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Saraikela-Durga-Puja : सरायकेला में होती है झारखंड की एकमात्र सरकारी दुर्गा पूजा, 16 दिनों का होता है आयोजन, एसडीओ होते हैं मुख्य यजमान, क्या है खासियत-पढ़ें

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संतोष कुमार / सरायकेला : झारखंड में 24 जिले हैं और सभी जिलों की कोई ना कोई विशेषता है, लेकिन सरायकेला-खरसावां में आज भी पौराणिक और ऐतिहासिक घटनाओं को अपने में संजोए रखा है. झारखंड में सरायकेला जिला एकमात्र ऐसा जिला है जहां आजादी के 70 साल बीतने के बाद भी सरकारी फंड से दुर्गा पूजा का आयोजन होता है. इतना ही नहीं दुर्गा पूजा के अलावा अन्य नौ पूजा पारंपरिक तरीके से सरकार अपने खर्च से करती है. सरायकेला में 359 वर्षों से तांत्रिक मत से दुर्गा पूजा का आयोजन हो रहा है. राजमहल में जिउतिया अष्टमी से सोलह पूजा के साथ दुर्गा पूजा का शुभारंभ किया जाता है. मां पाउड़ी के मंदिर में जिउतिया अष्टमी से महाअष्टमी तक सोलह दिनों तक पाउड़ी देवी की पूजा की जाती है, जिसमें रोज बकरे की पूजा की जाती है. महाअष्टमी के बाद नुवाखिया की परंपरा है. उस दिन राज परिवार के शादीशुदा सदस्य नदी से नए घड़े में जल लेकर आते हैं. नए घड़े में नया चावल, ताजा पानी एवं नये चूल्हे में खीर पकायी जाती है. पहले राजमहल के बाहर उस जगह पर दुर्गा पूजा का आयोजन किया जाता था, जहां बार एसोसिएशन का भवन है. (नीचे भी पढ़ें)

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बाद में वर्तमान दुर्गा पूजा मैदान में उत्तर दिशा पर खपरैल का मंदिर बनाकर सार्वजनिक दुर्गा पूजा के नाम पर पूजा का आयोजन होता है. सरायकेला राजघराने की बेटी हेमप्रभा देवी की शादी पटियाला के राजघराने में हुई थी, उन्होंने खपरापोस की जगह एक पक्का मंदिर का निर्माण कराया. वर्षों तक यहां जनसहयोग से दुर्गा पूजा का आयोजन किया गया. कालांतर में श्रद्धालुओं ने मंदिर के नव निर्माण का निर्णय लिया और जनसहयोग से विभिन्न कलाकृतियों के साथ दुर्गा मंदिर का निर्माण किया. षष्ठी को बेलवरण के साथ दुर्गा पूजा का शुभारंभ होता है. सप्तमी को खंडा धुआं होता है. जिसमें राजपरिवार के लोग अस्त्र लेकर नदी जाते है और इसकी सफाई कर वनदेवी की पूजा-अर्चना करते हैं. महाअष्टमी को संधि बलि की परंपरा है. जिसमें भैंसे की पूजा की जाती है. राजमहल के बाहर दुर्गा पूजा में नवमी को भैंसे की पूजा होती है. जबकि पूजा के दौरान दर्जनों भेड़-बकरे की पूजा होती है. (नीचे भी पढ़ें)

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1954 से हो रही सरकारी पूजा
सरायकेला में 1954 से प्रशासन सरकारी दुर्गा पूजा आयोजित करती है. आजादी से पूर्व सरायकेला में दुर्गा पूजा का आयोजन यहां के राजा-महाराजा करते थे. आजादी के बाद रियासतों के विलय के दौरान सरकार ने राजस्टेट द्वारा किये जा रहे सभी धाíमक अनुष्ठान का आयोजन प्रशासन द्वारा करने का समझौता किया. सरायकेला राज स्टेट के विलय के बाद राजमहल में दुर्गा पूजा का आयोजन पूर्व की भांति होने लगा और राजमहल के बाहर जनसहयोग से पब्लिक दुर्गा पूजा का आयोजन तांत्रिक मत से किया जा रहा है. 1954 में सरायकेला नगर स्थित बस स्टैंड पर मंदिर निर्माण कर सरकारी दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई. पुराना मंदिर जर्जर हाने पर यहां नये सिरे से भव्य मंदिर का निर्माण किया गया और दुर्गा पूजा के साथ-साथ लक्ष्मी व काली पूजा का आयोजन किया जाने लगा. (नीचे भी पढ़ें)

