जमशेदपुर : भारत की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक परंपराएँ अक्सर मुझे आश्चर्यचकित करती हैं। दुर्गा पूजा और नवरात्रि मनाने के तरीके, पूजा-विधियाँ, मान्यताएँ और लोककथाएँ अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग रूपों में दिखाई देती हैं। जमशेदपुर, जिसे मिनी भारत कहा जाता है, इस सांस्कृतिक विविधता का सुंदर उदाहरण है। यहाँ लोग एक-दूसरे की भाषा, खानपान, रीति-रिवाज और पूजा-पद्धतियों से परिचित होते हैं। कहीं भव्य दुर्गा पंडाल सजते हैं, कहीं दुर्गा सप्तशती के पाठ होते हैं, तो कहीं डांडिया की धूम के बीच दक्षिण भारतीय परिवारों में गुड़ियों की अनूठी परंपरा ‘गोलू पूजा’ देखने को मिलती है. (नीचे भी पढ़ें)

कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में अलग-अलग नामों से प्रचलित इस परंपरा में नवरात्रि के दौरान गुड़ियों और देवी-देवताओं की मूर्तियों को सजी हुई सीढ़ियों पर क्रमबद्ध ढंग से सजाया जाता है। दक्षिण भारतीय महिला समाज (डीबीएमएस) से जुड़े रहने के कारण पिछले नौ वर्षों से मुझे अनेक तमिल परिवारों में गोलू देखने का अवसर मिलता रहा है. इस वर्ष भी कई घरों में गोलू देखने का अवसर मिला, लेकिन टाटा स्टील के वरिष्ठ पदाधिकारी श्री दिलीप नारायण और उनकी पत्नी सुधा दिलीप के सोनारी स्थित निवास पर सजा गोलू विशेष रूप से आकर्षक लगा. श्रद्धा, उत्साह और पारंपरिक उल्लास से सजे इस आयोजन में परिवार की संस्कृति के प्रति गहरा लगाव दिखाई दिया. (नीचे भी पढ़ें)

श्री दिलीप नारायण बताते हैं कि वे बचपन से जमशेदपुर में पले-बढ़े हैं और उन्हें गोलू सजाने में विशेष रुचि रही है। गोलू में लकड़ी, धातु अथवा अन्य सामग्री से बनी सीढ़ियों पर सुंदर वस्त्र बिछाकर विभिन्न प्रकार की मूर्तियां सजाई जाती हैं.सामान्यतः सीढ़ियों की संख्या विषम होती है—तीन, पाँच, सात या नौ। तमिल भाषा में इन सीढ़ियों को ‘पड़ी’ कहा जाता है. उनकी पत्नी सुधा के अनुसार, गोलू केवल धार्मिक सजावट नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक प्रदर्शनी है, जिसमें धर्म, इतिहास, कला और सामाजिक जीवन का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। ऊपरी सीढ़ियों पर देवी-देवताओं की मूर्तियां, मध्य में संतों, महापुरुषों और पौराणिक पात्रों की प्रतिमाएँ तथा निचली सीढ़ियों पर पशु-पक्षियों, मनुष्यों और ग्रामीण जीवन से जुड़ी आकृतियां सजाई जाती हैं. इस प्रकार गोलू भारतीय जीवन की विविधता और सांस्कृतिक समृद्धि को अभिव्यक्त करता है. (नीचे भी पढ़ें)
श्रीप्रिया धर्मराजन और अंजलि गणेशन सहित अनेक तमिल परिवार भी इस परंपरा का उत्साहपूर्वक निर्वाह करते हैं. प्रत्येक वर्ष नई प्रतिमाएं जोड़ने की परंपरा के कारण गोलू में नवीनता बनी रहती है. जमशेदपुर में ऐसी प्रतिमाएं आसानी से उपलब्ध नहीं होने के कारण अनेक परिवार इन्हें तमिलनाडु से मंगवाते हैं. गोलू देखने के लिए पड़ोस की महिलाएं, बच्चे और अन्य परिजन एकत्र होते हैं. दिलीप नारायण के घर पर केवीके समाज, सोनारी की महिला मंडली ने बैठकर भजन भी प्रस्तुत किए. (नीचे भी पढ़ें)
इस अवसर पर डीबीएमएस कॉलेज की मार्गदर्शक एवं सलाहकार डॉ. जूही समर्पिता, प्राचार्या डॉ. मोनिका उप्पल, पामेला घोष दत्ता, अनेक शिक्षिकाएँ, टाटा स्टील के वरिष्ठ पदाधिकारी, डॉ. अंजनी किशोर सहाय तथा डीबीएमएस के चेयरपर्सन डॉ. बी. चन्द्रशेखर, श्रीमती ललिता चन्द्रशेखर और प्रबंधन समिति के सदस्यों ने गोलू की भव्य सजावट की सराहना की.
गोलू पूजा भारतीय संस्कृति की उस सुंदर विशेषता को सामने लाती है, जहाँ आस्था के साथ कला, परंपरा और सामाजिक सहभागिता भी जुड़ जाती है। जमशेदपुर जैसे बहुसांस्कृतिक शहर में ऐसे आयोजन हमें सिखाते हैं कि विविधता केवल अलग-अलग परंपराओं का सह-अस्तित्व नहीं, बल्कि एक-दूसरे की संस्कृति को जानने, समझने और सम्मान देने का अवसर भी है।





