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karbala : ए हुसैन अस्ल में मर्ग ए यजीद है इस्लाम जिंदा होता है हर कर्बला के बाद / अहले बैत से बुग्ज़ (नफ़रत) रखने वाले, कल भी थे आज भी हैं और क़यामत तक रहेंगे…..

राशिफल

शाहनवाज़ हसन / जमशेदपुर : “अबू सईद रदी अल्लाहू अन्हु से रिवायत है की रसूल-अल्लाह सलअल्लाहू अलैही वसल्लम ने फ़रमाया उस ज़ात की क़सम जिस के हाथ में मेरी जान है जो कोई अहल-ए-बैत से बुग्ज़ रखेगा तो अल्लाह सुबहानहु  उसको आग में दाखिल करेगा।” ऐसे मुसलमान जो अहले बैत(हज़रत फ़ातिमा रदी अल्लाहू अन्हु और हज़रत अली रदी अल्लाहू अन्हु के वंशज) नहीं उसके बावजूद खुद को सैयद कहते हैं वह अपने नबी मोहम्मद(स.अ. व) पर बोहतान लगाने वालों की जमाअत के साथ क़यामत के दिन खड़े होंगे।ऐसे लोगों पर अल्लाह की लानत भेजी गई है।हज़रत अली(र.अ) और हज़रत फ़ातिमा(र.अ) की औलाद ही सिर्फ़ अहले बैत(सैयद) हैं, यह हमारे नबी मोहम्मद(स.अ. व) का फरमान है। हज़रत अली(र.अ) की और भी औलाद(संतान) थीं उन्हें अहले बैत(सैयद) नहीं कहा गया है।अल्लाह के रसूल मोहम्मद(स.अ. व) का फरमान है “लोगों की नस्ल बेटों से चलती है मेरी नस्ल मेरी बेटी हज़रत फ़ातिमा से चलेगी जिसका सिलसिला क़यामत तक क़ायम रहेगा।” (नीचे भी पढ़ें)

भारतीय उपमहाद्वीप में स्वयं को अहले बैत(सैयद) कहने वालों की बड़ी संख्या है,जब्कि उनका दूर दूर तक अहले बैत(सैयद) से कोई नाता नहीं होता।कई ऐसे भी हैं जिनके पिता सैयद हैं और माँ सैयद नहीं हैं वे भी स्वयं को सैयद कहते हैं।भारतीय उपमहाद्वीप में शेख़ सिद्दीकी कहलाने वाले भी सैयद घरानों में शादी कर स्वयं को सैयद कहते हैं हालांकि वे सैयद कहने के मुस्तहिक़ नहीं।ऐसा करने वाले भी बोहतान लगाने वालों की जमाअत से हैं और वे सख़्त गुनहगार हैं। कर्बला के मैदान में अल्लाह के महबूब नबी मोहम्मद(स.अ. व) की आंखों की ठंडक जन्नत के सरदार हज़रत हुसैन(अ) को शहीद करने वाले भी अहले यज़ीद स्वयं को मुसलमान ही कहते थे और हज़रत मोहम्मद मोहम्मद(स.अ. व) के चचाज़ाद में ही बनू उम्मिया भी थे,वह भी स्वयं को सैयद कहलवाया करते थे हालांकि अहले बैत से उसका दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं था। हज़रत इमाम हुसैन की शहादत के बाद नक्कारे(ढोल बजाने वाले) इब्ने सैयाद और उसके साथ 22000 का फ़ौजी दस्ता भी खुद को मुसलमान ही कहता था।जिसने जन्नत के सरदार हज़रत हुसैन(अ) को शहीद कर उनके सर को अपने नेज़े पर उठा रखा था वह मलऊन भी स्वयं को मुसलमान ही कहता था।आज भी मोहर्रम के नाम पर इसी तरह के खोराफ़ात मचाने वालों की संख्या भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे अधिक है।स्वयं को मोहर्रम में 10 दिनों का खलीफा घोषित करने वाले वे होते हैं जो इस्लाम की शिक्षा पर कभी नहीं चलते,उनमें अधिकांश शराब और हरामकारी में मुलव्विस होते हैं, ठीक वैसे ही होते हैं जिस प्रकार यज़ीद था जिसने स्वयं को खलीफा घोषित कर दिया था। (नीचे भी पढ़ें)

