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pradosh-vrat- प्रदोष व्रत 4 सितंबर को, जानें शुभ मूहुर्त व पौराणिक कथा

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जमशेदपुरः हिन्दू धर्म में प्रदोष व्रत को काफी महत्व दिया जाता है. भाद्रपद माह का पहला प्रदोष व्रत 4 सितंबर (शनिवार) को है. प्रत्येक माह त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष व्रत रखा जाता है. प्रदोष व्रत में भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा विशेष रूप से की जाती है. केवल यही नहीं इस दिन शिव-पार्वती के साथ शनि देव की भी पूजा की जाती है. हिन्दू पंचांग में प्रदोष व्रत को भी विशेष महत्व दिया जाता है. प्रदोष व्रत की पूजा प्रदोष काल में की जाती है. प्रदोष काल संध्या के समय सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले शुरू हो जाता है और सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक रहता है.
प्रदोष कथा –
प्राचीन काल में एक सेठ अपने परिवार के साथ रहता था. विवाह के काफी समय होने बाद भी वो निसंतान था. इससे वें दोनों दम्पति बेहद दुखी रहते थे. एक दिन वो दोनों दम्पति तीर्थ यात्रा पर गए. शुभ मूहुर्त में वें दोनों तीर्थ यात्रा पर निकले. रास्ते में उन्हें एक महात्मा मिले. दोनों ने उस महात्मा को अपनी समस्या बतायी. फिर महात्मा ने उन दोनों दम्पति को प्रदोष व्रत करने करने को कहा. तीर्थ से वापस आने के बाद उन दोनों ने विधि विधान से प्रदोष व्रत किया. भगवान शिव की पूजा अर्चना की. कुछ महीने बाद सेठानी मां बनी और उसने बच्चे को जन्म दिया. तभी से इस व्रत की मान्यता बढ़ गयी. मान्यताओं के अनुसार यह भी कहा जाता है कि प्रदोष व्रत की पूजा सबसे पहले चंद्रदेव ने किया था. प्रदोष व्रत करने से चंद्र देव को क्षय रोग से मुक्ति मिली थी.
शनि प्रदोष व्रत पूजा मुहूर्त-
त्रियोदशी तिथि आरंभ- 4 सितंबर शनिवार सुबह 8:24 बजे
समापन- 5 सितंबर रविवार 8:21 बजे तक

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