saraswati puja – सरस्वती पूजा या बसंत पंचमी को लेकर कोई कंफ्यूजन है क्या, अगर है, तो यहां आप अपनी शंका दूर कर सकते है, पढ़िये, कब है विद्या की देवी मां सरस्वती की पूजा का दिन और शुभ मुहूर्त

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शार्प भारत डेस्क : बसंत पंचमी हिन्दू पंचांग के मुताबिक शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि या माघ महीने की पंचमी तिथि मनाया जाता है. विद्या और ज्ञान की देवी मां सरस्वती कि पूजा को लेकर लोगों में दुविधा है कि पूजा किस दिन करना है. कुछ लोगों के मुताबिक बसंत पंचमी 25 को, तो कुछ के मुताबिक 26 जनवरी को मनाया जाएगा. आपको बता दे कि इस साल बसंत पंचमी का त्योहार 26 जनवरी को मनाया जाएगा. बसंत पंचमी 25 जनवरी को दोपहर 12 बजकर 35 मिनट से शुरू होकर 26 जनवरी को सुबह 10 बजकर 29 मिनट पर समाप्त होगी. उदय तिथि के मुताबिक बसंत पंचमी 26 जनवरी को मनायी जाएगी. (नीचे भी पढ़ें)

सरस्वती पूजा का शुभ मुहूर्त
26 जनवरी को बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा का शुभ मुहूर्त प्रात : 07 बजकर 12 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 34 मिनट तक है. इस दिन सरस्वती पूजा के लिए 05 घंटे से अधिक का समय प्राप्त हो रहा है.
बसंत पंचमी पर बन रहे हैं 4 शुभ योग-
इस साल बसंत पंचमी या सरस्वती पूजा के दिन चार शुभ योग बन रहे हैं. इस दिन प्रात : काल से ही शिव योग है, जो दोपहर 03 बजकर 29 मिनट तक रहेगा. उसके बाद से सिद्ध योग प्रारंभ होगा, जो पूरे दिन रहेगा. सर्वार्थ सिद्धि योग शाम को 06 बजकर 57 मिनट से प्रारंभ हो रहा है, जो अगले दिन सुबह 07 बजकर 12 मिनट तक रहेगा. वहीं रवि योग भी शाम 06 बजकर 57 मिनट ले अगले दिन सुबह 7 बजकर 12 मिनट बजे तक है. (नीचे भी पढ़ें)

बसंत पंचमी से आता है प्राकृतिक में बदला
बसंत पंचमी के दिन से ही प्राकृतिक रूप में बदलाव महसूस होने लगता है. इसी दिन से पतझड़ का मौसम खत्म होकर हरियाली प्रारंभ हो जाता है. बसंत को ऋतुओं का राजा माना जाता है. भारतीय गणना के अनुसार वर्ष भर में पड़ने वाली छह ऋतुओं (वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर) में बसंत को ऋतुराज अर्थात सभी ऋतुओं का राजा माना गया है. पंचमी से बसंत ऋतु का आगमन हो जाता है, इसलिए यह ऋतु परिवर्तन का दिन भी है. इस दिन से प्राकृतिक सौन्दर्य निखरना शुरू हो जाता है. स्वयं श्री कृष्ण ने कहा है कि ऋतुओं में मैं बसंत हूं.’ ऐसी मान्यता हैं कि सृष्टि के प्रारंभ में भगवान श्री विष्णु जी की आज्ञा से ब्रह्मा ने मनुष्य की रचना की थी. यह पूरा माह बहुत शांत एवं संतुलित होता है. बसंत ऋतु के दिन मुख्य पांच तत्व अर्थात जल, वायु, आकाश, अग्नि और धरती संतुलित अवस्था में होते हैं और इनका ऐसा व्यवहार प्राकृतिक को सुंदर एवं मनमोहक बनाता है. मसलन इन दिनों ना अधिक बारिश होती है, ना बहुत ठंड और ना ही गर्मी का मौसम होता है. इस दिन से मनमोहक और सुहानी ऋतु का आगमन हो जाता है. बसंत ऋतु में चारों ओर हरियाली ही हरियाली दिखाई पड़ती है. पतझड़ खत्म हो जाता है और चारो ओर हरियाली का साम्राज्य कायम हो जाता है. (नीचे भी पढ़ें)

मां सरस्वती के जन्म की पौराणिक कथा – ब्रह्मांड की संरचना का कार्य शुरू करते समय ब्रह्माजी ने मनुष्य को बनाया, लेकिन उसके मन में दुविधा थी उन्हें चारों तरफ सन्नाटा सा महसूस हो रहा था. तब उन्होंने अपने कमंडल से जल छिड़क कर एक देवी को जन्म दिया है जो उनकी मानस पुत्री कहलायी, जिसे हम सरस्वती देवी के रूप में जानते हैं. इस देवी का जन्म होने पर उनके एक हाथ में वीणा, दूसरे में पुस्तक और तीसरे में माला थी. चौथे हाथ आशीर्वाद देने की मुद्रा में खड़ी थी. उनके जन्म के बाद मां सरस्वती को वीणा वादन करने को कहा गया. तब देवी सरस्वती ने जैसे ही स्वर बिखेरा वैसे ही धरती में कंपन हुआ और मनुष्य को वाणी मिली और धरती की सन्नाटा खत्म हुई. धरती पर पनपे हर जीव, जंतु, वनस्पति और जल धार में एक आवाज शुरू हो गई और तब से चेतना का संचार होने लगा. इसलिए इस दिवस को सरस्वती जयंती के रूप में मनाया जाता है. इस दिन बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती की पूजा करने से मुश्किल से मुश्किल मनोकामना पूरी होती है. पौराणिक मान्यता है कि वसंत पंचमी के दिन ही देवी सरस्वती प्रकट हुई थीं. इसलिए वसंत पंचमी में मां सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है. इस दिन विद्यार्थी, कलाकार, संगीतकार और लेखक आदि मां सरस्वती की उपासना करते हैं. स्वरसाधक मां सरस्वती की उपासना कर उनसे स्वर प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं. ब्रह्माजी के अनेक पुत्र और पुत्रियां हुई थी. सरस्वती देवी को शतरूपा, वाग्देवी, वागेश्वरी, शारदा, वाणी और भारती भी कहा जाता है.

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