हज़रत इमाम हुसैन(अ) को मौदान-ए-कर्बला में नमाज़ से रोकने वाले भी हुसैन के नाना का कलमा पढ़ने वाले थे जो खुद को मुसलमान ही कहते थे।सजदे में हुसैन का सर क़लम करने वाले भी कलमा पढ़ने वाले मुसलमान थे।शोहदाये कर्बला में अहले बैत ने जो कुर्बानी दी है उसकी दूसरी मिसाल क़यामत तक नहीं मिलेगी।हज़रत इमाम हुसैन की कुर्बानी इस्लाम की हिफाज़त के लिए ,हक़ के साथ खड़े रहने के लिए, बुराई को छोड़ने के लिए, हरामकारी से तौबा करने की शिक्षा देता है,आज हम मुहर्रम के नाम पर उस कुर्बानी को फ़रामोश कर बैठे हैं,मोहर्रम के अवसर पर नाच-गाने और तमाशे करने वाले अहले यज़ीद और इब्ने सैयाद की पैरवी करने वाले हैं।क्योंकि हज़रत इमाम हुसैन की शहादत के उपरांत यही सब कुछ अहले कूफ़ा कर रहे थे। 6 महीने के मासूम हज़रत अली असग़र और नौजवान हज़रत अली अकबर की शहादत से जो शिक्षा लेनी चाहिए उसे भूल कर ढोल नगाड़ों में मुहर्रम को तलाश करने वाले मुसलमान इमाम हुसैन से मोहब्बत का केवल ढोंग रचाते हैं।वे अहले यज़ीद के तर्ज़ पर ही मुहर्रम का जश्न मनाते हैं। (नीचे भी पढ़ें)

अल्लाह के महबूब नबी (स.अ. व) का फ़रमान है जिसने अहले बैत से बुग्ज़ रखा उसने मुझ से बुग्ज़ रखा,जिसने मुझ से बुग्ज़ रखा उसने अल्लाह से बुग्ज़ रखा।अहले बैत से बुग्ज़(नफ़रत) रखने वाले मैदान कर्बला में भी थे,आज भी हैं और क़यामत तक रहेंगे।अहले बैत से बुग्ज़ रखने का यही मतलब है कि आप मोहर्रम को अहले यज़ीद के तर्ज़ पर मनाएं,नमाज़ को तर्क कर दें और बुराई में मुलव्विस हो जाएं। हज़रत अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हो के बाद उनका बेटा यज़ीद स्वयं को ख़लीफ़ा घोषित कर देता है। यज़ीद एक बदतरीन और बदबख्त शराबी था, यज़ीद स्वयं को ख़लीफ़ा घोषित करने के बाद समझ गया कि मेरी खिलाफत को हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हो कभी कुबूल नहीं करेंगे इसलिए यज़ीद मदीना मुनव्वरा के गवर्नर वलीद बिन उतबा को खत लिखा की हुसैन इब्ने अली अब्दुल्लाह इब्ने उमर और अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर रज़ियल्लाहु तआला अन्हो को कहो की मेरी बैअत को माने और अगर वो बात ना माने तो उन पर जुल्मों सितम करना। हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हो ने यज़ीद की बैअत करने से इनकार कर दिया क्योंकि यज़ीद आपके नज़दीक मुसलमानों की इमामत और खिलाफत के लायक नहीं था क्योंकि आप जानते थे यज़ीद शराबी था और ज़ालिम था इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हो मदीना शरीफ छोड़कर मक्का शरीफ तशरीफ ले आए अब आपको मक्का शरीफ में कूफ़ियों के ढेर सारे खत आने लगे उन खातों में लिखा हुआ था ऐ इमाम हुसैन आप कूफ़ा तशरीफ़ ले आइए यहां पर यज़ीद का जुल्मों सितम बढ़ता चला जा रहा है हम आपसे ही बैअत करेंगे यज़ीद की बैअत हमें हरगिज़ क़ुबूल नहीं है। (नीचे भी पढ़ें)

हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हो ने हालात को समझने के लिए अपने भाई मुस्लिम बिन अक़ील रज़ियल्लाहु तआला अन्हो को यह कहकर कूफा भेजा कि जाओ जाकर वहां के हालात मालूम करो वहां के हालात कैसे हैं जब मुस्लिम बिन अक़ील रज़ियल्लाहु तआला अन्हो कूफ़ा पहुंचे तो वहां के लोगों ने बड़े ही एहतेराम के साथ आपका इस्तकबाल किया हज़रत मुस्लिम बिन अक़ील रज़ियल्लाहु तआला अन्हो के हाथों में 18 हज़ार लोगों ने बैअत कर ली और हज़रत मुस्लिम बिन अक़ील रज़ियल्लाहु तआला अन्हो ने अपने भाई हज़रत इमाम हुसैन के नाम एक ख़त रवाना कर दिया जिसमें आपने लिखा यहां के हालात बिल्कुल सही है और 18 हज़ार लोगों ने बैअत भी कर ली है लिहाजा आप कूफ़ा जल्द से जल्द तशरीफ ले आए। लेकिन जब यज़ीद ने उन लोगों को धमकीयां और लालच दी तो वह लोग अपनी बात से मुकर गए और इमाम मुस्लिम बिन अक़ील रज़ियल्लाहु तआला अन्हो को शहीद कर दिया कूफ़ा के हालात इतने बदल चुके थे कि वह लोग जो हज़रत मुस्लिम बिन अक़ील से मोहब्बत का दावा कर रहे थे अब वही लोग आपकी जान के दुश्मन बन गए वहीं दूसरी तरफ मक्का में मुस्लिम बिन अक़ील का भेजा हुआ खत हज़रत इमाम हुसैन तक पहुंच चुका था जिस खत में लिखा हुआ था कि कूफ़ा के हालात बहुत अच्छे हैं आप जल्द से जल्द कूफ़ा पहुंचें। (नीचे भी पढ़ें)

हज़रत इमाम हुसैन अपने तमाम अहले खाना के साथ कूफ़ा के लिए रवाना हुए इमाम हुसैन इब्ने अली को हज़रत मुस्लिम बिन अक़ील की शहादत और कूफा की बेवफाई की खबर उस वक्त मिली जब आप मक्का शरीफ से कूफ़ा की तरफ रवाना हो चुके थे जब आप कूफ़ा शहर के बिल्कुल करीब पहुंच गए तो आपको यज़ीदी फौज ने रोकने की कोशिश की हज़रत इमाम हुसैन ने फरमाया कि मैं तुम लोगों के बुलाने पर ही कूफ़ा शहर में आया हूं अगर तुम लोग चाहते हो कि मैं ना आऊं तो वापस जाने दो मैं जाने के लिए तैयार हूं यज़ीदी फौज ने हज़रत इमाम हुसैन को कूफ़ा शहर में दाखिल नहीं होने दिया. लिहाज़ा हज़रत इमाम हुसैन अपने पूरे काफिले के साथ अपना रास्ता बदल लिए चलते-चलते जब आप एक चटियल मैदान में पहुंच गए तो आपने एक शख्स से सवाल किया कि यह कौन सी जगह है उस शख्स ने कहा इस जगह को कर्बला कहा जाता है आपने फ़ौरन अपने पूरे लश्कर को हुक्म दिया कि यहीं पर खेमा लगा दिया जाए मोहतरम अज़ीज़ दोस्तों इस तरह से हज़रत इमाम हुसैन कर्बला में पहुंचे उधर यज़ीदी फौज को जब इस बात का इल्म हुआ की हज़रत इमाम हुसैन ने अपना खेमा करबला के मैदान में लगाया हुआ है तो यज़ीदी फौज ने भी फ़ौरन कर्बला के मैदान में पहुंचना शुरू कर दिया. (नीचे भी पढ़ें)

