जमशेदपुर : आज की तारीख में तरूणा साहू किसी परिचय का मोहताज नहीं हैं. प्रायः विलुप्त हो चली पंडवानी गायकी को वह संभाल रही हैं, बचा रही हैं. आरपीएफ इंस्पेक्टर की नौकरी करने के साथ-साथ वह पंडवानी के लिए भी वक्त निकालती हैं. टूर से लौटने के बाद जैसे ही तरूणा अपनी संतान को देखती हैं, भूल जाती हैं कि वह पंडवानी गायिका हैं या आरपीएफ इन्सपेक्टर! वह सबसे पहले अपनी संतान की फरमाइश पर पराठे बनाती हैं और जब वह खा-पीकर मस्त हो जाता है, तब अन्य कार्य करती हैं. तरुणा एक मां हैं, एक गायिका और आरपीएफ इन्सपेक्टर….तीनों जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही हैं. हाल ही में वह साहू समाज के कार्यक्रम में जमशेदपुर आई थीं. उनकी प्रस्तुति की खूब चर्चा हुई. उनसे पंडवानी और उनके जीवन के बारे में लंबी बातचीत हुई. प्रस्तुत है संपादित अंशः
प्रश्न : सबसे पहले अपने बारे में बताइए, आपका जन्म कहां हुआ और पढ़ाई-लिखाई कहां से हुई?
उत्तर : मेरा नाम तरुणा साहू है. मेरे पिता का नाम डीके साहू है, जो सेवानिवृत्त शिक्षक हैं. मेरी माता का नाम स्वर्गीय जानकी साहू था. मेरे पति अमन साहू छत्तीसगढ़ पुलिस में इंस्पेक्टर हैं और मैं रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) में इंस्पेक्टर हूं. मेरा जन्म रायपुर में हुआ. हालांकि मेरे पिताजी की नौकरी एक छोटे से आदिवासी गांव धावा (चास क्षेत्र) में थी, इसलिए मेरी प्रारंभिक शिक्षा वहीं हुई. मैंने पहली से पांचवीं कक्षा तक की पढ़ाई वहीं की. बचपन से ही पढ़ाई में अच्छी थी. मेरे पिता हमेशा चाहते थे कि मैं जीवन में आगे बढ़ूं और कुछ बड़ा करूं. जब मैं चौथी कक्षा में थी, तब पिता ने मुझे जवाहर नवोदय विद्यालय, माना कैंप, रायपुर के बारे में बताया. मैंने उसी समय से उसकी तैयारी शुरू कर दी. मेहनत का परिणाम यह रहा कि नगरी ब्लॉक से केवल दो बच्चों का चयन हुआ और उनमें से एक मैं थी. इस प्रकार मेरा प्रवेश जवाहर नवोदय विद्यालय माना कैंप रायपुर में हुआ. (नीचे भी पढ़ें)

प्रश्न : पंडवानी और संगीत से आपका जुड़ाव कैसे शुरू हुआ?
उत्तर : बचपन से ही मुझे गाने और नृत्य का बहुत शौक था. मैं स्वभाव से काफी चंचल थी. जब भी अवसर मिलता, मैं गुनगुनाने लगती थी. एक बार रक्षाबंधन की छुट्टियां चल रही थीं. मैं अपने अंदाज़ में ज़ोर-ज़ोर से गाना गा रही थी. मुझे लगा कि कोई सुन नहीं रहा है, लेकिन संगीत शिक्षक ने मेरी आवाज़ सुन ली. उन्होंने सभी बच्चों को बुलाया और पूछा कि इतनी ज़ोर से कौन गा रहा था? मुझे लगा कि आज डांट पड़ेगी. लेकिन जब मैं उनके सामने पहुंची तो उन्होंने कहा, “बेटा, तुम बहुत अच्छा गाती हो. ” मैंने आश्चर्य से पूछा, “सच में?” उन्होंने कहा, “हां, बिल्कुल. ” फिर उन्होंने मुझसे छत्तीसगढ़ी गीत सुनाने को कहा. मैंने जितने गीत मुझे आते थे, सब सुनाए. उसी दिन उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं तीजन बाई को जानती हूं. मैंने कहा, “हां, जानती हूं. ” उन्होंने फिर पूछा, “क्या तुम पंडवानी सीखना चाहोगी?” मैंने तुरंत कहा, “हां, बिल्कुल सीखना चाहूंगी. (नीचे भी पढ़ें)

प्रश्न : तीजन बाई से मुलाकात कैसे हुई?
