जमशेदपुर : जुगसलाई वासियों की आस्था के केंद्र, एमई स्कूल रोड स्थित श्री श्री विंध्यवासिनी मंदिर में चैत्र नवरात्र की महानवमी के अवसर पर शुक्रवार को श्रद्धालु भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी. इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने देवी दुर्गा एवं मां विंध्यवासिनी के दर्शन किये एवं उनका आशीष लिया. आज महानवमी पर मां की पूजा अर्चना के पश्चात पूर्णाहुति हुई. इसके बाद श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरण किया गया. (नीचे भी पढ़ें)

बताते चलें कि इस मंदिर में भक्तों की बड़ी आस्था है. माता विंध्यवासिनी के आशीर्वाद से कई श्रद्धालु भक्तों की मनोकामना पूरी भी हुई है. मंदिर में स्थापित मां विंध्यवासिनी की प्रतिमा अत्यंत ही मनोहारी है, जिसके दर्शन मात्र से ही अलौकिक अनुभूति होती है. इस मंदिर से जुड़ी कुछ कथाएं हैं, जो श्रद्धालुओं की मंदिर से जुड़ी आस्था को और भी प्रबल करती हैं. मंदिर में मां विंध्यवासिनी के अलावा अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं. अपनी स्थापना के समय से ही यह मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र रहा है. मंदिर के सामने से गुजरनेवाले सैकड़ों लोग यहां प्रतिदिन शीश नवाते हैं. (नीचे भी पढ़ें)

मां को प्रसन्न करने के लिए लगता है पान का भोग :
मंदिर में पूरे शारदीय व वासंती नवरात्र के अलावा आम दिनों में भी मां विंध्यवासिनी को प्रसन्न करने के लिए मीठा पान का भोग चढ़ाया जाता है. मंदिर प्रबंधन ने बताया कि दोनों नवरात्र के दौरान मां को पान का विशेष भोग अर्पित किया जाता है. इसके लिए निर्धारित पान विक्रेता के यहां से ही पान लाया जाता है, जो हर सुबह स्नान करने के बाद मां के लिए मीठा पान तैयार करता है. कलश स्थापना के दिन से ही 21 पान का भोग लगा कर शुरुआत की जाती है, जिसकी संख्या धीरे-धीरे बढ़ती जाती है. महानवमी के दिन मां को 101 पान का भोग अर्पित किया जाता है. पान भोग श्रद्धालु काफी श्रद्धा के साथ ग्रहण करते हैं. महानवमी को पूर्णाहुति के साथ ही प्रसाद वितरण किया जाता है. (नीचे भी पढ़ें)
मां की प्रतिमा है आकर्षण का केंद्र :
विगत वर्षों की ही तरह इस बार भी चैत्र नवरात्र में मंदिर में विधि-विधान के साथ पाठ-पूजा आयोजित हुई. नवरात्र के पहले दिन से ही मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा. इस अवसर पर किया गया मां की प्रतिमा का विशेष शृंगार किया गया है, जो श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बना रहा. (नीचे भी पढ़ें)
स्व दीनानाथ अग्रवाल ने की थी मंदिर की स्थापना :
यहां 29 जनवरी 1999 को समाजसेवी स्व दीनानाथ अग्रवाल ने इस भव्य मंदिर की स्थापना की थी. जयपुर से मां की प्रतिमा ले आकर यहां प्रतिष्ठापित की गयी थी. मंदिर में मां विंध्यवासिनी की मनोहारी प्रतिमा तो है ही, इस मंदिर में अष्टभुजी दुर्गा माता, मां काली के अलावा भैरव बाबा की भी प्रतिमाएं भी प्रतिष्ठापित हैं. वहीं द्वार पर सिद्धि विनायक गणेश जी विराजमान हैं. मंदिर के गुंबद में छोटे-छोटे चार मंदिर हैं, जहां भगवान शंकर, भगवान श्रीकृष्ण, श्रीगणेश जी एवं हनुमान जी विराजमान हैं. गुंबद की चोटी पर चार शेर कलश की रक्षा करते देखे जा सकते हैं. वहीं बगल में सीतेश्वर महादेव का भव्य मंदिर है. दोनों मंदिरों का संचालन स्व दीनानाथ अग्रवाल के ज्येष्ठ पुत्र सुनील कुमार अग्रवाल व कनिष्ठ पुत्र सुशील कुमार अग्रवाल के द्वारा किया जाता है. साथ ही दोनों भाइयों का पूरा परिवार मां विंध्यवासिनी की सेवा में जुटा रहता है. यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए हर दिन सुबह व शाम निर्धारित समय से खुलता है. यहां दर्शन करने के पश्चात श्रद्धालु बगल में स्थित सीतेश्वर महादेव मंदिर में भी दर्शन को जाते हैं. (नीचे भी पढ़ें)
… तब कारीगरों को मिली थी गलती की सजा
मंदिर का निर्माण पुरुलिया के बलरामपुर निवासी बाबू मिस्त्री व उनके कुशल कारीगरों के द्वारा किया गया है. मंदिर के निर्माण के क्रम में कारीगरों ने गलती की थी, जिसकी उन्हें सजा भुगतनी पड़ी थी. बताया जाता है कि निर्माण के दौरान कारीगरों ने एक दिन मांसाहार किया एवं उसके बाद निर्माणाधीन मंदिर में आकर सो गये. देर रात उन्हें पायल की आवाज सुनाई देने लगी. उस पर उन्होंने पहले तो ध्यान नहीं दिया, लेकिन बाद में उन्होंने ऐसा महसूस किया जैसे उन्हें कोई चांटे मार रहा है. इसके बाद जैसे किसी ने चेतावनी भी दी कि आइंदा मंदिर में मांसाहार कर के न आयें. इसके बाद कारीगर काफी डर गये. किसी तरह उन्होंने रात बिताई. उसके बाद सुबह होते ही मंदिर का निर्माण करवा रहे अग्रवाल परिवार को इसकी जानकारी दी. इसके साथ कारीगरों ने मंदिर में मांसाहार न करके आने की ठान ली. (नीचे भी पढ़ें)
हर साल वासंती व शारदीय नवरात्र का होता है आयोजन :
जुगसलाई के एमई स्कूल रोड में अवस्थित श्रीश्री विंध्यवासिनी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है. स्थापना काल से ही इस मंदिर के प्रति लोगों में विशेष आस्था है. वर्ष 1999 में स्थापित इस मंदिर में आसपास के क्षेत्रों के अलावा दूर-दूर से भी लोग अपनी मुरादें लेकर आते हैं. मंदिर में हर दिन नियमित पूजा तो होती ही है, हर वर्ष वासंती (चैत्र) नवरात्र और शारदीय नवरात्रि में भी आयोजन किया जाता है. इस अवसर पर श्रद्धालु मां के दर्शन व पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की मंगलकामना की हैं.




