
जमशेदपुर : भाई-बहन का सबसे लोकप्रिय त्योहार रक्षाबंधन तीन अगस्त को है. इस दिन बहनें अपने भाइयों के कलाई पर राखी बांधती हैं और भाई उनका सदैव रक्षा कारने का वचन देना है. बता दें कि रक्षाबंधन के दिन बहनें जबतक भाइयों को रखी नहीं बांधती हैं तबतक उपवास रखती है और राखी बांधने के बाद ही कुछ खाती हैं. पहले के जमाने में तो रक्षाबंधन के दिन बहनें अपने भइयों को सिर्फ रक्षासूत्र बांधती थी, वहीं अब मॉर्डन जमाने में बाजार में एक से बढ़कर एक स्टाइलिस्ट राखी उपलब्ध हो गई है. लेकिन इस वर्ष रक्षाबंधन के त्योहार को कोरोना माहामारी ने फीका कर दिया है. कोरोना वायरस के कारण पूरे विश्व में जारी लॉकडाउन के कारण इस बार जो भाई अपनी बहन से दूर रहते हैं वह बहन के पास पहुंच नहीं सकते और न ही बहनें बाजार में जाकर कुछ खरीदारी कर सकती हैं. इसलिए इस वर्ष रक्षाबंधन के त्योहार को लेकर चहल-पहल बाजारों में पहले जैसी नहीं दिख रही है. बाजार तो पूरी तहर से सजकर तैयार है, लेकिन खरीदारी करने वाले बहुत कम लोग पहुंच रहे हैं. कई दुकानदारों ने बताया कि कोरोना माहामारी के कारण इस वर्ष राखी समेत रक्षाबंधन के अन्य समाग्री की खरीदारी करने काफी कम संख्या में लोग बाजार में पहुंच रहे हैं. इस त्योहार पर भाई अपनी बहनों को कुछ उपहार भी प्रदान करते हैं, लेकिन लॉकडाउन के कारण कोई खरीदारी करने बाजार में नहीं पहुंच रहा है.
शुभ मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य राजेश पाठक के अनुसार, तीन अगस्त को सुबह 9.29 बजे तक भद्रा है, इसलिए राखी बांधने का शुभ मुहूर्त सुबह 9.30 बजे से शुरू होगा. साथ ही दोपहर 1.30 से शाम 4.35 बजे तक और शाम 7.30 से रात 9.30 बजे तक राखी बांधने का सबसे अच्छा समय है.
क्या कहते हैं ज्यातिषाचार्य
ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि भद्रा शनि की बहन है, जिसे शास्त्रों में अशुभ माना गया है. भद्रा में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है. क्योंकि शास्त्रों के मुताबिक भद्रा सूर्यदेव की पुत्री और शनि की बहन है. शनि देव के जैसे इनका भी स्वभाव काफी क्रोधी है. ज्योतिष विज्ञान के अनुसार अलग-अलग राशियों के अनुसार भद्रा तीन लोकों में घूमती है. जब भद्रा मृत्युलोक में होती है, तब सभी शुभ कार्यों में बाधक या उनका नाश करने वाली मानी गई है. जब चन्द्रमा कर्क, सिंह, कुंभ व मीन राशि में विचरण करती है और भद्रा विष्टि करण का योग होता है, तब भद्रा पृथ्वीलोक में रहती है. इस समय सभी शुभ कार्य वर्जित होते हैं. इसके दोष निवारण के लिए भद्रा व्रत का विधान भी धर्मग्रंथों में बताया गया है.