उत्तर : कुछ दिनों बाद जवाहर नवोदय विद्यालय बोरई में एक विशेष शिविर आयोजित किया गया. वहां अच्छे गायक विद्यार्थियों का चयन किया गया. लगभग 100 से 150 बच्चों में से केवल तीन बच्चों का चयन पंडवानी प्रशिक्षण के लिए हुआ और उनमें मैं भी शामिल थी. उसी शिविर में मेरी मुलाकात प्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई से हुई. लगभग 15 दिनों तक उनका प्रशिक्षण चला. उन्होंने हमें पंडवानी की बारीकियां सिखाईं.
प्रश्न : शुरुआती मंचीय अनुभव कैसे रहे?
उत्तर : मुझे आज भी याद है कि उज्जैन के कालिदास समारोह में प्रस्तुति देने का अवसर मिला था. वहां मैं तीजन बाई के साथ मंच साझा कर रही थी. उन्होंने मुझे द्रौपदी स्वयंवर का प्रसंग प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी दी. मैंने पूरे आत्मविश्वास के साथ उस प्रसंग को प्रस्तुत किया और दर्शकों ने उसे खूब सराहा. उसी समय मुझे महसूस हुआ कि पंडवानी केवल कला नहीं, बल्कि मेरी पहचान बनने जा रही है. तीजन बाई केवल मेरी गुरु नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने मुझे अपनी बेटी जैसा स्नेह दिया. जब भी मुझे समय मिलता, मैं उनके घर जाकर उनसे सीखती थी. उन्होंने मुझे बहुत करीब से मार्गदर्शन दिया और लगातार प्रोत्साहित किया. (नीचे भी पढ़ें)
प्रश्न : क्या आपको विदेश जाने का अवसर भी मिला था?
उत्तर : हां, जब मैं सातवीं कक्षा में थी, तब तीजन बाई मुझे अपने साथ फ्रांस (पेरिस) ले जाना चाहती थीं. लेकिन उस समय मैं परिवार की सबसे बड़ी बेटी थी. मेरे माता-पिता को मेरी सुरक्षा और कम उम्र की चिंता थी, इसलिए उन्होंने मुझे विदेश भेजने की अनुमति नहीं दी. हालांकि, पेरिस से लौटने के बाद तीजन बाई मेरे लिए वहां से एक विशेष उपहार लेकर आईं, जिसे मैंने आज भी संभालकर रखा है.
प्रश्न : पंडवानी के साथ-साथ आपकी पढ़ाई कैसे आगे बढ़ी?
उत्तर : पंडवानी सीखने के साथ-साथ मैंने अपनी पढ़ाई भी पूरी लगन से जारी रखी. संगीत के प्रति रुचि होने के कारण मैंने शास्त्रीय संगीत का भी प्रशिक्षण लेना शुरू किया. आगे चलकर मैंने संगीत प्रभाकर की उपाधि प्राप्त की और शास्त्रीय संगीत में भी डिग्री हासिल की. स्कूल जीवन में मेरी पढ़ाई लगातार अच्छी रही. बारहवीं कक्षा में मैंने बिजनेस स्टडीज़ विषय में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और स्वर्ण पदक प्राप्त किया. (नीचे भी पढ़ें)
प्रश्न : एनसीसी और अन्य गतिविधियों में आपका अनुभव कैसा रहा?
उत्तर : कॉलेज में पढ़ाई के दौरान मैंने एनसीसी (राष्ट्रीय कैडेट कोर) जॉइन किया. एनसीसी ने मेरे व्यक्तित्व को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. मैं ‘सी’ सर्टिफिकेट धारक हूं और मेरा चयन दिल्ली गणतंत्र दिवस परेड के लिए भी हुआ था. यह मेरे जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक रही. एनसीसी ने मुझे अनुशासन, नेतृत्व क्षमता और देश सेवा की भावना सिखाई, जिसका लाभ मुझे आगे चलकर नौकरी और सामाजिक जीवन दोनों में मिला.
