jamshedpur-mla-saryu-roy-तीन-तीन मुख्यमंत्री को जेल भिजवा चुके सरयू राय फिर एक्शन में, पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के खिलाफ सबूत और कानूनों के उल्लंघन की पूरी सूची मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भेजी, किया मांग, देखे क्या है पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के खिलाफ सरयू राय के पास 43 से अधिक सबूत

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जमशेदपुर : भ्रष्टाचार को लेकर तीन-तीन मुख्यमंत्रियों को जेल भिजवाने वाले राज्य के पूर्व मंत्री और जमशेदपुर पूर्वी के विधायक सरयू राय एक बार फिर से एक्शन में नजर आये है. राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नाम उन्होंने एक लंबा-चौड़ा पत्र भेजा है. इस पत्र में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से सरयू राय ने झारखंड के निवर्तमान मुख्यमंत्री रघुवर दास द्वारा झारखंड में लौह-अयस्क के अवैध खनन को प्रोत्साहित करने, सरकारी खजाना पर अरबों रूपया की चपत लगाने, अवैध खनन के दोषियों को नियमानुकूल कारवाई से बचाने, अवैध खनन करने वालों पर लगाये गये अरबों रूपये के जुर्माना की वसूली नहीं करने, महाधिवक्ता के साथ सांठगांठ कर जुर्माना वसूली संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की अवहेलना करने, कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों को परेशान एवं प्रताड़ित करने तथा उन्हें अपमानित कर पद से हटाने के षड्यंत्र में शामिल रहने की जांच भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) से कराने तथा उनके साथ इस षड्यंत्र में शामिल अवैध खनन के अन्य दोषियों एवं षड्यंत्रकारियों को दंडित करने के संबंध में मांग की है. इसकी मांगें निम्न है. (नीचे पढ़ें पूरी खबर)

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  1. आपको मालूम है कि वर्ष 2000 से 2011 के बीच झारखंड एवं अन्य लौह अयस्क धारित राज्यों मंे बडे़ पैमाने पर लौह अयस्क का अवैध खनन हुआ था. अवैध खनन की जाँच करने के लिये यु.पी.ए. की तत्कालीन भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीश एम.बी. शाह (अवकाश प्राप्त) की अध्यक्षता में 22 नवम्बर 2010 को एक उच्च शक्ति प्राप्त जाँच आयोग का गठन किया था, जिसने अक्टूबर 2013 में अपना प्रतिवेदन भारत सरकार को सौंप दिया.
  2. आयोग ने अपनी जाँच में सिद्ध किया कि उक्त अवधि में झारखंड में बड़े पैमाने पर लौह अयस्क का अवैध खनन हुआ था. आयोग ने झारखंड में अवैध खनन करने वाले विभिन्न लौह अयस्क पट्टाधारियों पर अवैध खनन की मात्रा के हिसाब से कुल 14,541 करोड़ रूपये का जुर्माना लगाया था. यह जुर्माना अवैध खनन से उत्खनित लौह अयस्क की कीमत और इसपर ब्याज की राशि को जोड़कर था. इसी प्रकार का जुर्माना अन्य लौह अयस्कधारी राज्यों के पट्टाधारियों पर भी शाह आयोग ने लगाया था.
  3. कतिपय पट्टाधारी इसके विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय गये तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने जुर्माना पर ब्याज की राशि माफ कर दिया और आदेश दिया कि पट्टाधारियों को जुर्माना की मूल राशि का भुगतान एकमुश्त करना होगा. किश्तों में जुर्माना चुकाने की अवैध खननकर्ताओं की माँग माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया.
  4. अवैध खनन के जुर्माना की कुल मूल राशि में से ब्याज की राशि घटा देने के बाद झारखंड में अवैध खनन करने वालों पर लगायी गई जुर्माना की राशि 14,541 करोड़ से घटकर 7133 करोड़ रूपया हो गई. इसके बाद अवैध खननकर्ताओं से जुर्माना वसूल करने का काम झारखंड सरकार को करना था. इसके साथ ही अवैध खनन करने के दोषी पाये गये पट्टाधारियों के खनन पट्टों को नियमानुसार रद्द करने की कारवाई के बारे में निर्णय लेने का दायित्व भी झारखंड सरकार पर था.
  5. जिस समय शाह आयोग का प्रतिवेदन आया उस समय झारखंड में युपीए की सरकार थी जिसके मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन यानी आप स्वयं थे. तत्कालीन सरकार ने जुर्माना वसूलने के लिये त्वरित कारवाई आरम्भ किया. इसके लिये 9 जून, 2014 को एक उच्चस्तरीय समिति गठित की, ताकि शाह आयोग द्वारा चिन्हित लौह अयस्क के खनन पट्टाधारियों द्वारा अवैध खनन के दौरान की गई अनियमितताओं को चिन्हित कर नियमानुसार अग्रेतर कारवाई की जा सके. इस समिति ने 20 सितंबर 2014 को प्रतिवेदन दे दिया. समिति ने बताया कि झारखंड में लौह अयस्क का खनन करनेवाले खननकर्ताओं में से किस-किस ने किन-किन नियमों का उल्लंघन कर अवैध खनन किया है. इसके बाद झारखंड सरकार को अवैध खनन करने वालों पर नियमानुसार कारवाई करनी थी, उन्हें नोटिस जारी करनी थी, उनसे जुर्माना वसूलना था और उनका खनन पट्टा रद्द करने की कारवाई आरम्भ करनी थी.
  6. परंतु इसके कुछ ही दिन बाद झारखंड में विधान सभा के आम चुनावों की घोषणा हो गई. चुनाव के बाद आपके नेतृत्व वाली यूपीए सरकार बदल गई. इसकी जगह एनडीए की सरकार बनी. श्री रघुवर दास इस सरकार के मुख्यमंत्री बने. अब इस नवगठित सरकार को पूर्ववर्ती सरकार द्वारा तय किये गये जुर्माना की राशि को अवैध खननकर्ताओं से वसूलना था. परंतु इसके उलट इस सरकार ने अवैध खनन के दोषियों को बचाने का षड्यंत्र आरम्भ कर दिया. नवनियुक्त मुख्यमंत्री श्री रघुवर दास स्वयं इस षडयंत्र का सूत्रधार बन गये. अवैध खनन करने वालों के विरूद्ध कारवाई करने और उनसे जुर्माना वसूलने का मामला ठंढे बस्ते में पड गया. जुर्माना की वसूली रूक गई. एक षड्यंत्र के तहत यह वसूली नहीं होने दी गई.