यज़ीद की जो फ़ौज कर्बला पहुँच रही थी उनकी सिपह सालारी इब्ने साद कर रहा था हज़रत इमाम हुसैन ने इब्ने साद से कहा कि या तो तुम मुझे यज़ीद के पास ले चलो या फिर मुझे अपने शहर मक्का वापस जाने दो लेकिन इब्ने  साद इन दोनों बातों में से कोई भी बात नहीं मानी और वो आपको बैअत करने पर मजबूर करता रहा लेकिन हज़रत इमाम हुसैन ने उसकी बात से इंकार कर दिया दिन गुज़रते गए. और तीन मोहर्रम का दिन आ गया अब ज़ालिम यज़ीद ने इमाम हुसैन के सामने 22 हज़ार सिपाहियों का लश्कर भेज दिया दूसरी तरफ हज़रत इमाम हुसैन के साथ 82 लोग थे जिसमें औरतें और बच्चे भी शामिल थे कितनी हैरत की बात है कि यज़ीदियों में इमाम हुसैन का इतना खौफ था कि जहां इमाम हुसैन सिर्फ 82 लोगों के साथ मैदान ए कर्बला में थे जिसमें औरतें और बच्चे भी शामिल थे वहीं यज़ीद ने मुकाबले के लिए आपके सामने 22 हज़ार का लश्कर भेज दिया जो कि इमाम हुसैन के सामने 100 गुना से भी ज्यादा था. (नीचे भी पढ़ें)

इमाम हुसैन के सामने यज़ीदी फौज के हौसले पस्त हो गए और उन लोगों में से किसी में भी इतनी हिम्मत नहीं थी की वो हज़रत इमाम हुसैन से मुक़ाबला कर सके आखिरकार उन्होंने यह फैसला किया कि अगर इमाम हुसैन को हराना है तो उनका पानी बंद करना पड़ेगा तभी इनका मुकाबला किया जा सकता है दिन गुज़रते गए और सात मुहर्रम का दिन आ गया और सात मोहर्रम को ही यज़ीदी फौज ने इमाम हुसैन के काफिले वालों पर पानी बंद कर दिया. इमाम हुसैन के सामने यज़ीदी फौज के हौसले पस्त हो गए और उन लोगों में से किसी में भी इतनी हिम्मत नहीं थी की वो हज़रत इमाम हुसैन से मुक़ाबला कर सके आखिरकार उन्होंने यह फैसला किया कि अगर इमाम हुसैन को हराना है तो उनका पानी बंद करना पड़ेगा तभी इनका मुकाबला किया जा सकता है दिन गुज़रते गए और सात मुहर्रम का दिन आ गया और सात मोहर्रम को ही यज़ीदी फौज ने इमाम हुसैन के काफिले वालों पर पानी बंद कर दिया. (नीचे भी पढ़ें)