प्रश्न : आपकी पंडवानी कला को राष्ट्रीय स्तर पर कब पहचान मिली?
उत्तर : मेरी पंडवानी प्रस्तुतियों को बचपन से ही सराहना मिलती रही. मुझे कई बड़े मंचों पर प्रस्तुति देने का अवसर मिला. उस दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने भी मेरी पंडवानी प्रस्तुति देखी और उसकी सराहना की. यह मेरे लिए बेहद गौरव का क्षण था. वर्ष 2005 में लोक एवं पारंपरिक कला के क्षेत्र में आयोजित चयन प्रक्रिया के दौरान मेरा चयन राष्ट्रीय छात्रवृत्ति के लिए हुआ. मुझे दो वर्षों तक प्रतिमाह छात्रवृत्ति राशि प्राप्त हुई. इस दौरान मैंने अपनी गुरु तीजन बाई के मार्गदर्शन में पंडवानी का गहन अध्ययन किया और अपनी कला को और अधिक निखारा.
प्रश्न : रेलवे सुरक्षा बल तक पहुँचने का सफर कैसे शुरू हुआ?
उत्तर : स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी. इसी दौरान मेरा चयन रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) में हो गया. वर्ष 2009 में मेरी नौकरी लग गयी. हालांकि उस समय मैं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की भी तैयारी कर रही थी. नौकरी जॉइन करने के बाद मुझे एक अन्य परीक्षा देने के लिए लखनऊ जाना पड़ा. उस समय मुझे लगा कि शायद मैं किसी और सेवा में चयनित हो जाऊंगी, इसलिए मैंने आरपीएफ की नौकरी छोड़ने का भी निर्णय ले लिया. लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनीं कि जिस परीक्षा की मैं तैयारी कर रही थी, उसकी प्रक्रिया में विलंब हो गया. (नीचे भी पढ़ें)
प्रश्न : नौकरी छोड़ने के बाद दोबारा आरपीएफ में वापसी कैसे हुई?
उत्तर : जब मैंने नौकरी छोड़ी थी, तब मुझे उतना दुख नहीं हुआ था, जितनी खुशी मुझे दोबारा वापस बुलाए जाने पर हुई. लगभग छह महीने बाद मुझे सूचना मिली कि यदि मैं चाहूँ तो पुनः अपनी सेवा जॉइन कर सकती हूं. यह मेरे लिए बहुत बड़ी राहत थी, क्योंकि मैंने एक अच्छी नौकरी को अपने सपनों के लिए छोड़ा था. उस समय सब-इंस्पेक्टर के रूप में वेतन भी अच्छा था और करियर की संभावनाएं भी थीं. जब दोबारा सेवा में लौटने का अवसर मिला तो मैंने उसे पूरी निष्ठा के साथ स्वीकार किया और मन लगाकर प्रशिक्षण की तैयारी शुरू कर दी.
प्रश्न : आरपीएफ में पहली पोस्टिंग के बाद पंडवानी का सफर कैसे आगे बढ़ा?
उत्तर : वर्ष 2011 में मेरी पहली पोस्टिंग बिलासपुर में हुई. वहां आने के बाद भी मेरा पंडवानी से जुड़ाव बना रहा. बिलासपुर में मैंने कुछ मंचीय प्रस्तुतियां दीं, जिन्हें लोगों ने काफी पसंद किया. उसी दौरान मेरे पंडवानी कार्यक्रम को देखने का अवसर आरपीएफ के वरिष्ठ अधिकारियों को भी मिला. उस समय जो अधिकारी बाद में हमारे आईजी बने, उन्होंने मेरी प्रस्तुति देखी और उसकी सराहना की. उसके बाद भी बीच-बीच में छोटे-बड़े कार्यक्रम होते रहे, लेकिन नौकरी की जिम्मेदारियों के कारण मंचीय प्रस्तुतियां पहले जैसी नियमित नहीं रह पाईं. (नीचे भी पढ़ें)
प्रश्न : फिर पंडवानी में कुछ समय का अंतराल क्यों आ गया?
