जमशेदपुर : कई ऐतिहासिक ‘पहलों’ के सूत्रधार पीएन बोस ने केवल जेएन टाटा के राष्ट्र निर्माण के विज़न को आकार नहीं दिया, बल्कि भारतीय उद्योग और वैज्ञानिक सोच की मजबूत नींव भी रखी. निस्संदेह, वे ऐसे प्रमुख व्यक्तित्व थे जिन्होंने पीढ़ियों तक भारतीयों को देश के वैज्ञानिक विकास में सक्रिय और सार्थक योगदान के लिए प्रेरित किया. 12 मई 1855 को बंगाल के गाइपुर में जन्मे पीएन बोस ने अपनी शिक्षा कृष्णनगर कॉलेज और उसके बाद सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज से प्राप्त की. वर्ष 1874 में उन्हें लंदन में उच्च शिक्षा के लिए प्रतिष्ठित गिलक्रिस्ट छात्रवृत्ति प्रदान की गई. भारत लौटने के बाद वे जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में ग्रेडेड अधिकारी बने. उनके शुरुआती शोध का विषय शिवालिक जीवाश्म थे, जो आज भी ब्रिटिश म्यूज़ियम के संग्रह में सुरक्षित हैं. पीएन बोस को भारत की पहली साबुन फैक्ट्री स्थापित करने और असम में पेट्रोलियम की खोज का श्रेय भी दिया जाता है. (नीचे भी पढ़ें)
हालांकि, उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान जमशेदपुर में टाटा स्टील प्लांट की स्थापना में माना जाता है. जे एन टाटा को लिखा गया उनका ऐतिहासिक पत्र ही इस प्लांट को वर्तमान स्थान पर स्थापित करने का आधार बना. पीएन बोस का मानना था कि भारत का पुनर्जागरण उसकी मूल सांस्कृतिक और बौद्धिक परंपराओं की ओर लौटने में निहित है, जिनकी आधारशिला विज्ञान और शिक्षा पर टिकी हुई थी. अपने प्रारंभिक जीवन में वे प्रख्यात ब्रह्मो समाज सुधारक केशब चंद्र सेन से गहराई से प्रभावित हुए, जिन्होंने उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेने और इंग्लैंड में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया. अपने समय के अन्य प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों के साथ मिलकर उन्होंने उस प्रचलित धारणा का विरोध किया, जिसमें भारतीय वैज्ञानिकों को यूरोपीय वैज्ञानिकों से कमतर माना जाता था. (नीचे भी पढ़ें)
उनका दृढ़ विश्वास था कि भारतीय वैज्ञानिक भी विचार और अनुसंधान के क्षेत्र में अपने यूरोपीय समकक्षों के बराबर प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं. यही कारण था कि जब लार्ड कर्ज़न ने जेएन टाटा के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस की स्थापना के प्रयासों को कमजोर करने की कोशिश की, तब पीएन बोस और उनके समकालीन वैज्ञानिकों ने एकजुट होकर इसका कड़ा विरोध किया. रॉयल स्कूल ऑफ माइंस में अध्ययन के दौरान पीएन बोस राजनीतिक सभाओं में सक्रिय रूप से भाग लेते थे और ब्रिटिश सरकार की नीतियों की खुलकर आलोचना करते थे. उनके इस विरोधी रुख के बावजूद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में नियुक्त करने का प्रयास किया. इसी दौरान उन्होंने नर्मदा घाटी, रीवा राज्य, मध्य भारत और शिलांग पठार में महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण किए. (नीचे भी पढ़ें)
उनकी पुस्तक “नेशनल एजुकेशन एंड मॉडर्न प्रोग्रेस” भारत में तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा के प्रति उनके गहरे समर्पण को दर्शाती है. उनके प्रयासों से ही बंगाल टेक्निकल इंस्टीट्यूट की स्थापना संभव हुई, जो आज कोलकाता स्थित जादवपुर यूनिवर्सिटी के रूप में प्रसिद्ध है. पीएन बोस इस संस्थान के प्रथम मानद प्राचार्य भी थे. डॉ राजेंद्र प्रसाद ने पीएन बोस के बारे में कहा था कि उस समय भी वे देश की भूवैज्ञानिक संपदाओं, विशेषकर कोयला, लौह और इस्पात के उपयोग के माध्यम से औद्योगिक प्रगति की अपार संभावनाओं को दूरदृष्टि के साथ देख पा रहे थे. पीएन बोस ने भारत के लौह एवं इस्पात उद्योग के विकास में अपनी वैज्ञानिक और भूवैज्ञानिक विशेषज्ञता का योगदान दिया, जबकि जनसेदजी टाटा ने अपनी पूंजी और व्यावसायिक दूरदृष्टि से इस सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. (नीचे भी पढ़ें)
उन्होंने मयूरभंज राज्य को भारतीय भारी उद्योग की आधारभूमि बनाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई. अपने द्वारा खोजे गए “अत्यंत समृद्ध और विशाल लौह अयस्क भंडार” की जानकारी जेएन टाटा तक पहुंचाकर उन्होंने भारत में आधुनिक इस्पात उद्योग की नींव रखने का मार्ग प्रशस्त किया. भारत की पहली साबुन फैक्ट्री की स्थापना से लेकर देश के पहले एकीकृत इस्पात संयंत्र के निर्माण में निभाई गई उनकी दूरदर्शी भूमिका तक, पीएन बोस का योगदान राष्ट्र निर्माण की गाथा में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है. प्राकृतिक संसाधनों में आत्मनिर्भरता हासिल करने और भारतीयों में वैज्ञानिक तथा तकनीकी दक्षता विकसित करने के उनके अथक प्रयासों ने भारत के औद्योगिकीकरण और आत्मनिर्भरता की यात्रा की मजबूत नींव रखी.






