उपयोगी हो चुके हैं, जिनका उपयोग ट्रैफिक पुलिस, सुरक्षा पुलिस के रूप में किया जाता रहा है. (नीचे देखे पूरी खबर)

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कोरोना काल में इनकी भूमिका काफी उपयोगी एवं सराहनीय रही है. यह भी उल्लेखनीय है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के इन युवक एवं युवतियों का सहायक पुलिस के रूप में नियुक्त होने के फलस्वरूप राज्य में नक्सल गतिविधियों मे कमी आयी थी. कारण यह था कि पूर्व में जहां नक्सल क्षेत्रों से संबंधित युवक भटककर एवं आर्थिक प्रलोभन के कारण नक्सल गतिविधियों में शामिल हो जाते थे, वहीं पर सहायक पुलिसकर्मी के रूप में नियुक्ति होने के कारण वे मुख्यधारा में शामिल हुए. मानदेय प्राप्त होने के कारण उनकी आर्थिक स्थिति सबल हुई और अपने पैरों पर खड़े हो पाये. फलतः नक्सल गतिविधियों के लिए स्थानीय युवक उपलब्ध नहीं हो रहे थे. दुर्भाग्य की बात है कि ये सहायक पुलिसकर्मी जो स्थानीय आदिवासी-मूलवासी ही हैं, अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ पिछले 24 दिनों से अपने जीवकोपार्जन के लिए रांची में विषम परिस्थितियों में नवरात्र-दुर्गा पूजा के बीच आंदोलनरत हैं. इनकी स्थिति नाजूक हो गयी है. (नीचे देखे पूरी खबर)

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आंदोलन के कारण इनके बच्चों की पढ़ाई भी छूट गयी है. चार पुलिसकर्मी की मौत हो चुकी है और विगत दिनों में एक और महिला सहायक पुलिसकर्मी जो गुमला की रहनेवाली थी, की भी मौत हो गयी है. उन्होंने सरकार से मांग की है कि तत्काल इनकी सेवा पूर्व की भांति ली जाये तथा इनके मानदेय में प्रतिवर्ष निश्चित अनुपात में वृद्धि की जाये, प्रति वर्ष पुलिस पदों की रिक्तियों के विरूध होनेवाली नियुक्तियों में सहायक पुलिसकर्मी को प्राथमिकता दी जाये और इसके लिए सहायक पुलिसकर्मियों के प्रशिक्षण-सेवा के प्रत्येक वर्षों के लिए अतिरिक्त अंक दिये जा सकते हैं, जिन पांच सहायक पुलिसकर्मियों की मौत हुई है, उन्हें सरकार मुआवजा राहत राशि प्रदान करे.

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