  7. षडयंत्र का पहला कदम आरम्भ हुआ जुर्माना की राशि वसूलने की कारवाई करने के बदले जुर्माना की राशि को घटाने की साजिश करने के साथ. पश्चिम सिंहभूम जिला के खान पदाधिकारी का चाईबासा कार्यालय इस षडयंत्र का केन्द्र बना. सरकार ने पश्चिम सिंहभूम जिला के उस जिला खान पदाधिकारी को हटा दिया जिसने शाह आयोग द्वारा की गई अनुशंसा के आधार पर ब्याज समेत जुर्माना की कुल राशि 14,541 करोड़ रूपये निर्धारित किया था. खान विभाग ने पत्रांक 825/एम., दिनांक 30.05.2014 द्वारा इसकी वसूली के लिये मांग नोटिस भेजा. पत्रांक 467/एम., दिनांक 02.05.2015 द्वारा पुनः वसूली नोटिस दिया गया.
  8. बाद में इस मांग को संशोधित किया गया. 02.05.2015 को पुनः एक संशोधित मांग पत्र जुर्माना वसूली के लिये अवैध खननकर्ताओं को भेजा गया. इसमें मूलधन एवं ब्याज सहित मांग घटाकर 7,133 करोड़ रूपया कर दी गई। मांग में यह कमी शाह ब्रदर्स, एन.के.पी.के., पी.के. जैन, देबका बाई भेलजी आदि सभी खननकत्र्ताओं के संबंध में थी.
  9. सरकार ने इस जिला खान पदाधिकारी को बदलकर नया जिला खान पदाधिकारी नियुक्त किया. नवनियुक्त जिला खान पदाधिकारी ने एमएमडीआर एक्ट 1960 की धारा 21(5) के तहत जुर्माना राशि की गणना फिर से किया. पूर्ववर्ती जिला खान पदाधिकारी द्वारा की गई गणना के अनुसार शाह ब्रदर्स पर ब्याज की पूर्व निर्धारित राशि को छोड़कर जुर्माना 605.56 करोड़ रूपया थी. नये जिला खान पदाधिकारी ने पता नहीं किस फाॅर्मूला से इसको घटाकर करीब 194.59 करोड़ रूपये कर दिया. ज्ञात हो कि सर्वोच्च न्यायालय ने मूल जुर्माना पर सूद की राशि माफ कर दिया था. परंतु उस आदेश में जुर्माना चुकाने में विलंब करनेवालों के मूल जुर्माने पर विलंब अवधि के लिये सूद नहीं लेने की बात नहीं थी। प्रश्न यह है कि दोनों जिला खान पदाधिकारियों में से कौन पदाधिकारी शाह आयोग की कसौटी पर सही है ? यह जाँच के बाद ही पता चलेगा कि दोनों में से एक सही है तो दूसरा गलत है. इसलिये इसकी जाँच अवश्य होनी चाहिये और जांचोपरांत उसपर कारवाई होनी चाहिये जो दोषी है और राज्य के राजस्व को हानि पहुँचाने वाला के लिये जिम्मेदार है.
  10. शाह आयोग की अनुशंसा के अनुरूप अवैध खननकर्ताओं पर पूर्व जिला खान पदाधिकारी द्वारा लगाये गये जुर्माना राशि में इतनी भारी कटौती क्यों हुई, कैसे हुई ? इसके लिये कौन दोषी है? या तो पूर्ववर्ती जिला खान पदाधिकारी दोषी है, जिसने जुर्माना की राशि बढ़-चढ़कर तय किया या उसके बाद पदस्थापित पदाधिकारी दोषी है जिसने पूर्व निर्धारित जुर्माना राशि में भारी कटौती कर दिया. इस सवाल का जवाब सरकार टालते रही है, नहीं दे रही है. परंतु इस सवाल का जवाब चाईबासा स्थित पश्चिम सिंहभूम जिला के खान पदाधिकारी के दफ्तर के कागजातों और संचिकाओं मे रक्षित है, जिसे बाहर लाने और दोषी को दंडित करने के लिये उच्चस्तरीय जाँच की कारवाई अपेक्षित है.
  11. एक ओर जुर्माना की राशि घटा दी गई तो दूसरी ओर घटाई गई जुर्माना की राशि भी नहीं वसूली गई. बीच में वसूलने की कोई कारवाई शुरू भी हुई तो उसपर सुनियोजित षडयंत्र के तहत पानी फेर दिया गया.
  12. विधान सभा चुनाव-2014 के बाद गठित नई सरकार को अवैध खनन करने वालों पर कारवाई करने और जुर्माना की राशि वसूलने के लिये नोटिस जारी करनी चाहिये थी. जुर्माना का भुगतान करने के लिये 02.05.2015 को पत्रांक 442/एम से पत्रांक 453/एम तक के विभिन्न पत्रांकों द्वारा वसूली का माँग पत्र जारी किया गया कि संबंधित अवैध खननकर्ताओं से कुल मिलाकर 7,133.04 करोड़ रूपये का जुर्माना अदा करें. सरकार ने वसूली की नोटिस जारी किया, पर वसूली नहीं किया. इसमें मूल जुर्माना राशि 2,404.27 करोड़ रुपये और सूद की राशि 4,465.46 करोड़ रुपया थी.
  13. जुर्माना वसूलने की कारवाई चल ही रही थी कि इस बीच सरकार ने इन मामलों की पुनः जाँच के लिये पश्चिम सिंहभूम जिला के उपायुक्त की अध्यक्षता में एक नई कमिटी बना दी, जिसने 6 अप्रैल 2015 को प्रतिवेदन दे दिया. इस समिति ने भी नियमों का उलंघन कर किये गये अवैध खनन को संपुष्ट कर दिया और बताया कि अवैध खनन करने वालों ने किन किन नियमों का उल्लंघन किया है. इस समिति ने स्पष्ट रूप से अनुशंसा किया कि नियमों का उल्लंघन कर खनन अवैध खनन करने के दोषी खननकर्ताओं के खनन पट्टा का विस्तार 31 मार्च 2020 तक नही किया जाना चाहिये. यानी इनके खनन पट्टे रद्द कर दिये जाने चाहिये. पर सरकार ने यह नहीं किया।
  14. इसके बाद अवैध खनन के दोषी पाये गये खनन पट्टाधारियों के खनन पट्टों को रद्द करने और उनसे जुर्माना वसूलने के लिये भेजे गये माँग पत्रों के विरूद्ध जुर्माना वसूलने, जुर्माना नहीं देने वालों पर सर्टिफिकेट केस दायर करने आदि की कारवाई सरकार को करनी चाहिये थी। परंतु सरकार ने फिर से एक जाँच समिति गठित कर दिया। पहले की दो जाँचों में जिनके विरूद्ध अवैध खनन करने का आरोप साबित हो गया था और जिनसे जुर्माना वसूलने के लिये माँग पत्र खान विभाग से जारी हो चुका था, उनके बारे में एक और समिति गठित कर फिर से जाँच कराना कि उन्हांेने अनियमिततायें की है या नहीं की है समझ से परे है। वास्तव में यह अवैध खननकर्ताओं के विरूद्ध कारवाई को लटकाने की सोची समझी साजिश थी। इस जाँच समिति ने भी जांचोपरांत 17.07.2015 से 23.07.2015 के बीच अलग अलग प्रतिवेदन सरकार को सौंपा और पूर्व में गठित दो जाँच समितियों की ही तरह अवैध खनन को संपुष्ट कर दिया. इसके बावजूद तत्कालीन सरकार ने दोषियों पर कारवाई नही किया. इनसे अवैध खनन का जुर्माना वसूलने की बात तो सरकार भूल ही गई.
