रांची : झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन किसी भी वक्त मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे सकते है. उन्हें बरहेट विधानसभा से चुने जाने को अवैध करार देते हुए उनकी विधायकी को रद्द करने की सिफारिश कर दी गयी है. राजभवन के सूत्रों के मुताबिक उन्हें दोहरे लाभ के पद को लेकर चुनाव आयोग द्वारा भेजे गए सीलबंद लिफाफे के आलोक में राज्यपाल ने देश के सॉलिसिटर जेनरल तुषार मेहता से बातचीत करने के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरे की विधायकी रद्द करने की सिफारिश चुनाव आयोग को वापस भेज दी है. बताया जाता है कि राज्यपाल ने झारखंड के मुख्य निर्वाची पदाधिकारी के साथ भी बातचीत की है और आयोग के सार न्यायिक जानकारों से बातचीत करने बाद चुनाव आयोग को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सदस्यता को रद्द करने की सिफारिश कर दी है. हालांकि, राजभवन की ओर से इसकी अधिकारिक पुष्टि नहीं की गयी है. वहीं दूसरी ओर शनिवार को भी यूपीए की मुख्यमंत्री आवास पर बैठक हो रही है. सूत्र बताते है कि यूपीए में शामिल कांग्रेस, झामुमो समेत सभी दलों के नेताओं को पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ शिफ्ट करने पर निर्णय लिया गया है. इसके लिए दो-तीन लग्जरी बसों को मंगवाया गया है, ताकि रांची से छत्तीसगढ़ तक का सफर करने में विधायकों को किसी तरह की परेशानी न हो. बैठक में सभी मंत्री विधायक बैग के साथ पहुंचे है. (नीचे भी पढ़ें)
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु समेत अन्य दो सदस्यओं की भी चुकी है सदस्यता रद्द-
झारखंड के मुख्यमंत्री ही पहले सदस्यता रद्द करने वालों में से नहीं है. इस कतार में अन्य कई नेता शामिल है. इसमें झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और जया बच्चन भी शामिल है. 2001 का मामला है जब झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के वरिष्ठ नेता और वर्तमान अध्यक्ष शिबू सोरेन की पर भी आरोप था कि वे राज्यसभा के नामांकन के दौरान लाभ के पद पर होने की बात छुपाई थी. उस वक्त वे झारखंड क्षेत्र स्वायत्त परिषद के अध्यक्ष थे. यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को रद्द करने का आदेश दिया. (नीचे भी पढ़ें)
सोनिया गांधी और जया बच्चन भी शामिल-
कांग्रेसी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी अपनी सदस्यता गवा चुकी है. मामला 2006 का है. जब उन्हें रायबरेली से अपनी लोकसभी की सदस्यता से इस्तीफा देना पड़ा था. वहीं रायबरली से लोकसभी की सांसद के साथ यूपीए सरकार के समय गठित राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की चेयरमैन भी थी. जिसे भारत निर्वाचन आयोग ने लाभ का पद करार दिया गया था. इससे जुड़ा तीसरा मामला 2006 में राज्यसभा सांसद जया बच्चन की है. उन्हें भी राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देना पड़ा था. उन पर आरोप था कि वह सांसद के साथ-साथ ‘उत्तर प्रदेश फिल्म विकास निगम’ की चेयरमैन की जिम्मेदारी भी संभाल रही हैं. उन्होंने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गयी, जिसके बाद उन्हें वहां से भी राहत नहीं मिली. (नीचे भी पढ़ें)
क्या होता है ‘लाभ का पद’-
लाभ का पद उसे कहते हैं जब कोई व्यक्ति सरकार की ओर से किसी भी तरह की सुविधा या लाभ उठा रहा हो. ऐसे करते हुए वह सदन का सदस्य नहीं रह सकता है. मतलब एक साथ जगह का लाभ नहीं ले सकता है. ऐसे में उस शख्स को किसी एक पद को छोड़ना पड़ता है.
इन वजहों से प्रतिनिधि हो सकते हैं अयोग्य-
चुनाव से जुड़े अपराध और भ्रष्टाचार के दोषी करार दिए जाने पर अयोग्य घोषित किए जा सकते हैं.
किसी भी अपराध में दोषी करार दिए जाने और दो साल की जेल की सजा मिलने पर अयोग्य हो जाएंगे.
भ्रष्टाचार या राष्ट्रद्रोह के मामले में अयोग्य हो जाएंगे.
किसी सरकारी कंपनी से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लाभ लेने पर अयोग्य घोषित किए जा सकते हैं.
सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने, छुआछूत, दहेज सरीखे सामाजिक अपराध साबित होने पर भी इस्तीफा देना पड़ सकता है. (नीचे भी पढ़ें)
यूपीए सरकार लाई थी कानून-
यूपीए-1 सरकार को कार्यकाल में लोकसभा में लाभ के पद की व्याख्या के लिए एक बिल पास किया था. 16 मई 2006 को पास किए गए इस बिल में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद समेत 45 पदों को लाभ के पद के दायरे से बाहर रखा गया था.













