सुनील अग्रवाल : झारखंड प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन के चुनाव की प्रक्रिया अभी जारी है. मतदान में हुई गड़बड़ियों को लेकर धनबाद केंद्र का मतदान रद्द कर दिया गया है एवं वहां पुनर्मतदान की तैयारी चल रही है. उसके बाद ही मतगणना होगी जिसका परिणाम तय करेगा कि नये अध्यक्ष के रूप में संगठन की कमान किसके हाथ में होगी, मारवाड़ी समाज की सेवा का दायित्व किसे मिलेगा. लेकिन संगठन के प्रांतीय चुनाव को लेकर सोशल मीडिया में जो जुबानी जंग छिड़ी है, उसका परिणाम कब और किस रूप में सामने आयेगा, इसका अंदाजा ही लगाया जा सकता है. इस जुबानी-मारकाट से इसमें संलिप्त लोगों की या संगठन अथवा पूरे मारवाड़ी समाज की कैसी छवि बने-बिगड़ेगी, यह सहज ही समझा जा सकता है. समाज की सेवा के लिए आगे बढ़े दो प्रत्याशियों की चुनावी टक्कर का नतीजा तो आगामी 27 अप्रैल को धनबाद केंद्र पर पुनर्मतदान एवं फिर मतगणना के साथ ही सामने आ जाएगा, किन्तु इसको लेकर समाज के नाम से बने व्हाट्सएप्प ग्रुप व अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर चल रही उखाड़-पछाड़ के कुपरिणाम ऐसे लोगों के साथ ही पूरे मारवाड़ी समाज को बरसों तक परेशान करते रहेंगे, इसमें कोई शक नहीं. यह विवाद और उसकी सनक में जारी उठापटक पूरे समाज को किस ओर ले जाएगी, इस पर विचार किया जाना आज जरूरी है, ऐसी प्रवृत्ति पर कैसे रोक लगे आज यह सोचने की भी जरूरत है.(नीचे भी पढ़ें)
किसी भी समाज के दो लोगों या गुटों में मतभेद स्वाभाविक है, इसके कई फायदे भी हैं, लेकिन मतभेदों को लेकर मनभेद शुरू होने और उसकी रौ में दो व्यक्तियों या गुटों में एक-दूसरे को पारिवारिक-सामाजिक स्तर पर हानि पहुंचाने की मानसिकता किसी भी संगठन या समाज के लिए लाभकारी नहीं हो सकता. मारवाड़ी समाज के पूर्ववर्ती सम्मानित लोगों ने समाज के सामूहिक उत्थान के लक्ष्य को लेकर विभिन्न संगठन बनाये, लेकिन उसकी पूर्ति संगठन हित में सदस्यों की एकजुटता से संभव है, न कि संगठन के भीतर आपस में गाली-गलौज और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति से, यह सभी को समझना होगा.(नीचे भी पढ़ें)
एक बात और, संगठन के अंदर उत्पन्न वर्तमान हालात में समाज की चुप्पी भी कम खलनेवाली नहीं. प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन चुनाव को लेकर विगत कुछ दिनों से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर जो जुबानी जंग जारी है, समाज के प्रभावशाली लोग अपने प्रभाव का प्रयोग कर उसे रोकने की कोशिश कर सकते हैं, उन्हें ऐसा करना भी चाहिए. किसी समाज में बुजुर्गों का यह दायित्व भी है. हालांकि स्वच्छंदता और सामाजिक विशृंखलता के वर्तमान दौर में यह बहुत आसान काम नहीं, किन्तु किसी न किसी को तो सामने आना ही होगा. समाज के प्रभावशाली व्यक्तियों का ऐसी प्रवृत्तियों पर रोक लगाने के लिए स्वयं आगे बढ़कर प्रयास करना जरूरी है, अन्यथा इसके दुष्परिणाम पूरे समाज को भुगतने होंगे, इसमें कोई शक नहीं.