  15. इसके बाद भी जुर्माना वसूली को स्थगित कर राज्य सरकार ने एक और उच्चस्तरीय समिति राज्य के विकास आयुक्त की अध्यक्षता में गठित किया. खान एवं उद्योग विभाग के सचिव भी इसमें शामिल किये गये. इस समिति ने खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम-1957 तथा खनिज समानुदान नियमावली-1960 के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत विधिवत सुनवाई की. अवैध खनन के आरोपी खनन पट्टाधारियों को सुनवाई के लिये 60 दिनों की नोटिस दिया. विस्तार से सुनवाई किया और प्रतिवेदन दिया कि सभी 23 लौह अयस्क पट्टाधारी नियमों का उल्लंघन कर अवैध खनन करने के दोषी हैं. इसलिये इनके खनन पट्टों को सरकार रद्द करे. इस अनुशंसा के आधार पर खान विभाग ने 01.04.2016 को अधिसूचना निकालकर दोषी पाये गये 23 लौह अयस्क पट्टाधारियों के खनन पट्टों को रद्द कर दिया और गजट अधिसूचना प्रकाशित कर रद्द किये गये खनन पट्टों का स्वामित्व अपने पास ले लिया.
  16. लगा कि अब अवैध खनन पर कारवाई के मामले का पटाक्षेप हो गया. सरकार दोषियों से भारी भरकम जुर्माना की राशि वसूलेगी और अवैध खनन करने वालों पर कारवाई करेगी. पर ऐसा हुआ नहीं. षड्यंत्रकारियों ने ‘तू डाल-डाल तो हम पात-पात’ का नया खेल आरम्भ किया. सरकार भी राज्यहित और जनहित को ताक पर रखकर षडयंत्र के इस खेल का एक किरदार बन गई. गहरा षडयंत्र रचा गया कि अवैध खननकर्ताओं के पक्ष में दबाव बनाने के बावजूद जो काम तीन जाँच समितियों और एक उच्चस्तरीय समिति से नही कराया जा सका वह काम न्यायपालिका की आँख में धूल झोंककर करा लिया जाय. सरकार के एक विधि अधिकारी (तत्कालीन अपर महाधिवक्ता) को इस साजिश का हिस्सा बनाया गया. तत्कालीन सरकार के शीर्ष ने भी इसपर हामी भर दिया. जनहित और राज्यहित के विरूद्ध अवैध खननकर्ताओं का निहित स्वार्थ साधने वाले कुत्सित षडयंत्र का एक नया घिनौना खेल आरम्भ हो गया.
  17. इस साजिश के तहत शाह ब्रदर्स नामक एक अवैध खननकर्ता ने उसका खनन पट्टा रद्द कर दिये जाने के सरकार के निर्णय के विरूद्ध माननीय झारखंड उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर किया. उसके पीछे-पीछे एनकेपीके और अनिल खीरवाल एंड कंपनी नामक लौह अयस्क पट्टाधारियों ने भी सरकार के निर्णय के विरूद्ध समरूप आशय की रिट याचिकायें झारखंड उच्च न्यायालय में दायर कर दिया. इन्हांेने तर्क दिया कि राज्य सरकार द्वारा उनके खनन पट्टों को रद्द करने की कारवाई नियमानुकुल नहीं है. इसलिये माननीय न्यायालय सरकार के इस निर्णय पर रोक लगाये.
  18. सरकार के किसी निर्णय के खिलाफ कोई व्यक्ति या संस्था न्यायालय में अपील करती है तो राज्य सरकार के महाधिवक्ता, अपर महाधिवक्ता एवं अन्य विधि अधिकारी सरकार के निर्णय का बचाव करते हैं. यदि सरकार का निर्णय बचाव योग्य नही है तो वे सरकार के सामने वस्तुस्थिति रखते हैं और सरकार के संबंधित विभाग को निर्णय में परिवर्तन करने की सलाह देते हैं. जब 01.04.2016 को झारखंड सरकार ने अवैध खनन करने वाले 23 लौह अयस्क पट्टाधारियों का पट्टा रद्द किया तो इस निर्णय की स्वीकृति समस्त कानूनी पहलुओं पर विचारोपरांत की गई थी. खान विभाग के मंत्री जो मुख्यमंत्री भी थे, की स्वीकृति के उपरांत इन खनन पट्टों को रद्द किया गया था. इसलिये सरकार के विधि अधिकारियों की पेशागत नैतिकता का तकाजा था कि वे माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष सरकार के इस निर्णय का पुरजोर बचाव करें. पर हुआ ठीक उल्टा. खान विभाग की ओर से राज्य सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता, श्री अजीत कुमार इस मामले में खान विभाग का पक्ष रखने के लिये न्यायालय के समक्ष खड़ा हुये. परंतु उन्हांेने सरकार के निर्णय का बचाव नहीं किया। कानून की प्रासंगिक धाराओं के अधीन सरकार द्वारा लिये गये निर्णय के बारे में खान विभाग का पक्ष नहीं रखा. नतीजा हुआ कि माननीय न्यायाधीश ने सरकार के निर्णय के विरूद्ध अंतरिम स्थगन आदेश पारित कर दिया मुकदमा संख्या 2027/2016, दिनांक 21.11.2016). इस प्रकार माननीय मुख्यमंत्री, जो खान मंत्री भी थे और विधि मंत्री भी, द्वारा नियुक्त राज्य सरकार के विधि अधिकारी के सक्रिय सहयोग से न्यायालय की आँख में धूल झोंककर अवैध खनन करने वालों को अंतरिम राहत दिलाने के षडयंत्र का पहला चरण कामयाब हो गया.
