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धूमधाम से पूजे गए करम राजा, नाच-गाकर हुई प्रकृति की पूजा

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जमशेदपुर : आदिवासियों का महान करम पर्व धूमधाम के साथ मनाया गया. इसके तहत भाद्रपद शुक्ल पक्ष एकादशी को करमा पर्व मनाया जाता है. इस दिन करम राजा की पूजा अर्चना की जाती है. एक दिन पहले आदिवासी समुदाय की युवतियां करम राजा को नियंत्रण देती है और करम डाल लाकर अपने घर आंगन में स्थापित करती है. सोमवार को पूरे आदिवासी विधि-विधान के साथ करम राजा की पूजा अर्चना की गयी. मूलत: झारखंड के आदिवासी और मूलवासी इस करम पर्व कसो मनाते है. वैसे यह सात दिनों से ही पूजा चलता है. आदिवासी समुदाय के लोग करम राजा की पूजा करने के दौरान अच्छे फसल की कामना क रते है. बहनें अपने भाइयों की सलामती की भी दुआएं मांगती है.

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इस दौरान करम गीत भी गाये गये, जिसमें सातों भाइयों रे, सातो करम गड़ाये, सातो भाइयां रे सातो करम गड़ाय को गीत गाकर करम राजा का पूजा किया जाता है. आदिवासी समुदाय के कुंवारी बहनें करम से सात दिन पहले करम जावा उठाती है, जिसके तहत करम जावा में सात प्रकार के अनाज मकई, धान, गेहूं, चना, उड़द, कुरथी और बोदी शामिल है. नयी टोकरी में बालू भरकर उसे कुंवारी लड़कियां बोती है. हर शाम हल्दी का पानी उस पर डालकर लड़कियां उसको सीचंती है. सातवें दिन उसमें पौधे निकल जाते है. ललोग ढोल-मांदर की थाप पर फिर जंगल की ओर जाकर करम पेड़ की डाली काटकर लाते है और पूजा अर्चना कर जमकर झूमते नाचते है.

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करम पेड़ की तीन छोटी डालियां काटते हैं. एक भाई पेड़ पर चढ़ता है और बाकी भाई उस डाल को पकड़ने के लिए नीचे खड़े रहते हैं. ऐसी मान्यता है कि डाल एक ही प्रहार में टूटनी चाहिए. इसके बाद ढोल-नगाड़ों के साथ करम डाल को गांव में लेकर आते हैं और इसे सबसे पहले घर की छत पर रखा जाता है. इसके बाद पाहन (पुजारी) तीनों डालियों को अखरा में गाड़ता है. उपवास की हुई बहनें पूजा की थाली लेकर आती हैं, जिसमें कई तरह के पकवान होते हैं. खीरा होता है जिसे बेटे के प्रतीक के रूप में माना जाता है. इस दौरन पाहन करम की कहानी बताते हैं. सारी रात गांव के लोग करम को घेरकर नाचते-गाते हैं. पुरुष कानों में और महिलाएं अपने जूड़े में जावा खोंसती हैं. अगले दिन सुबह ही करम के विसर्जन का समय होता है. करम की डाल को सबके घर में घुमाने के बाद उसे नदी में विसर्जित कर दिया जाता है.

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