नई दिल्ली: विपक्ष ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के प्रस्ताव के लिए शुक्रवार को संसद के दोनों सदनों, लोकसभा और राज्यसभा में नोटिस दिए. इस नोटिस पर 200 से अधिक सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं. सूत्रों ने बताया कि नोटिस में सात बिंदु हैं. नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सात आरोप लगाए गए हैं, जिनमें “पद पर रहते हुए पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण”, “चुनावी धोखाधड़ी की जांच में जान-बूझकर बाधा डालने” और “बड़े पैमाने पर मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने” जैसे आरोप शामिल हैं. (नीचे भी पढ़ें)
यहां आ रही सूचनाओं के अनुसार लोकसभा के 130, जबकि राज्यसभा के 63 सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं. विपक्ष के एक नेता ने बताया कि सांसदों ने नोटिस को लेकर काफी उत्साह दिखाया और आवश्यक संख्या पूरी हो जाने के बाद भी गुरुवार को कई सांसदों ने हस्ताक्षर किए. नियमों के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए नोटिस पर लोकसभा के कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा के 50 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं. सूत्रों के अनुसार, इस नोटिस पर विपक्षी इंडिया गठबंधन के सभी दलों के सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं. इसके अलावा आम आदमी पार्टी के सांसदों ने भी नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं, हालांकि पार्टी अब आधिकारिक रूप से इस गठबंधन का हिस्सा नहीं है. यह पहली बार है जब मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने के लिए इस तरह का नोटिस दिया गया है. (नीचे भी पढ़ें)
विपक्षी दलों ने कई मौकों पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की मदद करने का आरोप लगाया है. खासकर मतदाता सूचियों की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) प्रक्रिया को लेकर. विपक्ष का आरोप है कि यह प्रक्रिया केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से की जा रही है. विशेष रूप में पश्चिम बंगाल में एसआइआर की प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई गई है. मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाने का आरोप लगाया है. (नीचे भी पढ़ें)
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया महाभियोग है जो उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए अपनाई जाती है. महाभियोग केवल सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर ही लगाया जा सकता है. सीईसी को हटाने का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है और इसे पारित होने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है. सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत इसके लिए जरूरी होता है.