  19. अवैध खननकर्ताओं का खनन पट्टा रद्द करने के सरकार के निर्णय पर माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अंतरिम रोक लगा दिये जाने और सरकारी वकील (अपर महाधिवक्ता) द्वारा बहस के दौरान सरकार के निर्णय का बचाव नहीं करने की खबर खान विभाग में पहुँची तो हड़कम्प मच गया. विभाग के अपर मुख्य सचिव, श्री यु.पी. सिंह ने इसके विरोध में राज्य के महाधिवक्ता को एक लंबा शिकायती पत्र लिखा और बताया कि आपके द्वारा प्रतिनियुक्त अपर महाधिवक्ता ने खान विभाग से सलाह किये बिना उच्च न्यायालय में सरकार के हित के खिलाफ बहस कर दिया. पत्र में उन्होंने विस्तार से वर्णन किया कि अपर महाधिवक्ता ने कितना गलत काम किया है. इसलिये अगली तिथि को आप इस गलती को सुधरवायें और न्यायालय के सामने सही तथ्य रखकर अंतरिम स्थगन आदेश को हटवायें. पर ऐसा नहीं करने दिया गया (अपर मुख्य सचिव के पत्र की प्रति संलग्न)।
  20. राज्य के मुख्यमंत्री सह खान मंत्री सह विधि मंत्री के लिये यह गर्व की बात होनी चाहिये थी कि न्यायालय के समक्ष सरकार के हितों का संरक्षण करने और सरकार के निर्णयों का बचाव करने के लिये नियुक्त सरकारी वकील ने यदि भूल किया है तो इस भूल को सुधारने के लिये राज्य सरकार के अपर मुख्य सचिव सह खान सचिव ने तत्परतापूर्वक कदम उठाया है. परंतु जैसे ही अपर मुख्य सचिव सह खान सचिव द्वारा इस आशय का पत्र महाधिवक्ता को लिखने की जानकारी मुख्यमंत्री को मिली वे भड़क गये, आग बबूला हो गये. उन्होने मुख्य सचिव, विकास आयुक्त, अपने प्रधान सचिव एवं अन्य वरीय कनीय अधिकारियों के सामने अपर मुख्य सचिव सह खान सचिव, श्री यु.पी. सिंह को इसके लिये फटकार लगाया, उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित किया. उनके विरूद्ध अभद्र भाषा का प्रयोग किया. शालीनता, कर्मठता, इमानदारी के लिये मशहूर और वरीयता क्रम में सरकार के दूसरे नम्बर के इस प्रशासनिक अधिकारी को झारखंड सरकार ने राज्य से हटाकर केन्द्र में भेज दिया. राज्य सरकार के मुख्यमंत्री का इस राज्यहित विरोधी षडयंत्र में शामिल रहने का यह ज्वलंत उदाहरण है. यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नही होगा कि राज्यहित विरोधी इस षडयंत्र में राज्य के मुख्यमंत्री न केवल शामिल थे बल्कि वे ही इस षडयंत्र के सूत्रधार की भूमिका निभा रहे थे.
  21. खनन पट्टा रद्द करने का निर्णय न्यायालय द्वारा स्थगित कर दिये जाने के बाद मे॰ शाह ब्रदर्स ने जिला खनन पदाधिकारी और खान विभाग को लिखा कि उन्हांेने खनन करना आरम्भ कर दिया है. उत्खनित लौह-अयस्क को बाजार में बेचने के लिये उन्हें परिवहन का माईनिंग चालान दिया जाय. जिला खनन पदाधिकारी ने अपने स्तर से चालान नहीं दिया. उन्होंने वस्तुस्थिति का विवरण देते हुये खान विभाग से इस बारे मे मार्गदर्शन माँगा और कहा कि चालान देने की जगह खनन पट्टा रद्द करने के सरकार के आदेश पर उच्च न्ययालय की एकल पीठ द्वारा दिये गये स्थगन आदेश के विरूद्ध विभाग को उच्च न्यायालय की खंडपीठ के सामने अपील करना चाहिये. परंतु सरकार ने न तो इस बारे में उन्हें कोई मार्गदर्शन दिया और न ही खंडपीठ के सामने अपील किया. सरकार ने इस पर सलाह लेने के लिये संचिका महाधिवक्ता के पास भेज दिया. महाधिवक्ता ने सलाह दिया कि न्यायालय के किसी निर्णय पर अपील नहीं किये जाने और निर्णय को उच्च अदालत द्वारा स्थगित नहीं किये जाने की स्थिति में न्यायालय का निर्णय प्रभावी रहता है. यदि सरकार अपील नहीं करती है तो ऐसी स्थिति में चालान दिया जा सकता है. मुख्यमंत्री मानो महाधिवक्ता के इस परामर्श का इंतजार ही कर रहे थे. जैसे ही यह संचिका महाधिवक्ता के यहाँ से उनके पास पहुँची वैसे ही उन्होंने आदेश दे दिया कि ब्ींसंद उंल इम हपअमद यानी चालान दिया जा सकता है. विभाग के संयुक्त सचिव ने त्वरित गति से मुख्यमंत्री के इस आदेश के आधार पर जिला खनन पदाधिकारी, चाईबासा को निर्देश दिया कि शाह ब्रदर्स को माईनिंग चालान दे दें. इससे इस षडयंत्र में तत्कालीन मुख्यमंत्री की संलिप्तता एक बार फिर साबित हो गई.
  22. मे॰ शाह ब्रदर्स को माईनिंग चालान देने का लिखित आदेश चाईबासा में जिला खनन पदाधिकारी के पास पहुँचा तो जिला खनन पदाधिकारी ने फिर चालान देने से इंकार कर दिया. उन्हांेने कहा कि शाह ब्रदर्स को चालान देने का मुख्यमंत्री का आदेश सही नहीं है. क्योंकि शाह ब्रदर्स को लौह अयस्क खदान के परिचालन के लिये राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सहमति (सी.टी.ओ.) नहीं हैं. बिना सी.टी.ओ. के खान का संचालन करना नियम विरूद्ध है. ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री द्वारा चालान देने के आदेश का अनुपालन करना उनके लिये संभव नहीं है. सवाल उठता है कि शाह ब्रदर्स को उत्खनित लौह अयस्क के परिवहन के लिये माईनिंग चालान देने की इतनी अफरातफरी क्यों थी ? क्यों मुख्यमंत्री की सही-गलत इच्छा का क्रियान्वयन करने के लिये खान विभाग इतना आतुर था ? बिना सी.टी.ओ. के माईनिंग चालान का गलत आदेश देना अवैध खनन को शह देने के षडयंत्र में तत्कालीन मुख्यमंत्री के शामिल होने का ज्वलंत प्रमाण है.