आपको बताते चलें कि कर्बला के मैदान में पानी का कोई भी इंतज़ाम नहीं था सिवाय नहरे फुरात के लेकिन सात मोहर्रम के दिन नहरे फुरात का पानी भी हज़रत इमाम हुसैन के खेमे वाले लोगों के लिए बंद कर दिया गया हज़रत इमाम हुसैन और उनके साथ मौजूद तमाम नौजवान लोग तो इस प्यास को बर्दाश्त करते रहे लेकिन छोटे-छोटे बच्चे और औरतों का प्यास की वजह से बुरा हाल हो चुका था फौजे यज़ीद जो चारों तरफ से इमाम हुसैन के घर वाले और तमाम साथियों को घेरे हुवे थी उन्होंने यह तय किया कि अब नौ मोहर्रम के दिन इमाम हुसैन को कत्ल कर दिया जाए। हज़रत इमाम हुसैन ने हज़रत अब्बास रज़ियल्लाहु तआला अन्हो से कहा अब्बास जाओ यज़ीदी फ़ौज के पास और उनसे कहो हमें एक रात अल्लाह की इबादत करने के लिए दी जाए जब हज़रत अब्बास ने यज़ीदी फ़ौज से एक रात की मोहलत के लिए कहा तो उन लोगों ने आपकी बात मान ली जब तक 9 मोहर्रम की तारीख आई तब तक हज़रत इमाम हुसैन को यह यकीन हो चुका था कि यज़ीद की फौज का मकसद सिर्फ और सिर्फ मुझे शहीद करना है इसके अलावा यज़ीद और कुछ भी करने के लिए तैयार नहीं है इसलिए हज़रत इमाम हुसैन ने 9 मुहर्रम की रात में अपने तमाम खेमे वालों को एक जगह पर इकट्ठा किया.और आपने कहा कि यह बात तो तय हो चुकी है यहां पर मौजूद सभी लोग एक-दो दिन के अंदर शहीद कर दिए जाएंगे इसलिए यहां मौजूद आपमें से जो भी वापस लौटना चाहते हैं वह लौट जाएँ हज़रत इमाम हुसैन ने फौरन खेमे में जल रहे तमाम दियो को बुझवा दिया और अंधेरा करवा दिया था ताकि जो भी जाना चाहे वो चला जाए थोड़ी देर बाद जब दियों को दोबारा जलाया गया तो सारे के सारे लोग बैठे आंसू बहा रहे थे यानी कोई भी हज़रत इमाम हुसैन को छोड़कर जाने के लिए तैयार नहीं था. (नीचे भी पढ़ें)

आखिरकार 10 मोहर्रम का दिन आया और हज़रत इमाम हुसैन और यज़ीद की फौज के बीच जंग होना शुरू हो गई जहां एक तरफ यज़ीद की एक बड़ी फ़ौज थी तो वहीं दूसरी तरफ इमाम हुसैन के साथ सिर्फ 72 लोग थे इतने में फौजे यज़ीद का हमला शुरू हो जाता है और हर शहीद शहादत का जाम पीता गया कभी हुर शहीद होते हैं तो कभी कासिम शहीद होते हैं तो कभी अली अकबर शहीद होते हैं तो कभी औनो मोहम्मद शहीद होते हैं 3 दिन के प्यासे इमाम हुसैन के घर वाले और तमाम लोग यज़ीदी फौज से जंग करते रहे और एक-एक करके शहीद होते गए. हज़रत अब्बास अलमदार से हज़रत इमाम हुसैन के 6 महीने के बेटे अली असगर की प्यास नहीं देखी गई आपने एक मस्कीज़ा लिया और घोड़े पर सवार होकर नहरे फुरात के किनारे पहुंच गए और आपने एक मस्कीज़ा भर लिया लेकिन जब आप पानी लेकर वापस लौटने लगे तो यज़ीदी फौज ने आपके ऊपर लगातार तीर बरसाना शुरू कर दिया था हज़रत अब्बास जब तक हज़रत इमाम हुसैन के खेमे तक पहुंच पाते तब तक यज़ीदी फौज ने तीर चला कर हज़रत अब्बास अलमदार को शहीद कर दिया था इस तरह हज़रत अब्बास अलमदार शहीद हो गए. इस तरह एक-एक करके तमाम अहले बैत के नौजवान और हाशमी शेर शहादत का जाम पी लेते हैं धीरे-धीरे करके जब हज़रत इमाम हुसैन के सभी अफ़राद शहीद हो गए तो उसके बाद हज़रत इमाम हुसैन ने खुद मैदान में तलवार लेकर निकलने का फैसला किया इमाम हुसैन अपनी तलवार से काफी लंबे वक्त तक यज़ीदी फौज का अकेले मुकाबला करते रहे हज़रत इमाम हुसैन के तन्हा होने के बावजूद भी आप के मुकाबले में कोई भी नहीं आना नहीं चाहता था और उसकी सिर्फ एक ही वजह थी और वजह यह थी कि आप हज़रत अली के बेटे थे. (नीचे भी पढ़ें)

