
शार्प भारत डेस्क : कोरोना वायरस से लड़ने के लिए दुनिया में बहुत से दवाइयों का प्रयोग किया जा रहा है. लेकिन ये दवाएं उतनी कारगर है या नहीं ये बताना विशेषज्ञों के लिए मुश्किल है. वहीं भारत में डीआरडीओ द्वारा विकसित कोविड-19 की दवा को इमरजेंसी के दौरान इस्तेमाल की मंजूरी दे दी गई है. अगले 10 से 12 दिनों के अंदर ये दवाएं भारत में उपलब्ध होंगी. जिसे अमेरिका में प्रयोग के बाद कारगर माना जा रहा है. इसे लेकर मेदांता हॉस्पिटल के सीएमडी डॉ नरेश त्रेहान ने टीवी टैनलों के माध्यम से पूछे गए प्रश्नों के उत्तर में क्या कहा, आप भी जानें-
. क्या वैक्सीनेशन का पहले डोज लेने के बाद अगर किसी को कोविड हो जाए, तो उसे वैक्सीन का दूसरा डोज कितने हफ्ते बाद लेना होगा?
- कोविड हो जाने के छह हफ्ते बाद वैक्सीन का दूसरा डोज लेना जरूरी है.
. भारत में डीआरडीओ की दवा बाजार में कब तक उपलब्ध होगी, इस पर मेडिकल कम्युनिटी की क्या राय है? - डीआरडीओ की इस दवा के बारे में मेडिकल कम्युनिटी के पास अभी पूरा डाटा उपलब्ध नहीं है. इस एंटीवायरल दवा से लोगों को फायदा होगा, ऐसा दावा किया जा रहा है. इस मेडिसीन को अमेरिका में बहुत प्रभावी माना जा रहा है. मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज अमेरिका में बहुत प्रभावी के साथ शुरूआती दिनों में पहली आरटीपीसीआर पॉजिटीव पाए जाने के बाद लोगों को इसकी डोज लगनी शुरू हो जाएगी. संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रेसिंडेट डॉनल्ड ट्रम्प को इसकी डोज लगाई गई थी, जिसके बाद उन्होंने इसे प्रभावी बताया. इससे वायरस के फैलने का प्रभाव बेहद कम हो जाता है. यह भारत में 10 से 12 दिनों में बाजार में उपलब्ध हो जाएगा.
. क्या मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का उपचार बहुत महंगा है? क्या ये भारत में सामान्य दामों में उपलब्ध होगी? - इसकी एक डोजे का मूल्य भारत में करीब 50,000 रुपये होगा. ये दवाई महंगी तो है लेकिन इसका उत्पादन बहुत कम है.
. अगर आप कोविड पॉजिटिव हो चुके हैं, उसके बाद आपकी रिपोर्ट निगेटिव भी आ चुकी है. अगर आपका किसी कोविड पॉजिटिव इंसान से सामना हो जाए, तो संक्रमित होने की संभावना कितने प्रतिशत बढ़ सकती है? - संक्रमण होने की संभावना बेहद कम है परन्तु बच कर ही रहने की सलाह दी जाती है. दूसरी बात नए प्रकार के वायरस आने से पुरानी इम्युनिटी कितनी संक्रमित होती है, ये कहना मुश्किल है. इस विषय पर रिसर्च जारी है.
. कोरोना वायरस से फेफड़े और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ रहा है, इसका कारण क्या है, क्लॉटिंग की समस्या कब और क्यों हो रही है ? - कोविड-19 वायरस का प्रभाव पूरे शरीर पर पड़ता है, ऐसा नहीं है कि र्सिफ इसका प्रभाव फेफड़ों पर पड़ता है. हमारी बॉडी जो वायरस को कंटेन करने के लिए साइटोकिनिन रिलीज करती है, जिसे प्योर मैकेनिज्म कहते हैं. जब हमारे शरीर में अत्यधिक मैकेनिजम पाये जाते हैं, जिसे हार्ट की आर्टरी और छोटी-छोटी नलियों (कैपिलरी) के कारण ब्लड क्लॉट हो जाता है. ब्लड क्लॉट होने से हार्ट अटैक होता है. वहीं दूसरी ओर फेफड़े में जिन लोगों को समस्या होती है उसकी वजह भी क्लॉटलेट ही है. इस वायरस का प्रभाव हॉर्ट पर ज्यादा पड़ता है. इसका कारण कार्डियोमायोपैथी है. हार्ट की पम्पिंग जो सामन्य रूप से 60 से 65 प्रतिशत होती है, वहीं लोगों में 20-25 तक आ जाती है. इसके लिए डॉक्टरों को हार्ट और फेफड़े दोनों पर काम करना होता है.
. क्या डी डीमर इमिडिएट का उपचार घर पर किया जा सकता है? - इस पर डॉ नरेश का कहना है कि जिन लोगों को उनकी बीमारी का पता होता है या उन्हें क्लॉटिंग की समस्या है तो वे लोग अपना उपचार शुरू से दवाइयों के साथ करते हैं. वही डी डिमर टेस्ट डॉक्टरों का गाइड है, जरूरी नहीं कि इस उपचार के बाद लोग ठीक हो जाएं. इसका उपचार दवाई खा कर भी किया जा सकता है.
. आईसीयू में बेडो की संख्या क्यों बढ़ायी जा रही है? - जो लोग इस महामारी में अस्पतालों में एडमिट हो रहे हैं, वे ठीक हुए ही नहीं है कि घर वापस जाएं. वैसे लोगों को ही ऑक्सीजन पर रखा जा रहा है. अस्पतालों में आईसीयू की डिमांड चारों ओर है. वे मरीज नये नही है, पुराने मरीज ही आईसीयू में भरती है, जिन लोगों के फेफड़े रेस्पोंस नहीं कर रहे उन्हें आईसीयू में रखा जा रहा है. यही कारण है कि आईसीयू की डिमांड बढ़ रही है. वहीं अगर ऐसे लोग आईसीयू में भी ठीक नही हो रहे हैं तो उनका उपचार एक्वा डिवाइस से किया जाता है. परन्तु पर्याप्त मात्रा में मशीनें उपलब्ध नहीं हैं.
. नयी बीमारी के लक्षण क्या हैं, इससे कैसे निजात पाया जा सकता है? - जिन लोगों में हाई स्टेरॉयड की समस्या लंबे समय से है या जिन्हें डाइबिटीज की समस्या है, उनके फेफड़े को बचाने के लिए स्टेरॉयड दी जाती है. ऐसे ही मरीजों की आंखों में स्वेलिंग के साथ जुकॉम, खांसी, नॉक से खून आदि के आने से होती है. इसे वैज्ञानिकों ने म्यूकोरमाइकोसिस का नाम दिया है. इसका उपचार बहुत जल्दी हो सकता है. इसे ब्लैक फंगस भी कहते हैं. इन समस्याओं के होने से आंख के डॉक्टरों से संपर्क करें. इस बीमारी को समय रहते ही उपचार करवा लें, नही तो ये बीमारी भयंकर रूप ले सकती है.