उत्तर : मेरी शादी हो गयी. वर्ष 2017 में. इसके बाद परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ीं. फिर मेरे बेटे का जन्म हुआ और उसके कुछ समय बाद कोरोना महामारी आ गयी. इन सभी परिस्थितियों के कारण मेरे पंडवानी कार्यक्रमों में स्वाभाविक रूप से एक लंबा अंतराल आ गया. ऐसा नहीं था कि मैंने पंडवानी को छोड़ दिया था, लेकिन मंच पर नियमित प्रस्तुतियां देना लगभग बंद हो गया था. (नीचे भी पढ़ें)
प्रश्न: पंडवानी में आपकी वापसी कैसे हुई?
उत्तर : मेरी पंडवानी में वापसी एक तरह से अप्रत्याशित थी. जो अधिकारी बाद में आरपीएफ के आईजी बने, उन्होंने एक बार फिर मेरे बारे में जानकारी जुटाई. उन्होंने मेरे प्रदर्शन को याद रखा था और उन्होंने संदेश भिजवाया कि मुझे ऑल इंडिया बैंड प्रतियोगिता में पंडवानी की प्रस्तुति देनी है. जब यह संदेश मिला तो मैं थोड़ी घबरा गई, क्योंकि उस समय मेरे पास न तो नियमित टीम थी और न ही मंचीय अभ्यास पहले जैसा था. मैंने विनम्रता से कहा कि फिलहाल मेरे पास समूह नहीं है और मैं अभ्यास में भी नहीं हूं, इसलिए शायद मैं अच्छा प्रदर्शन न कर पाऊं. लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों ने मुझसे कहा कि कोई बहाना नहीं चलेगा, मुझे हर हाल में प्रस्तुति देनी है. तब मैंने निर्णय लिया कि मैं पूरी कोशिश करूंगी. (नीचे भी पढ़ें)
प्रश्न : उस समय आपने तैयारी कैसे की?
उत्तर : जब मुझे कार्यक्रम की जिम्मेदारी मिली तो मैं काफी चिंतित थी। मैंने अपने पति से इस बारे में चर्चा की। मैंने उनसे कहा कि इतने वर्षों बाद मंच पर जाना है और मेरे पास न तो पूरा समूह है और न ही पर्याप्त तैयारी। तब मेरे पति ने मेरा हौसला बढ़ाया। उन्होंने कहा कि जो भी संसाधन उपलब्ध हैं, उन्हीं के साथ पूरी मेहनत करो और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देने का प्रयास करो। इसके बाद मैंने दो से तीन दिनों तक लगातार अभ्यास किया। एक छोटा-सा समूह तैयार किया और पूरी लगन के साथ प्रस्तुति की तैयारी शुरू कर दी।
प्रश्न : क्या आपको अयोध्या में प्रस्तुति देने का अवसर मिला?
उत्तर : हाँ, कुछ समय बाद मुझे अयोध्या से प्रस्तुति देने का आमंत्रण मिला। उस समय वहाँ एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आयोजन हो रहा था, जिसमें देश और विदेश के कलाकार भाग ले रहे थे। मेरे लिए यह अत्यंत गौरव और सौभाग्य का अवसर था। मैं अपनी पूरी टीम, परिवार, पति, सास और माता-पिता के साथ वहाँ पहुँची। वहाँ की व्यवस्था, वातावरण और आध्यात्मिक अनुभूति अद्भुत थी। मुझे ऐसा लगा जैसे स्वयं भगवान श्रीराम ने मुझे वहाँ बुलाया हो। उस मंच पर प्रस्तुति देना मेरे जीवन के सबसे यादगार अनुभवों में से एक बन गया। अयोध्या में प्रस्तुति देना मेरे जीवन के सबसे यादगार और भावनात्मक अनुभवों में से एक रहा। वहाँ मुझे देश-विदेश से आए कलाकारों के बीच प्रस्तुति देने का अवसर मिला। मैं अपनी पूरी टीम, परिवार, पति, सास, माता-पिता और अन्य परिजनों के साथ वहाँ पहुँची थी। वहाँ की व्यवस्था अत्यंत सुंदर और भव्य थी। भगवान श्रीराम की नगरी में प्रस्तुति देना मेरे लिए किसी आशीर्वाद से कम नहीं था। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था मानो स्वयं भगवान ने मुझे वहाँ बुलाया हो। मैंने पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ अपनी प्रस्तुति दी। जब मैंने मंच पर प्रस्तुति दी, तो दर्शक पूरी तन्मयता से सुनते रहे। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद अनेक लोगों की आँखों में आँसू थे। कई दर्शक मेरे पास आए और कहा कि प्रस्तुति ने उन्हें भावुक कर दिया। लोग लगातार मेरे साथ फोटो खिंचवाने लगे। मुझे यह देखकर बहुत खुशी हुई कि मेरी कला लोगों के दिल तक पहुँच रही है। मेरे लिए किसी भी कलाकार का सबसे बड़ा पुरस्कार दर्शकों का प्रेम और सम्मान ही होता है। (नीचे भी पढ़ें)
प्रश्न : आपके पति की प्रतिक्रिया क्या थी?