उस वक्त यज़ीदी फ़ौज का एक कमांडर इब्ने साद को यह यकीन हो चुका था कि हम किसी भी तरह से हज़रत अली के बेटे का मुकाबला नहीं कर सकते हैं इसलिए उसने अपने तमाम फौजियों को इमाम हुसैन के ऊपर एक साथ हमला करने का आर्डर दिया तमाम लोग हज़रत इमाम हुसैन पर एक साथ मिलकर हमला कर रहे थे लेकिन उसके बावजूद भी इमाम हुसैन लगातार यह साबित कर रहे थे कि बातिल चाहे तादाद में जितने भी हो लेकिन वो हक और सच के मुकाबले में बिल्कुल भी टिक नहीं सकता. जब हुसैनीयत और यज़ीदियत के बीच बड़ी ही खतरनाक जंग चल रही थी कि इसी बीच में नमाज़े असर का वक्त हो गया हज़रत इमाम हुसैन ने ऐसे मुश्किल वक्त और ऐसी जख्मी हालत में भी असर की नमाज़ पढ़ने का इरादा किया आपने जैसे ही नमाज़ पढ़ना शुरू किया यज़ीदी फौज को वह मौका मिल गया जिसका वह लोग एक लंबे वक्त से इंतज़ार कर रहे थे यानी जैसे ही हज़रत इमाम हुसैन सजदे में गए सिमर जिल जोसन ने आपकी गर्दन पर तलवार चलाकर आपके सर मुबारक को जिस्म से जुदा कर दिया.
हज़रत इमाम हुसैन की शहादत के बाद यज़ीदियों ने आपके सर मुबारक को नेज़े पर रखकर पूरे कूफ़ा में घुमाया था आपके सर मुबारक को गली-गली में घुमा कर जुलूस निकाला गया था कर्बला की इस जंग में हज़रत इमाम हुसैन के घर वालों में से सिर्फ आपकी एक औलाद ही बच सकी थी जिनका नाम हज़रत ज़ैनुल आब्दीन था इसके अलावा हज़रत इमाम हुसैन के घर की तमाम औरतों को कैदी बनाकर कूफ़ा लाया गया था भले ही उस दिन इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हो को शहीद कर दिया गया था लेकिन आज भी हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हो पूरी दुनिया में कयामत तक के लिए जिंदा है | यज़ीद डूब गया शाम के अंधेरे में हुसैन ज़िंदा हैं हर दिल में रोशनी की तरह. (नीचे भी पढ़ें)

कर्बला के 72 शहीद (शोहदा ए कर्बला) (नीचे भी पढ़ें)

