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Saraikela-Chota-Gamhariya : छोटा गम्हरिया के न्यू कॉलोनी की अमर शहीद निर्मल महतो सड़क के नाम पर हुई राज्य भर में राजनीति, स्थानीय विधायक मंत्री हैं, 15 वर्षों से लगातार कर रहे क्षेत्र का प्रतिनिधित्व, फिर भी सड़क बदहाल

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Saraikela: झारखंड आंदोलनकारी शहीद निर्मल महतो के नाम पर पिछले दिनों झारखंड में खूब राजनीति हुई. आपको याद दिला दें बीते 15 अगस्त को राज्य के मुख्यमंत्री ने पीएमसीएच धनबाद का नाम बदलकर निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज अस्पताल किए जाने की घोषणा की थी. जहां धनबाद के भाजपा सांसद पीएन सिंह और विधायक राज सिन्हा ने आपत्ति जताई थी जिसके बाद विपक्ष के साथ कुड़मी समुदाय भी आंदोलित हो उठा था, और सड़क पर उतर कर दोनों नेताओं के विरोध में जमकर प्रदर्शन किया था. वैसे आपको यहां जानकर आश्चर्य होगा कि जिस अमर शहीद निर्मल महतो के नाम पर राज्य में राजनीति हुई, उसी निर्मल महतो के नाम पर सरायकेला- खरसावां जिला मेंसबसे ज्यादा आबादी वाले क्षेत्र छोटा गम्हरिया पंचायत के अंतर्गत न्यू कॉलोनी में बनी सड़क अपनी बदहाली बयां कर रही है. एक ही विधायक पिछले 15 सालों से लगातार क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. वर्तमान सरकार में मंत्री भी हैं, लेकिन सत्ता बदलने के बाद भी यह सड़क बदहाल है.

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छोटा गम्हरिया पंचायत स्थित वीर शहीद निर्मल महतो पथ से कई बड़े-बड़े दिग्गज नेता जो झारखंड मुक्ति मोर्चा और भारतीय जनता पार्टी जैसे पार्टियों से जुड़े हुए हैं, लेकिन इस सड़क से होकर अंदर बड़ी आवासीय कॉलोनी में रहने वाले नेताओं की आंखें बंद हैं. वैसे यह सड़क अब केवल नाम का ही रह गया है. जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की बेरुखी ने इस सड़क को निर्मल महतो पथ से निर्मल महतो गटर बना दिया है. पूरा सड़क गंदे नाले के गटर या यूं कहें तो नाले में तब्दील हो चुका है. आलम ये है कि 14 किलोमीटर लंबे इस सड़क से शायद ही साफ कपड़े पहनकर बिना गंदे पानी को छुए कोई यहां से निकल पाए. वहीं स्थानीय लोग इसे अपनी नियति मान चुके हैं और सबकुछ ऊपरवाले के हाथों छोड़ चुके हैं.

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स्थानीय पंचायत समिति सदस्य अजित सिंह ने बताया कि पिछले एक साल से उक्त सड़क की समस्या से गम्हरिया प्रखंड विकास पदाधिकारी को लिखित तौर अवगत करा चुके हैं, लेकिन मामला जस का तस बना हुआ है. उन्होंने बताया कि कुछ दिन पहले भी इस मामले को लेकर बीडीओ से पुनः गुहार लगायी इस बार बीडीओ ने जूनियर इंजीनियर और अन्य पदाधिकारियों को मामले की जांच सौंपी है, लेकिन यह मामला जांच के फ़ाइलों में ही फंस कर रह गया है. निश्चित तौर पर राज्य में सत्ता बदलने के बाद भी जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए आज भी संघर्ष करती नजर आ रही है. कोरोना महामारी के दौर में उद्योग- धंधे, कल- कारखाने, सरकारी खजाने में धनोपार्जन के सभी योजनाएं संचालित होने लगे हैं. लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा के सत्र शुरू हो चुके हैं. बिहार में विधानसभा चुनाव का बिगुल भी बज चुका है, लेकिन जनता के लिए विकास योजनाएं कोरोना के गाल में ही फंसा हुआ है.

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