जमशेदपुर: जमशेदपुर में त्योहारों की गहमागहमी शांत होते ही प्रशासनिक गलियारों में जनसमस्याओं की गूंज फिर सुनाई देने लगी है. एक तरफ जहां पूर्वी सिंहभूम जिला प्रशासन दुर्गा पूजा के शांतिपूर्ण और सफल समापन पर अपनी पीठ थपथपा रहा है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक संगठन इस माहौल का इस्तेमाल शहर के अनसुलझे मुद्दों को शीर्ष अधिकारियों की मेज तक पहुंचाने में कर रहे हैं. ताजा मामला उपायुक्त कार्यालय से जुड़ा है, जहां शहर की जानी मानी समाज सेवी ‘राष्ट्रीय भ्रष्टाचार नियंत्रण एवं जन कल्याण संगठन’ की प्रदेश वर्गीय निदेशक और केंद्रीय दुर्गा पूजा समिति की सक्रिय सदस्य रानी गुप्ता के नेतृत्व में महिलाओं का एक प्रतिनिधिमंडल डीसी राजीव रंजन से औपचारिक मुलाकात करने पहुंचा. दिखने को तो यह मुलाकात दुर्गा पूजा में बेहतर व्यवस्था और शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिला प्रशासन को अंग वस्त्र और स्मृति चिह्न भेंट कर आभार जताने का शिष्टाचार दौरा था, लेकिन फूलों और सम्मान के पीछे असल मकसद इलाके की एक पुरानी और गंभीर समस्या पर प्रशासन की नकेल कसना निकला. (नीचे भी पढ़ें)

सम्मान के पीछे 6 साल पुराना दर्द : आभार प्रकट करने की रस्म अदायगी के तुरंत बाद रानी गुप्ता ने सिदगोड़ा स्थित शिवसिंह बागान का वह कच्चा-चिट्ठा डीसी के सामने रख दिया, जो पिछले छह वर्षों से बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहा है. उन्होंने प्रशासन का ध्यान सहदेव साहू के परिवार पर खींचा, जो घर खरीदने के बावजूद सालों से बिजली और पानी जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए तरस रहे हैं. रानी गुप्ता ने उपायुक्त को अवगत कराया कि संस्था के दखल और विद्युत विभाग (जेबीवीएनएल) के अधिकारियों से समन्वय के बाद बिजली कनेक्शन तो जैसे-तैसे चालू करा दिया गया, मगर अब जलापूर्ति को लेकर नया पेच फंस गया है. आरोप है कि जिस पक्ष से घर खरीदा गया, वह अब पानी का कनेक्शन देने में आनाकानी और टालमटोल कर रहा है, जिसके चलते परिवार बूंद-बूंद पानी के लिए मोहताज है.
डीसी ने दिया समाधान का भरोसा : प्रशासनिक अमले की तारीफों के बीच अचानक सामने आई इस बुनियादी समस्या को उपायुक्त ने गंभीरता से सुना और मामले की जांच कराकर शीघ्र समाधान का आश्वासन दिया. इस प्रतिनिधिमंडल में मुख्य रूप से संध्या देवी, तारा देवी, गौरी देवी सहित कई स्थानीय महिलाएं शामिल थीं. शहर में अब यह चर्चा आम है कि औपचारिक सम्मान समारोहों के बहाने ही सही, अगर दबी हुई जनसमस्याएं सीधे जिले के आला अधिकारियों तक पहुंच जाएं, तो इसे सामाजिक दबाव बनाने की एक कारगर रणनीति ही माना जाएगा.