  1. हज़रत इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अनहु
  2. हज़रत अब्बास बिन अली
  3. हज़रत अली अकर बिन हुसैन
  4. हज़रत अली असगर बिन हुसैन
  5. हज़रत अब्दुल्ला बिन अली
  6. हज़रत जफर बिन अली
  7. हज़रत उस्मान बिन अली
  8. हज़रत अबू बकर बिन अली
  9. हज़रत अबू बकर बिन हसन बिन अली
  10. हज़रत कसीम बिन हसन बिन अली
  11. हज़रत अब्दुल्लाह बिन हसन
  12. हज़रत ऐन बिन अब्दुल्ला बिन जाफर
  13. हज़रत मोहम्मद बिन अब्दुल्ला बिन जाफर
  14. हज़रत अब्दुल्ला बिन मुस्लिम बिन अकील
  15. हज़रत मोहम्मद बिन मुस्लिम
  16. हज़रत मोहम्मद बिन सईद बिन अकील
  17. हज़रत अब्दुल रहमान बिन अकील
  18. हज़रत जफर बिन अकील
  19. हज़रत यूएन बिन हर्स असदी
  20. हज़रत हबीब बिन मज़हिर असदी
  21. हज़रत मुस्लिम बिन आजाजा आदी
  22. हज़रत कयेस बिन मस्सर असदी
  23. हज़रत अबू सममा उमर बिन अब्दुल्ला
  24. हज़रत बोरर हमदानी
  25. हज़रत हनाला बिन असद
  26. हज़रत अबीस शकरी
  27. हज़रत अब्दुल रहमान रहबी
  28. हज़रत सैफ बिन हरस
  29. हज़रत आमेर बिन अब्दुल्लाह हमानी
  30. हज़रत जुनादा बिन हर्स
  31. हज़रत मजमा बिन अब्दुल्ला
  32. हज़रत नाफी बिन हलाल
  33. हज़रत हज़ाज बिन मासरुक़ (काफिला-ए-कर्बला के मुअज्ज़िन)
  34. हज़रत उमर बिन क़रज़ा
  35. हज़रत अब्दुल रहमान बिन अब्द-ए-रुब
  36. हज़रत जुनदा बिन कब
  37. हज़रत अमान बिन जानदा
  38. हज़रत नामीम बिन अजलन
  39. हज़रत साद बिन हरस
  40. हज़रत ज़ुहिर बिन काइन
  41. हज़रत सलमान बिन मज़ीरब
  42. हज़रत सईद बिन उमेर
  43. हज़रत अब्दुल्ला बिन बसीर
  44. हज़रत यजीद बिन ज़ेड कंडी
  45. हज़रत हार्ब बिन उमर-उल-कैसा
  46. हज़रत जहीर बिन अमीर
  47. हज़रत बशीर बिन अमीर
  48. हज़रत अब्दुल्ला अरवा गहफ़ारी
  49. हज़रत झोन गुलाम अबू ज़ार गफरी
  50. हज़रत अब्दुल्ला बिन अमीर
  51. हज़रत अब्दुल अला बिन यज़ीद
  52. हज़रत सलीम बिन अमीर
  53. हज़रत कसीम बिन हबीब
  54. हज़रत ज़ेड बिन सलीम
  55. हज़रत नोमन बिन उमेर
  56. हज़रत यजीद बिन सबीट
  57. हज़रत अमीर बिन मुस्लिम
  58. हज़रत सैफ बिन मलिक
  59. हज़रत जबीर बिन हज्जाजी
  60. हज़रत मसूद बिन हज्जाजी
  61. हज़रत अब्दुल रहमान बिन मसूद
  62. हज़रत बकर बिन हई
  63. हज़रत अमार बिन हसन ताई
  64. हज़रत जरुगामा बिन मलिक
  65. हज़रत काना बिन अटेक
  66. हज़रत एकबा बिन सुल्तान
  67. हज़रत हुर बिन यज़ीद तामीमी
    (यज़ीद की फौज के एक सेनापति जिन्होने सच्चाई की खातिर बीच लड़ाई में यज़ीद की फौज छोड़ हज़रत इमाम हुसैन का साथ दिया )
  68. हज़रत एकबा बिन सुल्तान
  69. हज़रत हबला बिन अली शिबानी
  70. हज़रत कानाब बिन उमर
  71. हज़रत अब्दुल्ला बिन याक़टर
    72.  इमाम-ए-सज्जाद

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