जमशेदपुर : झारखंड उच्च न्यायालय के न्यायाधीश गौतम चौधरी की बेंच में इंकैब (केबुल कंपनी) के कर्मचारियों के प्रतिनिधि भगवती सिंह द्वारा एडजुटिकेटिंग अथॉरिटी, एनसीएलटी, कोलकाता द्वारा अपने 7 फरवरी 2020 के आदेश द्वारा इंकैब की जमीन को टाटा स्टील की लीज करार देने के खिलाफ दायर रिव्यू पेटिशन की सुनवाई हुई. कर्मचारियों के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि टाटा स्टील ने इंकैब को एक पत्र के माध्यम से पहली बार यह दावा किया कि इंकैब की जमशेदपुर की 177 एकड़ जमीन टाटा स्टील की सबलीज है, जो 1920 से 1924 के एक डीड द्वारा दी गयी थी. 99 वर्ष 2019 में समाप्त हो गया. अतः इंकैब टाटा स्टील की तथाकथित जमीन वापस कर दे. टाटा स्टील की इस चिठ्ठी से यह स्पष्ट था कि एक तो टाटा स्टील दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा 6 जनवरी 2016 में दिये गये आदेश और उच्चतम न्यायालय द्वारा 01 जुलाई 2016 को दिये गये आदेश को दरकिनार कर इंकैब का अधिग्रहण करने से मुकर गयी थी जबकि टाटा स्टील खुद ही बायफर में बीडर बनी और अब गैरकानूनी तरीके से इंकैब की 177 एकड़ जमीन हड़पने की गैरवाजिब कोशिश कर रही है. (नीचे देखे पूरी खबर)

टाटा स्टील इंकैब के पुनर्रूद्धार में बाधा न डाले, इसके लिए भगवती सिंह ने एडजुटिकेटिंग अथॉरिटी, एनसीएलटी, कोलकाता में एक आवेदन देकर यह प्रार्थना की कि वे झारखंड सरकार को रिजोल्यूशन प्रक्रिया में अभियोग चलाकर उससे इंकैब की जमीन की कानूनी स्थिति के बारे में बताने के लिए हलफनामा दायर करने को कहा जाये. अधिवक्ता ने बताया कि उनके इस आवेदन का टाटा स्टील ने यह कहते हुए प्रतिवाद किया कि एडजुटिकेटिंग अथॉरिटी, एनसीएलटी, कोलकाता का यह क्षेत्राधिकार नहीं है कि वह जमीन की विवाद का निर्णय करे. अधिवक्ता अखिलेश ने अदालत का ध्यानाकर्षण कराते हुए बताया कि एडजुटिकेटिंग अथॉरिटी, एनसीएलटी, कोलकाता ने अपने आदेश के पारा 7 में टाटा स्टील की उपरोक्त दलील स्वीकारते हुए कहा कि जमीन का मामला उनके क्षेत्राधिकार में नहीं है, अतः वे झारखंड सरकार को कोई हलफनामा दायर करने के लिए भी नहीं कहेंगे लेकिन पारा 8 से 11 के बीच पारा 7 के अपने ही आदेश का उल्लंघन करते हुए इंकैब की 177 एकड़ जमीन को टाटा स्टील का लीज घोषित कर दिया जो गैरकानूनी है. अधिवक्ता अखिलेश ने अदालत को आगे बताया कि एपीलेट अधॉरिटी, एनसीएलएटी, दिल्ली ने 07 फरवरी 2020 के एडजुटिकेटिंग अथॉरिटी, एनसीएलटी, कोलकाता आदेश को निरस्त कर दिया है पर इंकैब के 177 एकड़ जमीन को टाटा स्टील का लीज घोषित करने के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं की है. (नीचे देखे पूरी खबर)

