चाईबासा : झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पश्चिमी सिंहभूम जिले के सरेंगसिया पहुंचे. उनके साथ उनकी पत्नी और विधायक कल्पना सोरेन भी थी. वहां पहुंचने पर उनका भव्य स्वागत किया गया. वहां मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सेरेंगसिया घाटी के वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की. इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने विभिन्न विकास परियोजनाओं का शिलान्यास, उद्घाटन तथा परिसंपत्तियों का वितरण भी किया. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि उनकी सरकार रांची से नहीं, बल्कि गांव से चलने वाली सरकार है. उन्होंने कहा कि मंईयां सम्मान योजना के तहत महिलाओं को हर महीने 2500 रुपये की सहायता दी जा रही है. मुख्यमंत्री ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि वह चुनाव के समय वादे करती है, लेकिन सरकार बनने के बाद उन्हें भूल जाती है. (नीचे भी पढे़ं)

मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार आपके द्वार कार्यक्रम के माध्यम से प्रशासन को समय-समय पर सीधे गांवों तक पहुंचाया जा रहा है. उन्होंने जोर देते हुए कहा कि शहीदों के सपनों को भूलना नहीं है और उन्हीं सपनों का झारखंड बनाना सरकार की प्राथमिकता है. मुख्यमंत्री ने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पर्यटन और कृषि जैसे क्षेत्रों में सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों की भी जानकारी दी. कार्यक्रम में मौजूद पोटका विधायक संजीव सरदार ने कहा कि सेरेंगसिया घाटी के शहीदों ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अन्याय और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया. उन्होंने कहा कि शहीदों का बलिदान केवल स्मरण का विषय नहीं, बल्कि समाज और सरकार दोनों के लिए जिम्मेदारी का संकल्प है. संजीव सरदार ने युवाओं से अपने इतिहास और संस्कृति को जानने, शिक्षा और संगठन के माध्यम से समाज को मजबूत करने तथा लोकतांत्रिक तरीके से अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने की अपील की. (नीचे भी पढे़ं)

क्या है सेरेंगसिया घाटी का इतिहास
पश्चिमी सिंहभूम जिले के सेरेंगसिया घाटी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक गौरवशाली अध्याय के रूप में दर्ज है. यह वही स्थान है, जहां 1837 में आदिवासी हो समुदाय ने अंग्रेजों के खिलाफ पहली निर्णायक लड़ाई जीतकर ब्रिटिश हुकूमत को गहरा झटका दिया था. इतिहासकारों के अनुसार, यह अंग्रेजों के खिलाफ झारखंड की जनजातियों द्वारा किया गया पहला संगठित विद्रोह था, जिसमें सैकड़ों अंग्रेज सैनिक मारे गए, जबकि बाकी लोग अपनी जान बचाकर भाग गये. इस विद्रोह का नेतृत्व वीर योद्धा पोटो हो ने किया था. उनके साथ देवी हो, बुगनी हो, बेराई हो, पांडव हो, बोड़ो हो और नारा हो जैसे कई आदिवासी सरदारों ने अहम भूमिका निभायी थी. परंपरागत हथियार तीर-धनुष से लैस ‘हो’ लड़ाकों ने अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया. इस भीषण संघर्ष में कोल्हान क्षेत्र के विभिन्न गांवों के 26 वीर योद्धा शहीद हो गये थे. इन बलिदानियों की याद में सेरेंगसिया घाटी में शहीद स्मारक का निर्माण किया गया. यह स्मारक आजादी के लिए आदिवासियों के संघर्ष और बलिदान की गाथा कहता है. हर वर्ष 2 फरवरी को यहां शहीद दिवस पर बड़ी संख्या में लोग एकत्र होकर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.








