spot_img
रविवार, अप्रैल 11, 2021
More
    spot_imgspot_img
    spot_img

    Maithili-International-Webinar-at-ABM-College-Jamshedpur : ‘मैथिली साहित्य और संस्कृति पर कोरोना का प्रभाव’ पर हुई चर्चा, वक्ताओं ने कहा-कोरोना काल पर केंद्रित है नेपाल में बनी लघु फिल्म ‘लिलिया’, मैथिली संस्कृति में ही रोग निदान के उपाय भी सन्निहित

    Advertisement
    Advertisement

    Jamshedpur : गोलमुरी स्थित एबीएम कॉलेज के मैथिली विभाग द्वारा रविवार को “मैथिली साहित्य और संस्कृति पर कोरोना का प्रभाव” विषयक अंतर्राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी के उद्घाटन संबोधन में महाविद्यालय की प्राचार्य व कोल्हान विश्वविद्यालय के मानविकी संकाय की डीन डॉ मुदिता चंद्रा ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण है। समाज में घटित घटना-परिघटना, उत्थान-पतन की चर्चा साहित्य में होती है। करोना काल में जो मानव जीवन में बदलाव आया है, इसका सीधा प्रभाव साहित्य पर पड़ा है। उन्होंने मैथिली विभाग द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी की सराहना करते हुए कहा कि कोरोना काल के पश्चात कॉलेज में भी एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जाएगा।

    Advertisement
    Advertisement

    संगोष्ठी में बीज वक्तव्य देते हुए कोल्हान विश्वविद्यालय के कुलानाशासक एवं साहित्य अकादमी में मैथिली प्रतिनिधि डॉ अशोक अविचल ने कहा कि समाज की पीड़ा तथा उससे बचने का उपाय बताना साहित्यकार का धर्म है। इसी कारण मैथिली साहित्य एवं संस्कृति पर कोरोना का प्रभाव पड़ा है। संगोष्ठी में नवारम्भ प्रकाशन, पटना के निदेशक अजित आजाद ने मैथिली साहित्य पर कोरोना के प्रभाव विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि करोना काल में मैथिली साहित्य सृजनकर्ताओं में काफी बढ़ोतरी हुई है। सोशल मीडिया के माध्यम से साहित्य सृजन करने में काफी संख्या में युवा आगे आए हैं।

    Advertisement

    नेपाल के विद्वान वक्ता प्रवीण नारायण चौधरी ने मैथिली सिनेमा पर कोरोना के प्रभाव पर अपने वक्तव्य में कहा कि नेपाल से निर्मित मैथिली लघु फिल्म “लिलिया” करोना पर ही केंद्रित है। इसमें समाज के निम्न वर्ग और मजदूर वर्ग के लोगों की दशा को दर्शाया गया है। कोरोना काल में कैसे भूख से प्राण संकट में पड़ जाता है जाता है और कैसे जीवन जिया जा सकता है, इसे दर्शाया गया है। साथ ही कोरोना काल में बिगड़ते मानवीय संवेदना को भी इसमें दिखाया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि नेपाल ही नहीं भारत के भी लगभग 6 करोड़ लोग इस फिल्म को देख चुके हैं।

    Advertisement

    एनसीईआरटी के शैक्षणिक शिक्षण संस्थान, भोपाल के डॉ अरुणाभ सौरभ ने मैथिली संस्कृति पर कोरोना के पड़ने वाले प्रभाव पर व्याख्यान देते हुए कहा कि मिथिला एक सांस्कृतिक भाव भूमि है। मैथिली संस्कृति में ही रोग निदान के उपाय भी सन्निहित हैं। जब संस्कृति को हम तोड़ने का प्रयत्न करते हैं, तब ऐसे महामारी का सामना करने के लिए विवश होना पड़ता है। इस अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का संयोजन एवं संचालन मैथिली विभागाध्यक्ष डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी ने किया। संगोष्ठी के अंत में करोना काल में दिवंगत हुए मैथिली साहित्यकार पंचानन मिश्र, कैलाश झा किंकर, प्रदीप मैथिली पुत्र, राज, राम सुदिष्ट राय, कृष्ण कुमार कश्यप की दिवंगत आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन रखकर संगोष्ठी के समापन की घोषणा की गई। संगोष्ठी के आयोजन में भूगोल विभाग के भवेश कुमार, ज्योति उपाध्याय, सुनीता पात्रो, आरपी चौधरी, आरसी ठाकुर व अन्य ने तकनीकी सहयोग किया।

    Advertisement

    Advertisement
    Advertisement

    Leave a Reply

    This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

    spot_imgspot_img

    Must Read

    Related Articles

    today’s-history:जानें आज का इतिहास

    today’s-history:जानें आज का इतिहास

    today’s-history:जानें आज का इतिहास

    Don`t copy text!