उत्तर : मेरे पति ने पहली बार मुझे इतने बड़े मंच पर पंडवानी प्रस्तुत करते हुए देखा था। प्रस्तुति समाप्त होने के बाद वे मेरे पास आए और भावुक होकर मुझे गले लगा लिया। उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता था कि तुम इतनी अच्छी कलाकार हो। तुम्हें नौकरी के साथ-साथ पंडवानी को भी जारी रखना चाहिए। माता सरस्वती का ऐसा वरदान हर किसी को नहीं मिलता। तुम लगातार दो घंटे तक प्रस्तुति देती हो, लोग तुम्हें इतना प्यार देते हैं और तुम्हारी अभिनय क्षमता भी अद्भुत है।” उनकी यह बात मेरे लिए बहुत बड़ी प्रेरणा बनी।
प्रश्न : पंडवानी वास्तव में क्या है?
उत्तर : पंडवानी मूल रूप से महाभारत और पांडवों की कथा पर आधारित लोकगायन शैली है। “पंडवानी” का अर्थ ही है–पांडवों की वाणी या पांडवों की कथा। इसमें हम महाभारत के विभिन्न प्रसंगों को गायन, अभिनय और संवाद के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। इसके जरिए हम बताते हैं कि किस प्रकार धर्म और अधर्म के संघर्ष से महाभारत की रचना हुई तथा अंततः धर्म की विजय हुई। पंडवानी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज को नैतिक और सांस्कृतिक संदेश देने वाली एक महत्वपूर्ण लोककला है।
प्रश्न : द्रौपदी चीरहरण जैसे प्रसंगों के माध्यम से आप क्या संदेश देती हैं?
उत्तर : जब मैं द्रौपदी चीरहरण का प्रसंग प्रस्तुत करती हूँ, तो उसके माध्यम से समाज को एक महत्वपूर्ण संदेश देने का प्रयास करती हूँ। महाभारत में जब द्रौपदी का अपमान किया जाता है, तब सभा में अनेक महान योद्धा और विद्वान उपस्थित होते हैं, लेकिन अधिकांश लोग मौन रहते हैं। यही मौन अंततः महाभारत जैसे विनाशकारी युद्ध का कारण बनता है। मैं लोगों को यह संदेश देती हूँ कि किसी भी परिस्थिति में नारी का अपमान नहीं होना चाहिए। जब किसी महिला के सम्मान पर चोट पहुँचती है, तब उसका परिणाम पूरे समाज को भुगतना पड़ता है। साथ ही यह प्रसंग यह भी सिखाता है कि सच्चे मन से ईश्वर पर विश्वास रखने वालों की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं। जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाई, वैसे ही ईश्वर सदैव अपने भक्तों के साथ रहते हैं।
प्रश्न : क्या आपकी नौकरी में भी ऐसे अनुभव हुए हैं जहाँ आपको लगा कि ईश्वर की विशेष कृपा रही?
उत्तर : हाँ, कई बार ऐसे अवसर आए हैं जब मुझे लगा कि किसी अदृश्य शक्ति का आशीर्वाद मेरे साथ है। रेलवे सुरक्षा बल में कार्य करते हुए मैंने अनेक बच्चों को रेस्क्यू किया है। जब कोई माता-पिता अपने लापता बच्चे की तलाश में निराश होकर मेरे पास आते हैं, तो मैं उन्हें हमेशा भरोसा दिलाती हूँ कि पूरी कोशिश की जाएगी और ईश्वर पर विश्वास रखना चाहिए। कई मामलों में हमें सफलता मिली है और बच्चों को सुरक्षित उनके परिवार तक पहुँचाने में हम कामयाब हुए हैं। ऐसे क्षण मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं होते।
प्रश्न : कोई विशेष रेस्क्यू अभियान जो आपको आज भी याद हो?
