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Jamshedpur-women’s-college : ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ पर वीमेंस कॉलेज में रीजनल ई कान्फ्रेंस आयोजित

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जमशेदपुर : वीमेंस कॉलेज में शनिवार को आजादी का अमृत महोत्सव श्रृंखला में रीजनल ई कान्फ्रेंस का आयोजन हुआ। आजादी का अमृत महोत्सव श्रृंखला की शुरुआत माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साबरमती आश्रम की भूमि पर इसी वर्ष 12 मार्च को किया था। 12 मार्च को ही ऐतिहासिक दाण्डी यात्रा के 91वर्ष भी पूरे हुए थे। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की स्वायत्त संस्था गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति, राजघाट, नई दिल्ली और जमशेदपुर वीमेंस कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस ई कान्फ्रेंस का केन्द्रीय विषय था भारत के स्वाधीनता संग्राम पर महात्मा गांधी का प्रभाव। (नीचे भी पढ़ें)

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गाँधी बीसवीं सदी के सर्वाधिक प्रबुद्ध और मानवीय राजनीतिवेत्ता थे – प्रोफेसर बिद्युत चक्रवर्ती
कान्फ्रेंस के मुख्य वक्ता विश्व भारती सेंट्रल यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रोफेसर बिद्युत चक्रवर्ती ने एम के गाँधी के महात्मा गाँधी बनने की यात्रा पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि गाँधी को पूजा भाव से देखने की बजाय एक सोच के रूप में देखें। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के मतदान के अधिकार की लड़ाई लड़ी। रेसिज्म के खिलाफ आवाज उठाई। अश्वेतों के डिसक्रिमिनेशन का प्रतिवाद किया और समझदार, विनम्र और लोकप्रिय राजनीतिक व्यक्तित्व के साथ गुलाम भारत की राजनीतिक लड़ाई को दिशा देने के लिए शामिल हुए। चंपारण सत्याग्रह, खेड़ा आंदोलन से लेकर सभी आंदोलनों के माध्यम से उन्होंने भारतीय राजनीतिक चरित्र को गढ़ा। अन्याय के प्रतिकार के लिए असीमित धैर्य और जीव मात्र के लिए निःशर्त प्रेम उनकी सोच थी। यही भारतीय सभ्यता का भी आधार स्तम्भ है। इस तरह गांधी भारत ही नहीं दुनिया के लिए सकारात्मक राजनीति के पथ प्रदर्शक हैं। उन्होंने अपनी आत्मकथा में बताया है कि उनके महात्मा बनने की यात्रा में उनकी माँ और उनकी पत्नी कस्तूरबा जी की सबसे अहम भूमिका थी। दोनों से ही उन्होंने भारतीय संस्कृति की मूल सीख ली जो त्याग और समर्पण की बुनियाद पर बनी है। (नीचे भी पढ़ें)

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अन्याय का प्रतिकार होना ही चाहिए, यही गाँधी जी का संदेश है- पद्मश्री अशोक भगत
ई कान्फ्रेंस की अध्यक्षता कर रहे और विकास भारती के संस्थापक सचिव पद्मश्री अशोक भगत जी ने भारतीय स्वाधीनता-संग्राम से काफी पहले झारखंड के टाना भगत आंदोलन की ऐतिहासिक भूमिका पर रौशनी डाली। गाँधी जी पर इस आंदोलन का गहरा प्रभाव था। मानव के खिलाफ किसी भी तरह के अन्याय और शोषण का प्रतिकार होना ही चाहिए, यह गाँधी जी मानते थे। प्रतिकार का तरीका रचनात्मक होना चाहिए, ध्वंसात्मक नहीं। रचनात्मक प्रयास ही सकारात्मक परिणाम लाते हैं। उन्होंने अपनी लगातार यात्राओं के जरिए भारत की आत्मा को महसूस किया। (नीचे भी पढ़ें)

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झारखंड के आंदोलनों पर गाँधीजी का अमिट प्रभाव रहा है- प्रोफेसर शुक्ला महांती
ई कान्फ्रेंस की संयुक्त आयोजक व विशिष्ट अतिथि केयू की पूर्व कुलपति सह वीमेंस कॉलेज की प्राचार्या प्रोफेसर शुक्ला महांती ने कहा कि गाँधी जी सीएफ एंड्र्यूज के बुलावे पर टाटा मजदूर आंदोलन और प्रबंधन के गतिरोध पर मार्गदर्शन के लिए आए थे। उन्होंने मजदूर आंदोलन और सत्याग्रह को परस्पर पूरक बनाया। रांची, चाईबासा जैसी तमाम जगहों पर आदिवासी आंदोलन और भारत की आजादी की लड़ाई को उन्होंने साझे संघर्ष का रूप दिया। स्वरोजगार और स्त्रियों के सम्मान व आर्थिक अधिकार के लिए उन्होंने परिवेश तैयार किया। वैश्विक संकटों के बीच उनकी सीख आज भी कारगर साबित होती है। (नीचे भी पढ़ें)

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इसके पहले गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति के निदेशक दीपांकर श्री ज्ञान ने वक्तागण का स्वागत किया और विषय प्रवेश कराते हुए कहा कि 1857 से पहले तीन महत्वपूर्ण घटनाओं की चर्चा जरूरी है। रेलवे का विस्तार, हड़प्पा मोहनजोदड़ो की खुदाई और आदिवासी विद्रोह। रेलवे के विस्तार से आदिवासी क्षेत्रों में अंग्रेजी हुकूमत ने अंधाधुंध माइनिंग कराई और भारत की अकूत संपदा को लूटा। इसका प्रतिवाद स्थानीय स्तर पर आदिवासियों ने किया। बाद में इस आंदोलन का एक राष्ट्रीय फलक सामने आया। गाँधी जी ने इन आदिवासी आंदोलनों के दर्शन को भारतीय स्वाधीनता-संग्राम के वैचारिक चरित्र से जोड़ा। (नीचे भी पढ़ें)

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रीजनल ई कान्फ्रेंस का संचालन वीमेंस कॉलेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष डाॅ. अविनाश कुमार सिंह ने किया। धन्यवाद ज्ञापन गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति के प्रोग्राम इक्जीक्यूटिव राजदीप पाठक ने किया। सिस्को वेबेक्स और फेसबुक लाईव स्ट्रीमिंग के जरिए वीमेंस कॉलेज सहित देशभर से दो हजार से अधिक प्रतिभागियों ने शिरकत की। तकनीकी सहयोग ज्योतिप्रकाश महांती, तपन कुमार मोदक आदि ने किया।

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