जमशेदपुर : झारखंड के बोड़ाम प्रखंड के अंतगर्त, एक छोटे से गांव बोंगई से निकलकर लंदन की सर्वोत्तम और वैश्विक स्तर पर दूसरे स्थान पर प्रतिष्ठित विश्विवद्यालय इंपेरियल कॉलेज लंदन तक पहुंचने वाले शांतनु मोदक की कहानी सफर् सफलता की नहीं, बिल्क अटूट संकल्प, संघर्ष और सपनों की है. एक साधारण किसान निर्मल मोदक के बेटे, शांतनु का बचपन साधारण आर्थिक परिस्थितयों और सीमित संसाधनों में बीता, फिर भी पिता ने पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी. शांतनु ने बचपन से ही समझ लिया था कि शिक्षा ही जीवन बदलने का रास्ता है. आज लंदन के दो प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से बुलावा पाने वाले चुनिंदा भारतीय छात्रों में शमिल हैं पर यह सफर एक कामयाबी की खबर नहीं है, यह एक ऐसे सपने की कहानी है जिसे गरीबी, असफलताएं और सीमाएं भी नहीं तोड़ सकीं. वे हमेशा कक्षा के श्रेष्ठ छात्रों में रहे और वर्ष 2008 मैट्रिक में उत्कृष्ट प्रदशर्न कर परिवार व गाँव का नाम रोशन किया. आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें जमशेदपुर भेजा गया, जो परिवार के लिए एक बड़ा फैसला था. आगे चलकर शान्तोनु ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बी.टेक और एनआईटी दुगार्पुर से एमटेक किया. उनका सपना वैज्ञानिक बनने का था. (नीचे भी पढ़े)

उन्होंने बीएआरसी और इसरो जैसी बड़ी संस्थाओं की साइंटिस्ट परीक्षाएं भी पास कीं, लेकिन अंतिम चयन न हो पाने के बावजूद कभी हार नहीं मानी. वे एनआईटी इलाहाबाद में मेकेनिकल डिपार्टमेंट फेकल्टी बने, और फिर अनएकाडेमी जैसे राष्ट्रीय मंच पर टॉप एजुकेटर के रूप गेट और आईईएस परीक्षा के लिए हज़ारों छात्रों को पढ़ाया. इसके बाद उन्होंने कई इंजीनियिरंग कॉलेजों में भी फैकल्टी के तौर पर काम किया, लेकन मन में अब भी एक बड़ा सपना पल रहा था वैश्विक स्तर पर खुद को साबित करने का. इस वर्ष शांतनु का सपना पूरा हुआ. जब उन्हें इंपेरियल कॉलेज लंदन और वारविक बिजनेस स्कूल में बीज़नेस एनालिटक्स कायर्क्रम के लिए प्रवेश का ऑफ़र मिला. उन्होंने वारविक बिजनेस स्कूल से बिज़नेस एनालिटक्स की पढ़ाई करने का निर्णय लिया. इसी दौरान उन्होंने राज्य की सबसे प्रतिष्ठित ‘ओवरसीज़ स्कॉलरिशप’ भी प्राप्त की, जिसके तहत झारखंड सरकार ने 1 करोड़ रुपए की राशि प्रदान की. यह उनके सभी विदेश में पढ़ाई के खर्चा को कवर करती है. पूरे राज्य से हर वर्ष ओबीसी से केवल 6 छात्रों को इस योजना के तहत चुना जाता है, और शांतनु उन चुनिंदा प्रतिभाओं में से एक हैं. इस 8 सितंबर शान्तोनु लंदन रवाना होंगे, लेकिन उनकी कहानी झारखंड के युवाओं के लिए प्रेरणा बनेगी. वे कहते हैं मैंने हालात को बहाना नहीं बनने दिया, बल्कि आत्मिवश्वास की सीढ़ी बनाया.