उत्तर : हाँ, एक घटना मुझे आज भी याद है। एक लगभग चार वर्षीय बच्चा ट्रेन की इमरजेंसी खिड़की से गिर गया था और उसकी स्थिति गंभीर हो गई थी। जैसे ही सूचना मिली, हमने तत्काल कार्रवाई शुरू की। बच्चे को सुरक्षित अस्पताल पहुँचाने के लिए ग्रीन कॉरिडोर की व्यवस्था कराई गई। उसके इलाज के लिए डॉक्टरों से संपर्क किया गया और हर संभव सहायता उपलब्ध कराई गई। अगले दिन मुझे सूचना मिली कि बच्चा खतरे से बाहर है। बाद में उस बच्चे ने वीडियो कॉल के माध्यम से मुझसे बात भी की। वह क्षण मेरे लिए अत्यंत भावुक और संतोष देने वाला था। मुझे लगा कि मेरी नौकरी का वास्तविक उद्देश्य ऐसे ही कार्यों में है। (नीचे भी पढ़ें)
प्रश्न : आप अपनी पंडवानी की साधना और अभ्यास कैसे करती हैं?
उत्तर : मैं नियमित रूप से रियाज करती हूँ। प्रतिदिन घर पर लगभग आधे घंटे तक स्वर साधना और सर्गम का अभ्यास करती हूँ। इसके अलावा सप्ताह में एक दिन अपनी पूरी टीम के साथ सामूहिक अभ्यास भी करती हूँ। आमतौर पर ड्यूटी समाप्त होने के बाद रात में हम लोग बैठते हैं और दो से तीन घंटे तक अभ्यास करते हैं। कई बार रात के 11-12 बजे तक रियाज चलता है। मेरा मानना है कि किसी भी कला में निरंतर अभ्यास ही सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है।
प्रश्न : आरपीएफ की जिम्मेदारियों और पंडवानी के बीच संतुलन कैसे बनाती हैं?
उत्तर : यह सच है कि एक इंस्पेक्टर की जिम्मेदारियाँ बहुत बड़ी होती हैं। नौकरी में चौबीसों घंटे सजग रहना पड़ता है। कई बार ऐसी परिस्थितियाँ भी आईं जब मुझे लगा कि पंडवानी के लिए समय निकालना मुश्किल हो रहा है। मैंने आपको पहले भी बताया कि लगभग आठ-नौ वर्षों तक मैंने नियमित मंचीय प्रस्तुतियाँ नहीं दीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि मैंने पंडवानी को छोड़ दिया था। मैं हमेशा अपने भीतर इस कला को जीवित रखे हुए थी। मेरा मानना है कि यदि मेरे वरिष्ठ अधिकारियों ने मुझे दोबारा मंच पर आने के लिए प्रेरित नहीं किया होता, तो शायद मैं आज फिर से पंडवानी के क्षेत्र में सक्रिय नहीं होती। जब-जब मैंने इस कला से दूरी बनाने की कोशिश की, किसी न किसी रूप में परिस्थितियाँ मुझे फिर उसी दिशा में ले आईं।
प्रश्न : आपके लिए नौकरी और पंडवानी में कौन अधिक महत्वपूर्ण है?
उत्तर : मेरे लिए सबसे पहले मेरी ड्यूटी है। मेरी नौकरी ही वह माध्यम है जिससे मैं अपने परिवार और बच्चों का पालन-पोषण करती हूँ। इसलिए मैं हमेशा कहती हूँ कि मेरा पहला धर्म मेरी ड्यूटी है। लेकिन पंडवानी मेरी साधना है, मेरी आत्मा से जुड़ी हुई चीज़ है। यह केवल एक कला नहीं, बल्कि मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा है। इसलिए मैं दोनों को साथ लेकर चलने का प्रयास करती हूँ। मैं जहाँ भी रहती हूँ, जिस भी परिस्थिति में रहती हूँ, पंडवानी मेरे साथ रहती है।
प्रश्न : पंडवानी को लेकर आपका सबसे बड़ा सपना क्या है?