  23. जिला खनन पदाधिकारी, चाईबासा ने खान विभाग को पत्र लिखा था कि माननीय उच्च न्यायालय द्वारा शाह ब्रदर्स का खनन पट्टा रद्द करने के सरकार के निर्णय पर न्यायालय के आदेश के विरूद्ध डबल बेंच में अपील किया जाना चाहिये. इस पत्र में उन्हांेने उन बिन्दुओं का उल्लेख किया था जो अपील का आधार बन सकते हैं. परंतु विभाग ने उनका अनुरोध स्वीकार नहीं किया. इतना ही नहीं शाह ब्रदर्स ने उच्च न्यायालय के आदेश का अनुपालन नहीं करने के लिये जिला खनन पदाधिकारी के विरूद्ध न्यायालय की अवमानना का मुकदमा ठोक दिया. जिला खनन पदाधिकारी ने जो निर्णय लिया था वह एक सरकारी पदाधिकारी के रूप में लिया था. मगर राज्य सरकार ने शाह ब्रदर्स के विरूद्ध मुकदमा लड़ने के लिए उन्हें उच्च न्यायालय में सरकारी वकील नहीं उपलब्ध कराया. उन्होंने यह मुकदमा अपने खर्चे पर वकील खड़ा कर लड़ा और अवमानना के आरोप से बरी हुये. स्पष्ट है कि उन्हें प्रताड़ित किया गया.
  24. जिला खनन पदाधिकारी, चाईबासा ने सी.टी.ओ. नहीं होने के कारण शाह ब्रदर्स को माईनिंग चालान देने के मुख्यमंत्री के निर्देश का अनुपालन नहीं किया तो मुख्यमंत्री ने एक और कदम उठाया जो अवैध खनन के षडयंत्र में उनके सूत्रधार होने की पुष्टि करता है. उन्होंने झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष को बुलाया, शाह ब्रदर्स को सी.टी.ओ. नहीं देने के लिये उन्हें फटकार लगाया और सी.टी.ओ. अविलम्ब जारी करने का निर्देश दिया. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष ने इसके बाद सशर्त सी.टी.ओ. दे दिया. शर्त लगाया कि यह सी.टी.ओ. उच्च न्यायालय में चल रहे मुकदमे के निर्णय से प्रभावित होगा. अवैध खननकर्ताओं के प्रति मुख्यमंत्री की उदारता और अवैध खनन पर ब्रेक लगाने वाले अधिकारियांे को बार बार प्रताड़ित करना संकेत है कि मुख्यमंत्री की अवैध खननकर्ताओं के साथ साँठगाँठ थी.
  25. दिनांक 11.08.2016 को इस मामले में माननीय उच्च न्यायालय का अंतिम फैसला आया कि अवैध खनन के आरोपी जो लौह-अयस्क पट्टाधारी सरकार द्वारा उनका खनन पट्टा रद्द करने के विरोध में न्यायालय आये हैं वे दो माह के भीतर सुनिश्चित करें कि उन्होंने खनन नियमों का उल्लंघन बंद कर दिया है, तभी वे खनन कर सकेंगे. जो आरोपी खननकर्ता न्यायालय नहीं आये हैं उनके लिये नियमों का उल्लंघन बंद करना सुनिश्चित करने के लिये न्यायालय ने 6 माह का समय दिया और कहा कि इसके बाद ही वे खनन कर सकते हैं। न्यायालय द्वारा निर्धारित 6 माह की अवधि में कोई भी पट्टाधारी इस शर्त को पूरा नहीं कर पाया. बाकी पट्टाधारियों को न्यायालय ने इसके लिये छ माह का समय दिया था. फिर भी सरकार ने इस बारे में जानने की कोशिश नहीं किया और सभी को एक शपथ पत्र देकर अवधि विस्तार देने का निर्णय कर लिया. जो काम अवैध खननकर्ताओं को करना था उसे सरकार ने कर दिया.
  26. भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने 2013 में निर्णय लिया था कि यदि कोई पट्टाधारी उसे मिले हुये पट्टा क्षेत्र के आंशिक क्षेत्र पर ही वन स्वीकृति लेकर खनन कर रहा है तब भी उसे पूरे पट्टा क्षेत्र के लिये एनपीवी (नेट प्रोडक्टिविटी वैल्यू) की राशि जमा करना होगा. तीन बार अवधि विस्तार के बाद इस निर्णय को लागू करने की अंतिम तिथि 31 मार्च, 2017 निर्धारित थी. शाह ब्रदर्स को सारंडा वन क्षेत्र के करमपदा में 233.99 हेक्टेयर पर लौह अयस्क पट्टा मिला था जिसमें से 43 हेक्टेयर पर वे खनन कर रहे थे. 2013 से 2016 तक उन्हांेने पूरे क्षेत्र पर एनपीवी जमा नहीं किया था जो खनन नियम का बड़ा उल्लंघन था. इसके बावजूद इनके खनन पट्टा का अवधि विस्तार कैबिनेट के निर्णय से हो गया था, पर नियमों का उल्लंघन रहने के कारण इनके लिये खनन करना संभव नहीं था. इन्हांेने खनन करने और परिवहन चालान देने के लिये आवेदन दिया था. उल्लंघन रहने के बाद भी इन्हें खनन करने और माईनिंग चालान देने के लिये खान विभाग पर सत्ता शीर्ष से दबाव था. जिसके कारण 26 मार्च, 2017 को खान विभाग ने इनसे एवं अन्य खननकर्ताओं से एक शपथ पत्र लिया कि भारत सरकार द्वारा निर्धारित एनपीवी जमा करने की अंतिम तिथि 31 मार्च, 2017 तक ये पूरे क्षेत्र पर एनपीवी जमा कर देंगे। इस शपथ पत्र के आधार पर सरकार ने इन्हें एवं अन्य को खनन करने और माईनिंग चालान देने का निर्णय कर दिया. उल्लेखनीय है कि 26 मार्च, 2017 के मात्र चार दिन बाद 31 मोर्च, 2017 को एनपीवी जमा करने की अंतिम तिथि समाप्त हो रही थी. परंतु मात्र चार दिन तक इंतजार करना खान विभाग ने मुनासिब नही समझा और शपथ पत्र लेकर इन्हंे खनन करने की अनुमति दे दिया जिसकी अधिसूचना अपै्रल, 2017 में जारी हुई। शाह ब्रदर्स ने इसका नाजायज फायदा उठाया और एनपीवी जमा नहीं करने के बाद भी 31 दिसंबर तक अवैध खनन करता रहा. यह मात्र संयोग नहीं है कि राज्य सरकार का खान विभाग और वन विभाग ने, जिनके मंत्री स्वयं तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री रघुवर दास थे, जानबूझकर शाह ब्रदर्स द्वारा किया जा रहा नियम का यह उल्लंघन भूल गये। नतीजा हुआ कि मे० शाह ब्रदर्स शपथ पत्र का उल्लंघन कर नौ महीना तक अवैध खनन करता रहा. क्या मुख्यमंत्री को इसकी जानकारी नही थी ? तिकड़म कर अवैध खनन कराने एवं राज्य के राजस्व को भारी क्षति पहुँचाने के लिये कौन जिम्मेदार हंै ? इसकी जाँच होनी चाहिए.
