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करीम सिटी कॉलेज के हिंदी विभाग में दो दिवसीय वेब संगोष्ठी सम्पन्न : जनपक्षधरता ही सहित्य और मीडिया का वास्तविक सरोकार

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जमशेदपुर : करीम सिटी कॉलेज के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी के पहले दिन “वर्तमान चुनौतियों और कविता के सरोकार” विषय पर व्याख्यान संपन्न हुआ। मुख्य वक्ता के रूप में असम विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग के प्रोफेसर डॉ कृष्णमोहन झा ने संगोष्ठी को संबोधित किया। कॉलेज के प्राचार्य डॉ मो रियाज़ ने मुख्य वक्ता के साथ संगोष्ठी में शिरकत करने वाले सभी प्रतिभागियों, शोधार्थियों और प्राध्यापकों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी के महत्व को रेखांकित किया। संगोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठित कवि और असम विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग के प्रोफेसर डॉ कृष्ण मोहन झा पधारे । सर्वप्रथम संगोष्ठी के संयोजक एवं हिंदी विभाग करीम सिटी कॉलेज के प्राध्यापक डॉ सुभाष चन्द्र गुप्त ने विषय प्रवर्तन करते हुए वर्तमान परिदृश्य का शब्दचित्र खींचा। इसके बाद मुख्य वक्ता डॉ कृष्णमोहन झा ने वर्तमान दौर की चुनौतियों के संदर्भ में कविता के सरोकार पर विस्तार से चर्चा करते हुए बताया कि समकालीन कविता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है उस व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़ा होना जहां आम आदमी की स्वतंत्रता और समता का हनन होता है। उन्होंने वर्तमान समय मे सूचना और संचार के विस्फोटक विकास के उपजे बाज़ारवाद, राष्ट्रवाद और भूमंडलीकरण की चुनौतियों की व्यापक संदर्भों में चर्चा करते हुए बताया कि व्यक्ति के स्वतंत्रता और समता पर लगातार हमला हो रहा है।

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प्रो झा ने बताया कि वर्तमान दौर कई सदियों को एक साथ जी रहा है। प्रो झा ने कबीर से निराला अज्ञेय, मंगलेश डबराल और उदय प्रकाश तक को उद्धृत करते हुए कहा कि कविता को सदैव विपक्ष की भूमिका में ही होकर समाज के आम व्यक्ति के हितों की रक्षा के लिए आवाज़ उठानी होती है। प्रो झा ने वर्तमान परिदृश्य की जटिलताओं को रेखांकित करते हुए कविता की भाषा के सम्बंध में चुनौतियों को बताया तथा कहा कि भाषा में टटकापन के साथ सभी पीढ़ियों के लिए सम्प्रेषणीयता ज़रूरी है। इस चर्चा में उन्होंने तीन मुख्य चुनौतियों को प्रस्तावित किया- प्रथम चुनौती है वर्तमान परिदृश्य को कविता में अभिव्यक्त करने की चुनौती। दूसरी कविता में भविष्य की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को समुचित समेटने की। तीसरी चुनौती है कविता के व्यापक सम्प्रेषण की। इन सभी मोर्चों पर कविता अपने काल के यथार्थ को अभिव्यक्त करते हुए व्यवस्था से संघर्ष करती है, युद्ध करती है और विजयी होती है। प्रश्रोत्तरी का सफल सत्र चला। संगोष्ठी का संचालन डॉ संध्या ने किया तथा अंत मे हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ सफीउल्लाह अंसारी ने डॉ कृष्णमोहन झा एवं संगोष्ठी में शिरकत करने वाले सभी प्रतिभागियों को धन्यवाद दिया।

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संगोष्ठी के दूसरे दिन का विषय था वर्तमान चुनौतियाँ और मीडिया के सरोकार। मुख्य वक्ता के रूप में देश के जाने-माने मीडिया विशेषज्ञ और भारतीय जनसंचार संस्थान नई दिल्ली के प्रोफेसर डॉ आनंद प्रधान ने संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि मीडिया की बुनियादी जिम्मेवारी है सच को जनता तक पहुंचाना पर आज की मीडिया अपनी इस जिम्मेदारी नहीं निभा रही है। मीडिया का चरित्र और सरोकार बदल रहे हैं। दरअसल आज की मीडिया जनपक्षधर्मी मीडिया नहीं होकर मीडिया कॉरपोरेट मीडिया है। पी. साईंनाथ का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि मीडिया का एक बिजनेस मॉडल बड़ी पूंजी जुड़ा है। इसलिये कॉरपोरेट मीडिया सच बोल ही नहीं सकती क्योंकि सच उजागर होते ही बिजनेस का भी पूरा मॉडल बिखर जाएगा। आज की मीडिया हमें उपभोक्ता बना रही है और हमारे भीतर की नागरिक चेतना को नष्ट कर रही है। जो सिर्फ फीलगुड की नीति द्वारा उपभोक्ता प्रवृत्ति को जगाकर बाजार को मजबूत करती है। उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में पत्रकारिता से जुड़ा कोई शोधार्थी अखबारों चैनलों के आधार पर भारत में शोध करेगा तो उसके तथ्य, विश्लेषण और निष्कर्ष गलत होंगे क्योंकि इस दौर की खबरों में न दलित है, ना आदिवासी है, ना मजदूर है ना आम आदमीऔर न मरते हुए किसान हैं। अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि बड़े-बड़े मीडिया घराने लॉकडाउन में संकट में फंस गए हैं।

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डॉक्टर आनंद प्रधान ने वैकल्पिक मीडिया का रास्ता तैयार करने पर जोर दिया जो भारत की जनता और जनतंत्र के लिए भी जरूरी है जिसे नागरिक और समाज से हर तरह का सहयोग मिलना चाहिए। एक नागरिक के रूप में हमें मीडिया को देखने का नजरिया बदलना होगा। इसलिए जो अखबार जो, चैनल परिवारवाद, संप्रदायिकता, जातिवाद भेदभाव फैलाने लगे उसका सामूहिक बहिष्कार करना चाहिए।

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डॉ आनंद प्रधान के वक्तव्य के उपरांत मास कॉम की अध्यक्ष डॉ नेहा तिवारी ने प्रश्नोत्तरी सत्र का संचालन करते हुए प्रतिभागियों के प्रश्नों का उत्तर डॉ प्रधान से लिया। संगोष्ठी में डॉ अनवर शहाब, डॉ. अनवर आलम, डॉ. कौसर, डॉ याहया, डॉ ज़की, डॉ अशरफ़ बिहारी, प्रो दास, प्रो साकेत कुमार, प्रो परवीन उस्मानी, कुमुद रंजन, ऋचा इत्यादि बड़ी संख्या में शिक्षक और शोधार्थी उपस्थित रहे। प्रश्रोत्तरी का सफल सत्र चला। संगोष्ठी का संचालन डॉ संध्या ने किया तथा अंत मे हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ सफीउल्लाह अंसारी ने एवं संगोष्ठी के मुख्य वक्ताओं और शिरकत करने वाले सभी प्रतिभागियों को धन्यवाद दिया।

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