नयी दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने का अंतरिम आदेश जारी करने से इनकार किया है. ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने को लेकर दायर याचिका की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सोमवार को चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया. पीठ ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य दोनों चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी करते हुए जवाब देने को कहा है. याचिका में चुनाव आयोग के उन फैसलों को चुनौती दी गई है कि जो कथित तौर पर एकतरफा और दो चुनाव आयुक्तों की असहमति के बाद लिया गया था.विदित हो कि मुख्य चुनाव आयुक्त पर कार्रवाई की मांग को लेकर दिल्ली-मुंबई समेत देश भर में प्रदर्शन हो रहे हैं. कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास ने एक बयान जारी कर कहा है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्याकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची ही वो न्यायाधीश हैं, जिन्होंने बंगाल और बिहार में अवैध एसआईआर प्रक्रिया को बिना किसी अड़चन के आगे बढ़ने दिया, उन्हें अब इस मामले की सुनवाई से चुपचाप अलग हो जाना चाहिए.भले ही वे कुछ करने का फैसला करें, वे करते रह सकते हैं. किसी को परवाह नहीं. सुप्रीम कोर्ट जेन-जी के मतदान अधिकार और राज्य में हुए चुनावों को छीनने में शामिल रहा है.सौरव दास ने बयान में कहा है कि महत्वपूर्ण याचिकाओं को समय पर न सुनकर और उन पर फैसला न देकर, जैसे महाराष्ट्र सरकार का गिरना, पार्टियों का टूटना, दिल्ली का संवैधानिक संकट मामला, इससे भाजपा को लाभ हुआ है. (नीचे भी पढ़े)
यह हमारी न्यायपालिका पर एक बड़ा रंग है.इसलिए सुप्रीम कोर्ट की बेंच जो चाहे कर सकती है, लेकिन लोगों की नज़र में इसकी विश्वसनीयता बिल्कुल शून्य रहेगी. जवाबदेही भारत के लोगों, युवा पीढ़ी द्वारा तय की जाएगी. कोर्ट कल या जब चाहे, जो चाहे कर सकता है.इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस नरीमन ने अपने एक वक्तव्य में कहा कि उनको इस बात का अफसोस है कि बंगाल में 90 लाख वोटरों के नाम हटाए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर प्रोसेस पर रोक नहीं लगाई.जस्टिस नरीमन कहा- पश्चिम बंगाल चुनावों में 90 लाख वोटरों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया, यह एक चौंकाने वाला आंकड़ा है. 90 लाख वोटरों का अधिकार छिन जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया. जिन लोगों का अधिकार छीना गया, उनमें से लगभग 22 लाख वोटरों ने अपील की. बाकी लोग शायद वे थे जिनके पास न्याय पाने के लिए जरूरी साधन नहीं थे.और इन 22 लाख वोटरों में से, लगभग 1 लाख वोटरों की अपीलों में से 93 फीसदी फ़ैसले वोटरों के पक्ष में आए. तो, आप सोच सकते हैं कि यह आम आदमी, यानी भारत के नागरिक को पूरी तरह से ग़ैर-कानूनी तरीके से बाहर करने जैसा था, ताकि सरकार अपनी मनचाही चीज हासिल कर सके. और पश्चिम बंगाल में हमने देखा कि इसने मौजूदा सरकार को हटा दिया और केंद्र की सरकार को सत्ता में ले आई. अब, ये बहुत ही चिंताजनक बातें हैं जो आज हमारे देश में हो रही हैं.