  27. शाह ब्रदर्स का अवैध खनन हमेशा के लिए जारी रहता यदि बीच में 2 अगस्त, 2017 को सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश नहीं आ जाता कि अवैध खनन के लिये लगाये गये जुर्माना का भुगतान पट्टाधारियों को 31 दिसम्बर, 2017 तक कर देना होगा. यह भुगतान एकमुश्त करना होगा. किश्तों में जुर्माना भुगतान करने की अनुमति सर्वोच्च न्यायालय ने नहीं दिया और भुगतान करने की अंतिम तिथि 31 दिसंबर, 2017 तय कर दिया. यानी इस तिथि तक अवैध जुर्माना का भुगतान नहीं करने वालों को इसके बाद खनन करने की इजाजत नहीं होगी और उन्हें माईनिंग चालान नहीं मिलेगा. तब जाकर शाह ब्रदर्स के अवैध खनन पर रोक लगी. परंतु यहाँ पर भी षडयंत्र हुआ. सरकार के खान विभाग ने 30 दिसंबर, 2017 को शाह ब्रदर्स को थोक के भाव से माईनिंग चालान दे दिया. जिसके आधार पर शाह ब्रदर्स मई 2018 तक उत्खनित लौह अयस्क का परिवहन करता रहा. खान विभाग के जिला पदाधिकारी के चाईबासा कार्यालय की जाँच करने पर यह घपला और इसके पीछे के षडयंत्र पर से परदा उठ जायेगा.
  28. अवैध खनन के जुर्माना का भुगतान किश्तों में नहीं करने का बल्कि एकमुश्त करने का सर्वोच्च न्यायालय का और झारखंड उच्च न्यायालय का स्पष्ट आदेश होने के बावजूद अवैध खनन करने के जुर्म में मे० शाह ब्रदर्स और मे० एन.के.पी.के. पर लगाये गये जुर्माना की राशि का भुगतान 20 किश्तों में स्वीकार करने पर झारखंड सरकार का राजी होना अपने आप में एक दुस्साहसी षडयंत्र का सबूत है. इस षडयंत्र में एक बार फिर राज्य के महाधिवक्ता जो पहले अपर महाधिवक्ता थे, ने पेशागत नैतिकता के विरूद्ध आचरण प्रदर्शित किया. इन्होंने उच्च न्यायालय की खंडपीठ के सामने झूठ बोल दिया कि मुकदमा के दोनों पक्ष (खान विभाग और पट्टाधारी) सहमत हैं कि जुर्माना की राशि का भुगतान 20 किश्तों में किया जाय. न्यायालय ने इस आशय का एक आदेश दे दिया तब इस बारे में उन्हांेने अपने क्लाइंट खान विभाग से इस बारे में कोई बात ही नहीं किया था. खान सचिव ने इसका विरोध किया और कहा कि विभाग ने इस प्रस्ताव पर सहमति नहीं दिया है. मामला विधि विभाग में गया पर हुआ कुछ नहीं. विधि विभाग और खान विभाग दोनों ही विभागों के मंत्री खुद माननीय मुख्यमंत्री ही थे. स्पष्ट है कि वे ही इस षडयंत्र के सूत्रधार थे। उनके निर्देश पर ही महाधिवक्ता ने 20 किश्तों में भुगतान के बारे में विभाग की तरफ से राजीनामा दायर किया. इसके कारण पुनः अवैध खनन आरम्भ हो गया.
  29. मेरी एक जनहित याचिका पर सरकार ने उच्च न्यायालय को आश्वस्त किया कि लौह अयस्क खनन पट्टाधारियों पर नियमों का उल्लंघन कर अवैध खनन करने के मामलों की सुनवाई खनिज समानुदान नियमावली के प्रासंगिक प्रावधान के मुताबिक की जायेगी. परंतु फिर षडयंत्र हुआ। इसके लिये पट्टाधारियों को दी जाने वाली 60 दिनों की नोटिस खान मंत्री द्वारा इसके लिये अधिकृत खान सचिव ने खनिज समानुदान नियमावली के गलत नियम के तहत दे दिया. नोटिस के 60 दिन का समय पूरा होने पर पट्टाधारियों ने कह दिया कि इस नियम के तहत सरकार सुनवाई नहीं कर सकती. इसके बाद अवैध खनन के विरूद्ध सुनवाई बंद हो गई, लंबे समय तक बंद रही. ऐसा क्यों और किसके आदेश पर हुआ ? क्या यह षडयंत्र के तहत हुआ ? इसकी जाँच होनी चाहिये.
  30. तदुपरांत मेरे अधिवक्ता ने माननीय न्यायालय का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया. काफी आनाकानी के बाद सरकार पुनः अनियमितताओं एवं अवैध खनन की सुनवाई के लिये तैयार हुई. परंतु तत्कालीन विभागीय सचिव ने सुनवाई करने से इस आधार पर इंकार कर दिया कि इसके पूर्व वे पश्चिम सिंहभूम जिला के उपायुक्त रह चुके हैं. सुनवाई फिर रूक गई. विषय न्यायालय के समक्ष उठा तो सरकार ने राजस्व पर्षद के सदस्य सह वन एवं पर्यावरण विभाग के अपर मुख्य सचिव, श्री इन्दुशेखर चतुर्वेदी को सुनवाई के लिये अधिकृत किया. सुनवाई के दौरान अनियमिततायें प्रमाणित हो जाने के कारण इन्होंने शाह ब्रदर्स का खनन पट्टा रद्द कर दिया. अन्य खनन पट्टों के बारे में इन्होंने टिप्पणी किया कि खान विभाग के अधिकारियों ने उन अनियमितताओं को साबित करने में रूचित नहीं दिखाया, जिनके विरूद्ध उन्होंने पहले प्रतिवेदन दिया था. यह महज आश्चर्यजनक संयोग नही है कि खान विभाग के जिन अधिकारियों वाली तीन समितियों ने इन खनन पट्टाधारियों के विरूद्ध अनियमितताओं को चिन्हित किया था और जिनके आधार पर विकास आयुक्त की समिति ने 23 खनन पट्टों को रद्द किया था, खान विभाग के उन्हीं अधिकारियों ने सदस्य, राजस्व पर्षद के समक्ष उन अनियमितताओं को सिद्ध करने में रूचि नहीं दिखलाया, जबकि खान विभाग की संबंधित संचिकाओं में वे सिद्ध आरोप आज भी रक्षित हैं. खान विभाग के संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जाँच जरूरी है कि किस कारण से या किस दबाव में इन्होंने ऐसा किया ?