अधिवक्ता ने अदालत को आगे बताया कि टाटा स्टील इसका फायदा उठाना चाहती है और इसलिए रिजोल्यूशन प्रोफेशनल ने फर्जीवाड़ा करते हुए एडजुटिकेटिंग अथॉरिटी, एनसीएलटी, कोलकाता के पास एक आवेदन दायर किया है जिसमें प्रार्थना की है कि एडजुटिकेटिंग अथॉरिटी, एनसीएलटी, कोलकाता टाटा स्टील को यह निर्देश दे कि वह लीज को विस्तार दे ताकि इंकैब का पुनर्रूद्धार हो सके. अधिवक्ता अखिलेश ने अदालत को बताया कि यह टाटा स्टील और रिजोल्यूशन प्रोफेशनल पंकज टिबरेवाल द्वारा षड्यंत्र कर किया जाने वाला फ्रॉड है ताकि टाटा स्टील उस जमीन को गैरकानूनी तरीके से कब्जा कर ले. अधिवक्ता अखिलेश ने अदालत को आगे बताया कि टाटा स्टील को 18 अक्टूबर 1919 को 15725 एकड़ जमीन सरकारी अनुदान गवर्नमेंट ग्रांट एक्ट, 1895 के तहत मैनुफैक्चरिंग प्लांट बनाने के लिए दी गयी थी जिस जमीन का इस्तेमाल सिर्फ मैनुफैक्चरिंग या सार्वजनिक हित के लिए किया जा सकता था. टाटा स्टील ने सिर्फ 1861 एकड़ जमीन का इस्तेमाल किया, अतः लगभग 12000 से अधिक जमीन उसके मूल मालिकों यानि आदिवासियों के पास कानूनी तौर पर निहित हो गया. सरकार और टाटा स्टील को वे सारे जमीन उसके मूल मालिकों को वापस करना चाहिए था पर टाटा स्टील ने उसे सबलीज कर आदिवासियों के जमीन की सबलीज से होने वाली आय को अपनी गैरकानूनी कमाई का श्रोत बना लिया और सालों से जमीन का यह गैरकानूनी धंधा कर रही है. अधिवक्ता अखिलेश ने आगे बताया कि जब टाटा और बिहार सरकार का जमीन का यह विवाद उच्चतम न्यायालय पहुंचा तब टाटा और बिहार सरकार के बीच एक अनैतिक और गैरकानूनी समझौता हो गया और उच्चतम न्यायालय से वह पीटिशन वापस ले लिया गया. बिहार सरकार ने उसके बाद यह गैरकानूनी दावा किया कि संशोधित बिहार लैंड रिफार्म्स एक्ट, 1950 की धारा 7डी और 7इ के तहत टाटा स्टील को ग्रांट में दी गयी जमीन का बिहार सरकार द्वारा अधिग्रहण कर लिया है और 1983 में उस जमीन को टाटा स्टील को वापस लीज में दे दिया गया जबकि गवर्नमेंट ग्रांट एक्ट की धारा 2 के अनुसार ग्रांट को लीज में बदला ही नहीं जा सकता है. अधिवक्ता ने उच्च न्यायालय को यह भी बताया कि टाटा स्टील ने एडजुटिकेटिंग अथॉरिटी, एनसीएलटी, कोलकाता में दायर अपने हलफनामे में यह का है कि उसे यह डिम्ड लीज 1983 में बिहार सरकार से मिली. अधिवक्ता ने आगे बताया कि भारत में डिम्ड लीज का कोई कानून नहीं है और अगर टाटा स्टील के इस फर्जी दावे को मान भी लें तो टाटा स्टील ने इंकैब को 1920 में सबलीज कैसे कर दिया जबकि उसे डिम्ड लीज 1983 में मिली ? अधिवक्ता अखिलेश ने अपने उन तर्कों के आधार पर एडजुटिकेटिंग अथॉरिटी, एनसीएलटी, कोलकाता के 07 फरवरी 2020 के आदेश में इंकैब की जमीन पर दिये गये फैसले को निरस्त करने की मांग की. अदालत ने उसके बाद टाटा स्टील और रिजोल्यूशन प्रोफेशनल पंकज टिबरेवाल के अधिवक्ताओं को सुनने के बाद उन्हें हलफनामा दायर करने की इजाजत दे दी. अगली सुनवाई 09 दिसंबर को होगीय. मजदूरों की तरफ से अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव, रोहित सिंहा और निर्मल घोष ने हिस्सा लिया.












