
चाईबासा : मुंह में पान और हंसमुख चेहरे वाले 55 वर्षीय मुन्ना पोद्दार जैसे युग पुरुष यदा कदा जन्म लेते हैं। अब गरीबों का सहारा, बेकसो का भाई, समाज का मुख्य स्तंभ मुन्ना पोद्दार नहीं रहा। जैसे ही मुन्ना पोद्दार के निधन की खबर आईं लोग बेतहाशा उनके घर की ओर दौड़ पड़े। दिन भर लोग उनके निधन की खबर की पुष्टि करते रहे। जिसने उनकी मौत की खबर सुनी उसके मुंह से चीख निकाल गई। बतहाशा बोल उठे युग पुरुष का अंत हो गया! हम उनकी सेवा को नहीं भूल सकते। मुन्ना पोद्दार एक ऐसे व्यक्तित्व का नाम है, जिसने बचपन से संघर्ष कर एक ऊंचा मुकाम हासिल किया था। वे क्षेत्र के हर समाज, तबके, जाति-धर्म के सर्वमान्य व्यक्तित्व थे। जिनकी बात क्षेत्र के लोगों के लिए पत्थर की लकीर बन जाती थी। उनके निधन से क्षेत्र को अपूरणीय क्षति हुई है। मुन्ना पोद्दार की हैसियत क्षेत्र में गरीबों के रॉबिन हुड की थी। मुन्ना गरीबों के मसीहा और बेसहरों के सहारा थे। सबों के दुख-तकलीफ में खड़े होना, हर समस्या का समाधान चुटकियों मे निकालना, क्षेत्र के लोगों को मोतियों को माला की तरह पिरोकर एक रखना, सामाजिक समरसता व एकता बनाए रखने में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है. क्षेत्र की समस्याओं की नि:स्वार्थ भाव से तन-मन-धन से निदान करना उनकी फितरत थी। मुन्ना जैंतगढ़ को अलग प्रखंड बनाने और थाना बनाने के लिए लंबे आंदोलन के अगुवा रहे। वे नव निर्माण संघर्ष समिति के अध्यक्ष, समाज सुधार समिति के अध्यक्ष के पद पर आसीन थे। मुन्ना पोद्दार विगत एक वर्ष से किडनी की समस्या से जूझ रहे थे। उनका इलाज भुवनेश्वर के एक निजी अस्पताल में चल रहा था। विगत एक सप्ताह से वे वेंटिलेटर पर थे। शुक्रवार को 12:30 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। वह अपने पीछे एक पत्नी, एक पुत्र और दो बेटियों को छोड़ गये हैं।