  31. झारखंड उच्च न्यायालय ने अपने दिनांक 6 अगस्त, 2016 के आदेश में कहा था कि लाइसेंस, परमिट, स्वीकृति आदि के मामले में माईनिंग चालान की शर्तें पूर्ववत लागू रहेंगी. परंतु सरकार ने 11 अक्टूबर 2018 को पहली किश्त जमा करने के बाद शाह ब्रदर्स एवं एनकेपीके को माईनिंग चालान दे दिया. चाईबासा के जिला खनन पदाधिकारी ने इस संदर्भ में उच्च न्यायालय के प्रासंगिक आदेश का अनुपालन नहीं किया और अवैध खनन करने वालों को माईनिंग चालान दे दिया, जबकि खान विभाग ने कहा था कि महाधिवक्ता द्वारा किश्तों में भुगतान का प्रस्ताव न्यायालय के समक्ष देने के मामले मे विभाग की सहमति नही ली गई है. तब आखिर माईनिंग चालान किसके निर्देश पर दिया गया? इसकी जाँच होनी चाहिये.
  32. इसके अतिरिक्त चालान देने के मामले में शाह ब्रदर्स द्वारा किये गये नियमों के उल्लंघन को निम्नांकित बिन्दुओं पर नजरअंदाज किया गया: –
    क) इनके द्वारा किये गये 43 हेक्टेयर क्षेत्र का सरेंडर खान विभाग ने स्वीकार नहीं किया.
    ख) इसका सम्पूर्ण पट्टा वन क्षेत्र में था, पर इन्होंने वन क्षेत्र के लिये एनपीवी नहीं दिया था इसलिये इन्हें वन स्वीकृति नहीं प्राप्त थी.
    ग) इन्होंने निर्धारित क्षेत्र से बाहर जाकर खनन किया था.
    घ) अन्वेषण संबंधी आईबीएम के दिशा निर्देशों का इन्होंने पालन नही किया था.
    च) इन्होने बिना पर्यावरण स्वीकृति और परिचालन की सहमति के खनन किया था.
    छ) इन्होंने वन स्वीकृति लिये बिना वन भूमि क्षेत्र में खनन किया था.
    ज) डीएमओ चाईबासा द्वारा अवैध खनन का 605.56 करोड़ रूपये का जुर्माना इनके मामले में घटाकर 194.59 करोड़ रूपये कर दिया गया था.
    झ) अपर मुख्य सचिव सह सदस्य, राजस्व पर्षद की सुनवाई में इनके विरूद्ध अनियमिततायें साबित हो गई थी और यह भी साबित हो गया था कि इन्हें वन स्वीकृति नहीं थी.
    शाह ब्रदर्स के अतिरिक्त एन.के.पी.के., देबका बाई भेलजी आदि अन्य खननकर्ताओं द्वारा नियमों का उल्लंघन कर अवैध खनन करने के प्रमाण भी खान विभाग की संचिकाओं में मौजूद है, पर इनके अवैध खनन को प्रमाणित करने और इनके विरूद्ध कारवाई करने में खान विभाग ने रूचि नहीं लिया, क्यों? इसकी जाँच होगी तो पता चल जायेगा कि ऐसा एक षडयंत्र के तहत हुआ है. (नीचे पढ़ें पूरी खबर)

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि: (नीचे पढ़ें पूरी खबर)

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  1. एक षडयंत्र के तहत जस्टिस एम बी शाह आयोग की अवैध खनन संबंधी अनुशंसाओं को झारखंड में लागू नही होने दिया गया ताकि राज्य में अवैध खनन को प्रोत्साहित कर एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन लौह अयस्क की बंदरबाँट की जा सके और नियम कानून का उल्लंघन कर अनुचित वित्तीय लाभ कमाया जा सके.
  2. इस कुत्सित षडयंत्र में झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री रघुवर दास, तत्कालीन महाधिवक्ता/अपर महाधिवक्ता श्री अजीत कुमार एवं अन्य की मिलीभगत रही है. इनकी सक्रिय भूमिका के बगैर यह षडयंत्र सफल नहीं हो पाता. इन्हांेने स्वयं अनुचित वित्तीय लाभ प्राप्त करने की मंशा से अपने पद का दुरूपयोग किया है, निहित स्वार्थ के वशीभूत होकर इन्हांेने नियम कानून को तोड़ा-मरोड़ा है और अमानत में खयानत किया है ताकि मुट्ठी भर अविवेकी व्यवसायी प्राकृतिक संसाधनों का कपटपूर्ण दुरूपयोग कर अपना निहित स्वार्थ साध सकें.
  3. ‘कंसेन्ट टू ऑपरेट’ नहीं रहने के बावजूद शाह ब्रदर्स को माईनिंग चालान देने का निर्देश देकर तत्कालीन मुख्यमंत्री ने अवैध व्यापार को बढावा दिया है. अनियमितताओं एवं नियमों का उल्लंघन करने वाले पट्टाधारी को चालान देने के उनके आदेश का पालन करने में असमर्थता व्यक्त कर अपना दायित्व निर्वहन करने वाले पश्चिम सिंहभूम के जिला खान पदाधिकारी को निहित स्वार्थियों को लाभ पहुँचाने की मंशा से प्रताड़ित करने में उन्होंने योगदान किया है.
  4. अवैध खनन के दोषी पट्टाधारियों का खनन पट्टा निरस्त करने के राज्य सरकार के निर्णय पर उच्च न्यायालय की एकल पीठ के अंतरिम स्थगन आदेश के विरूद्ध खंडपीठ के समक्ष अपील करने के जिला खान पदाधिकारी के मंतव्य को ठंढे बस्ते में डालने का षडयंत्र तत्कालीन मुख्यमंत्री की शह पर किया गया जो कि खान मंत्री भी थे.
  5. अवैध खनन करने वाले पट्टाधारियों द्वारा की गई अनियमितताओं एवं उल्लंघनों की सुनवाई कर उनके विरूद्ध विधिसम्मत कारवाई करने की प्रक्रिया को एक षडयंत्र के तहत तत्कालीन मुख्यमंत्री सह खान मंत्री ने लंबे समय तक बाधित रखा ताकि अवैध खनन करने वाले इसका अनुचित लाभ उठा सकें और कारवाई से बचते रहें.