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सरायकेला एसडीओ होते हैं सरकारी पूजा के मुख्य यजमान
सरायकेला जिले में वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के बीच सरकार और आम लोगों में जबरदस्त आस्था और उल्लास बना रहता है. लोग बड़े ही धूमधाम के साथ दुर्गा पूजा मनाते हैं, हालांकि इस साल कोराना संक्रमण को लेकर सरकारी नियमों के अनुसार ही दुर्गा पूजा संपन्न होंगे. दुर्गा पूजा के आयोजन में सरायकेला सिविल एसडीओ पूजा के मुख्य यजमान बनकर पूजा में शामिल होते हैं. (नीचे भी पढ़ें)

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राजमहल मंदिर में राजा- रानी करते हैं पूजा
सरायकेला राजमहल में जिउतिया अष्टमी से 16 दिनों तक चलने वाले पूजा का आयोजन किया जाता है. इस दौरान राज परिवार के राजा- रानी समेत अन्य सदस्य पूजा में शामिल होते हैं. राज परिवार की सदियों की परंपरा रही है कि 16 दिनों तक दुर्गा पूजा का आयोजन किया जाता है, जिसमें राज परिवार के सभी सदस्य पूरे भक्ति भाव के साथ शामिल होते हैं. सरायकेला रियासत के राजा प्रताप आदित्य सिंह देव ने बताया कि पहले राजतंत्र के दौरान विभिन्न राज परिवारों की ओर से मां पाउड़ी मंदिर में पूजा की जाती थी, लेकिन इसे अब केवल सरायकेला राज परिवार ही निभा रहा है. जिउतिया अष्टमी से महाअष्टमी तक 16 दिनों की दुर्गा पूजा होती है. महाषष्टि तक यह पूजा राजमहल के अंदर पाउड़ी मंदिर में होती है, जिसके बाद शस्त्र -पूजा के साथ राजमहल के बाहर स्थित दुर्गा मंदिर में आम लोगों के लिए यह पूजा होती है. (नीचे भी पढ़ें)

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पाउड़ी मंदिर में नहीं है बाहरी लोगों के जाने की अनुमति
मां पाउड़ी मंदिर में बाहरी लोगों के जाने की अनुमति नहीं है. इस मंदिर में केवल राजा और रानी ही पूजा करने जाते हैं. साल में एक बार दुर्गा पूजा के दौरान षष्ठी में शस्त्र पूजा को लेकर राज परिवार के लोग मंदिर में जाते हैं. इस मंदिर में स्त्री को साड़ी पहनकर, जबकि पुरुष धोती और गमछा पहनकर ही प्रवेश पा सकते हैं. 16 दिनों तक मां पाउड़ी मंदिर में आयोजित होने वाले दुर्गा पूजा का खास महत्व है, आज भी यहां वर्षों से चले आ रहे पौराणिक परंपरा का पूरे तन्मयता के साथ निर्वहन किया जा रहा है. (नीचे भी पढ़ें)

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21वीं सदी में भी है राजपरिवार की परंपरा
सरायकेला जिले के राजमहल में आयोजित होने वाली दुर्गा पूजा कई मायनों में खास है. एक तो यह दुर्गा पूजा 16 दिनों तक आयोजित की जाती है, जबकि आज एक 21वीं सदी में भी यहां राजतंत्र के समय से ही चली आ रही तांत्रिक परंपरा और बलि प्रथा को कायम रखा गया है, हालांकि बदलते वक्त और दौर में केवल परंपरा निर्वहन को लेकर बलि की प्रथा आयोजित की जाती है. बताया जाता है कि राजतंत्र के समय में भी राजमहल में आयोजित होने वाली इस दुर्गा पूजा में आम जनता की भागीदारी को लेकर राजा आम जनता से लगान लेकर राजमहल में आयोजित होने वाले पूजा में इसे लगाते थे, ताकि राज परिवार के साथ-साथ आम जनता भी पूजा में अपनी भागीदारी निभाए.

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