उत्तर : मेरा सबसे बड़ा सपना है कि पंडवानी देश और दुनिया के हर कोने तक पहुँचे। मेरी गुरु तीजन बाई ने जिस तरह इस लोककला को वैश्विक पहचान दिलाई, मैं भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाना चाहती हूँ। एक बार जब मैं उनसे मिलने गई थी, तब उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर कहा था कि उनकी इच्छा है कि पंडवानी की यह विरासत आगे बढ़ती रहे। उन्होंने मुझ पर विश्वास जताया और कहा कि मैं इस परंपरा को आगे ले जा सकती हूँ। उनकी यह बात मेरे लिए किसी आशीर्वाद से कम नहीं है। मैं आज भी उसे अपने जीवन का मार्गदर्शन मानती हूँ।
प्रश्न : तीजन बाई के साथ आपका रिश्ता कैसा रहा?
उत्तर : तीजन दीदी ने मुझे हमेशा अपनी बेटी की तरह स्नेह दिया। बचपन से ही उनका मेरे ऊपर विशेष स्नेह रहा है। जब मैं छोटी थी, तब उनके साथ बिताए हुए अनेक यादगार पल आज भी मेरे मन में ताज़ा हैं। उनका साज-सज्जा का अंदाज़, मंच पर जाने की तैयारी, पंडवानी के प्रति समर्पण और दर्शकों के साथ उनका जुड़ाव – यह सब मैंने बहुत करीब से देखा है। मैं हमेशा उनके व्यक्तित्व और कला से प्रेरित रही हूँ। आज भी जब मैं मंच पर जाती हूँ तो कोशिश करती हूँ कि उनकी परंपरा और शैली का सम्मान करते हुए प्रस्तुति दूँ।
प्रश्न : क्या आप मानती हैं कि ईश्वर ने आपको किसी विशेष उद्देश्य के लिए चुना है?
उत्तर : हाँ, मुझे ऐसा लगता है। मेरा मानना है कि भगवान हर व्यक्ति को कोई न कोई विशेष प्रतिभा देकर भेजते हैं। हर किसी को एक जैसी क्षमताएँ नहीं मिलतीं। यदि मुझे पंडवानी जैसी कला मिली है और साथ ही देश सेवा का अवसर भी मिला है, तो निश्चित रूप से इसके पीछे ईश्वर की कोई योजना है। इसलिए मैं इसे केवल अपनी उपलब्धि नहीं मानती, बल्कि भगवान का आशीर्वाद समझती हूँ। मुझे लगता है कि जो भी प्रतिभा हमें मिली है, उसका उपयोग समाज और संस्कृति के हित में करना चाहिए।
प्रश्न : पंडवानी का भविष्य आप कैसा देखती हैं?
उत्तर : मुझे पंडवानी का भविष्य बहुत उज्ज्वल दिखाई देता है। आज नई पीढ़ी इस कला को जानना और सीखना चाहती है। जब मैं विभिन्न कार्यक्रमों में प्रस्तुति देती हूँ, तो स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थी मेरे पास आते हैं और कहते हैं कि उन्हें पहली बार पंडवानी के बारे में जानकारी मिली है। कई बच्चे मुझसे इसे सीखने की इच्छा भी व्यक्त करते हैं। यही देखकर मुझे विश्वास होता है कि पंडवानी की परंपरा आगे भी जीवित रहेगी। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से भी यह कला नई पीढ़ी तक पहुँच रही है। यदि हम लगातार प्रयास करते रहें, तो आने वाले समय में पंडवानी और अधिक लोकप्रिय होगी।
प्रश्न : समाज और युवाओं के लिए आपका क्या संदेश है?
उत्तर : मैं हमेशा युवाओं, महिलाओं और समाज के लोगों से कहती हूँ कि अपनी पहचान स्वयं बनाइए। पहचान छोटी हो सकती है, लेकिन वह अपनी होनी चाहिए। मैं अक्सर मधुमक्खियों का उदाहरण देती हूँ। एक मधुमक्खी अकेली कमजोर लग सकती है, लेकिन जब पूरा समूह एकजुट होता है तो उसकी शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। इसी प्रकार समाज की असली ताकत उसकी एकता और संगठन में होती है। यदि हम एक-दूसरे का साथ दें, अपनी संस्कृति और मूल्यों को बचाए रखें तथा सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ें, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है।