  6. तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वयं खान मंत्री भी थे, वन एवं पर्यावरण मंत्री भी थे और वित्त मंत्री भी थे. एनपीवी का भुगतान नही करने वाले पट्टाधारी से केवल चार दिनों के लिये शपथ पत्र लेकर उसे नौ माह तक अवैध खनन करने देने का षडयंत्र इनके सक्रिय सहयोग के बिना संभव नहीं हो पाता. प्राकृतिक संसाधन लौह अयस्क की बंदरबाँट, वनों को नुकसान और राजकोष को क्षति पहुँचाने में इनकी षड्यंत्रकारी भूमिका अकल्पनीय रही है.
  7. तत्कालीन अपर महाधिवक्ता, श्री अजीत कुमार ने झारखंड उच्च न्यायालय में खान विभाग के हित के विरूद्ध बहस कर पेशागत नैतिकता को तार-तार कर दिया. इस संबंध में उन्होंने जानबूझकर खान विभाग से परामर्श नही किया. नतीजा हुआ कि अवैध खनन करने वालों का पट्टा रद्द करने के सरकार के आदेश पर न्यायालय की अंतरिम रोक लग गई. तत्कालीन महाधिवक्ता ने ऐसा एक षडयंत्र के तहत अवैध खनन करने वाले को अनुचित लाभ पहुँचाने के लिये, स्वार्थ में या दबाव में किया.
  8. तत्कालीन अपर मुख्य सचिव, खान ने अपर महाधिवक्ता के गलत आचरण के विरूद्ध महाधिवक्ता को पत्र लिखा तो मुख्यमंत्री ने कई वरीय अधिकारियों के समक्ष उन्हंे अपमानित किया और उन्हें राज्य सरकार की सेवा छोड़कर केन्द्र सरकार की सेवा में चले जाने के लिये विवश किया. ऐसा इन्होने एक षडयंत्र के तहत अवैध खननकर्ताओं को लाभ पहुँचाने तथा अपर महाधिवक्ता के पेशागत अनैतिकता पर परदा डालने और उनके कुकृत्य को संरक्षण देने के लिये किया.
  9. पश्चिम सिंहभूम के जिला खान पदाधिकारी ने अवैध खनन करने वाले लौह अयस्क पट्टाधारियों से ब्याज सहित 7133 करोड़ रूपया का जुर्माना वसूलने के लिये 2.5.2015 को माँग पत्र दिया था. इस अघिकारी को हटा दिया गया. इसके स्थान पर पदस्थापित किये गये जिला खान पदाधिकारी ने जुर्माना की कुल राशि को काफी कम कर दिया. इसने शाह ब्रदर्स के विरूद्ध जुर्माना की माँग को 605.56 करोड़ रूपया से घटाकर 194.59 करोड़ रूपया कर दिया जिसके कारण राजकोष पर करोड़ों रुपये की चपत पड़ी. ऐसा कर अवैध खननकर्ताओं को अरबों रूपये का अनुचित लाभ पहुँचाने और सरकारी खजाना को भारी नुकसान पहुँचाने की साजिश में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने प्रभावी भूमिका अदा किया.
  10. सर्वोच्च न्यायालय का स्पष्ट निर्देश था कि अवैध खनन करने वालों पर लगाये गये जुर्माना का भुगतान एकमुश्त करना होगा. पर तत्कालीन महाधिवक्ता, श्री अजीत कुमार ने इसे दरकिनार कर 20 किश्तों में भुगतान करने का प्रस्ताव माननीय उच्च न्यायालय को दे दिया और कहा कि इस प्रस्ताव पर दोनो पक्षों (अवैध खननकर्ता और खान विभाग) की सहमति प्राप्त है, जिससे खान विभाग ने इंकार कर दिया. इसके बावजूद अवैध खननकर्ताओं को माईनिंग चालान दिया गया. बाद में अवैध खननकर्ताओं ने शेष किश्तों का भुगतान नही किया. इस तरह तत्कालीन महाधिवक्ता की संलिप्तता इस षडयंत्र में है. महाधिवक्ता के अनैतिक एवं कपटपूर्ण आचरण के कारण न केवल सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन हुआ बल्कि राजकीय खजाना को अरबों रूपये का नुकसान हुआ. किश्तों की शेष राशि, जिसका भुगतान अवैध खननकर्ताओं ने नहीं किया उस राशि की वसूली महाधिवक्ता से की जानी चाहिये.
  11. तत्कालीन महाधिवक्ता ने अवैध खननकर्ताओं के हक में अपने पद का दुरुपयोग एक से अधिक बार किया. हर बार तत्कालीन मुख्यमंत्री ने महाधिवक्ता का बचाव किया, राज्यहित को नुकसान पहुँचाया, अवैध खननकर्ताओं को लाभ पहँुचाया. यह सब जानबूझकर एक साजिश के तहत हुआ. महाधिवक्ता ने झारखंड राज्य बार काउंसिल का अध्यक्ष होने के नाते बार काउंसिल में मेरे खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित कराकर मुझपर अनुचित दबाव बनाया. राज्य सरकार में मंत्री होने के बावजूद राज्य के मुख्यमंत्री ने महाधिवक्ता के विरूद्ध कारवाई करने की मेरी मांग पर विचार नहीं किया. (नीचे पढ़ें पूरी खबर)

श्री राय ने कहा है कि एक सुनियोजित षडयंत्र के तहत झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने और तत्कालीन महाधिवक्ता ने जानबूझकर अवैध खनन को संरक्षण दिया है, राज्यहित को भारी नुकसान पहुँचाया है, राजकीय खजाना का भारी नुकसान किया है, नियम-कानून को धत्ता बताकर अवैध खनन को बढ़ावा दिया है. उपर्युक्त विवरण तो इसकी एक झाँकी भर है. इसकी जाँच सीबीआई अथवा भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो से कराई जाय तो षडयंत्र के समग्र पहलू पूरी तरह से उजागर हो जायेंगे. षडयंत्र के पीछे की मानसिकता सामने आ जायेगी, राज्यहित की कीमत पर अवैध एवं गैरकानूनी धंधा करने वाले निहित स्वार्थी तत्वों का असली चेहरा उजागर हो जायेगा, झारखंड में राजनीति, अपराध और अवैध व्यवसाय के नापाक गठबंधन का भंडाफोड़ हो जायेगा. राज्य के एक बड़े खनन घोटाला को अंजाम देने वाले तथा नियम और कानून को धत्ता बताकर अपने और अपने सहयोगी गुर्गों के भ्रष्ट आचरण का बचाव कर छद्म इमानदारी का ढोंग रचने वाले सफेदपोशों की गर्दन कानून के शिकंजा में आ जायेगी. श्री राय ने अनुरोध किया है कि राज्य के हित में, राज्य के प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के हित में और सबसे बढ़कर राज्य की सामान्य जनता के हित में इस सुनियोजित खनन घोटाला की जाँच सीबीआई/भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो से कराने का आदेश करेंगे.

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