
रांची : पूरे देश में झारखंड ऐसा पहला राज्य था जहां सभी जिला सहकारी बैंकों को मिलाकर राज्य सहकारी बैंक का गठन 1 अप्रैल 2017 को किया गया था. नतीजतन इस सार्थक प्रयोग की सफलता और असफलता का विश्लेषण देश के अन्य राज्य कर रहे हैं. वर्तमान में सरकार एवं नियामक संवैधानिक संस्था आरबीआई एवं नाबार्ड की उदासीनता एवं निष्क्रियताओं के कारण नवगठित झारखंड राज्य सहकारी बैंक निचले पायदान पर पहुंच चुका है. यह बातें बैंक के रांची स्थित शहीद चौक मुख्यालय में संवाददाता सम्मेलन के दौरान झारखंड राज्य सहकारी बैंक कर्मचारी संघ के अध्यक्ष अनिल पन्ना ने दी. इस दौरान महासचिव चंदन कुमार प्रसाद, कोषाध्यक्ष निखिल बंका, राजीव कुमार समेत अन्य लोग मौजूद थे. इन लोगों ने बताया कि यह आमेलन इसलिए हुआ था कि सहकारी बैंक तुलनात्मक रूप से व्यवसायिक बैंकों की श्रेणी में आ सके. लेकिन सरकार की अदूरदर्शिता के कारण बैंक अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. आज बैंक में ना तो कोई प्रशासक है और ना ही कोई मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी. साथ ही साथ बोर्ड द्वारा संचालित होने वाले इस बैंक में विगत 1.5 वर्ष से बोर्ड रहित अवस्था में चल रहा है. इन लोगों ने बताया कि बैंक संचालन के लिए 30 जुलाई 2021 को एक प्रशासक आइएएस रमेश घोलप गोरख को नियुक्त किया गया था लेकिन 3 माह के अंदर 25 अक्टूबर 2021 को उनका तबादला कर दिया गया. वर्तमान में विगत 2 माह से बैंक में कोई प्रशासक नहीं है. बैंक के रोजाना काम के लिए मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी प्रेम प्रकाश को दिनांक 16 सितंबर 2020 को नियुक्त किया गया था. 30 जून 2021 को उनके इस्तीफे के बाद यह पद खाली है. अब बैंक की नीतियों के क्रियान्वयन के लिए कोई सक्षम पदाधिकारी नहीं है. इस संदर्भ में सरकार को कई बार संघ के माध्यम से पत्राचार किया गया लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई. ऐसे में बैंक का अस्तित्व को लेकर संघ चिंतित है. संघ ने कहा है कि बैंक को दुरुस्त करने के लिए मैनपावर को फिर से पुनर्गठित की जाये, नये बाइलॉज बनाये जाये, एक एसओपी के तहत काम हो, जिसमें सर्विस रुल, आइटी पॉलिसी बनायी जाये, बैंक के शीर्ष प्रबंधन को पदस्थापित की जाये, सीबीएस प्रणाली के जरिए बैंक संचालन के लिए सुदृढ़ आइटी सिस्टम का पुनर्गठन की जाये, धोखाधड़ी एवं फ़्रॉड की पृष्ठभूमि की निगरानी के लिए सुदृढ़ आंतरिक अंकेक्षण प्रणाली का निर्माण किया जाये जबकि बैंक के लिए एक सुव्यवस्थित प्रशिक्षण संस्था का निर्माण किया जाना था. उपरोक्त कार्यो को संपादित करने के लिए सरकार द्वारा बजटीय प्रावधान के तहत अनुदान उपलब्ध कराया जाना था किंतु अत्यंत खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि सरकार द्वारा इसे अपनी प्राथमिकता में नहीं लिया गया. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि नियामक संस्थाएं आरबीआई ने आमेलन पूर्व नियम शर्तों के अनुरूप सरकार के आश्वासन पर बगैर उपरोक्त शर्तों को पूरा किए बैंकिंग लाइसेंस दिया. अब जबकि आमेलन के 4.5 वर्ष गुजर चुके हैं, इस संबंध में आरबीआई ने भी उदासीनता दिखाते हुए अभी तक कोई डायरेक्टिव जारी नहीं किया है. स्थितियां बद से बदतर की ओर पहुंच चुकी है. परिणाम स्वरूप किसानों, मजदूरों एवं गरीब तबके के लोगों के उत्थान के लिए बनी ऐसी महत्वपूर्ण संस्था कोमा में जा रही है. इन लोगों ने बैंक के मुख्यालय स्तर पर महाप्रबंधक, उप महाप्रबंधक,सहायक महाप्रबंधक तथा क्षेत्रीय कार्यालय में क्षेत्रीय प्रबंधक के पद रिक्त हैं, जिसको भरा जाये. बैंक में जूनियर लेबल कर्मचारियों के स्वीकृत कार्य बल से आधे कार्यबल कार्यरत हैं, जिसको दुरुस्त करने की जरूरत है. इन लोगों ने कहा है कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुई तो वे लोग चरणबद्ध आंदोलन करेंगे.




