
रांची : केंद्रीय कैबिनेट के द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची तैयार करने का जिम्मा एक बार फिर राज्य सरकारों को सौंपने का निर्णय लिया गया है. केंद्रीय कैबिनेट के द्वारा इससे संबंधित संशोधन विधेयक पर सहमति भी बन गयी है. संसद के चलते मानसून सत्र में इस विधेयक को सदन में लाया भी जाय. देशभर में चल रहे जातिगत जनगणना को देखते हुए इसे मोदी सरकार का मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है.इसके बाद से झारखंड में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) जातियों का आरक्षण बढ़ाने और जातिगत जनगणना कराने को लेकर राजनीतिक सरगर्मी एकाएक बढ़ गई है. आलम यह है कि झारखंड की सभी छोटी बड़ी पार्टियां इस मामले में कूद पड़ी है. खुद को ओबीसी जातियों का मसीहा साबित करने में हर दल दूसरे से बाजी मारने की जुगत में जुट गया है. हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के सभी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और राजद तो इसे जोर-शोर से उठा ही रहे हैं, भाजपा और सहयोगी आजसू भी इस संवेदनशील मसले पर खुद को पिछड़ने नहीं देना चाह रहे. झामुमो, कांग्रेस, आजसू सहित अन्य कुछ दलों ने जातिगत मतगणना के लिए भी दबाव बनाना शुरू कर दिया है.राजनीतिक दलों को जातियों का अंकगणित हमेशा लुभाता रहा है. इसके पीछे मुख्य वजह समय-समय पर विभिन्न जातीय समूहों के बड़े वोट बैंक को लुभाना भी रहा है. झारखंड में अगर हम आरक्षण के प्रतिशत की बात करें तो अन्य पिछड़ी जातियों की जनसंख्या सबसे ज्यादा रहने के बावजूद इसे अन्य राज्यों की तुलना में कम आरक्षण मिल रहा है. झारखंड में ओबीसी का आरक्षण 14 प्रतिशत है, जो बिहार समेत अन्य पड़ोसी राज्यों की तुलना में कम है.जबकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को उनके जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण का प्रतिशत तय किया गया है. झारखंड में अनुसूचित जनजाति की आबादी 26 प्रतिशत है और उन्हें आरक्षण भी 26 प्रतिशत मिल रहा है. इसी तरह अनुसूचित जाति की जनसंख्या 10 प्रतिशत है और आरक्षण का प्रतिशत भी 10 है. लेकिन अन्य पिछड़ी जाति को जनसंख्या के हिसाब से लाभ नहीं मिल रहा है.अलग राज्य बनने के बाद जब प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की सरकार ने आरक्षण का प्रतिशत तय किया तो उस समय भी उनकी सरकार में मंत्री रहे लालचंद महतो, मधु सिंह, रामचंद्र केसरी, जलेश्वर महतो ने अन्य पिछड़ी जाति को जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण नहीं देने का मामला बुलंद आवाज में उठाया था. हालांकि, बाबूलाल मरांडी की सरकार ने जनसंख्या के हिसाब से अन्य पिछड़ी जाति के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण तय किया था लेकिन हाई कोर्ट में यह टिक नहीं पाया.अन्य पिछड़ी जाति को 27 प्रतिशत आरक्षण की मांग बहुत पुरानी है. वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में भी इस मांग को उभार कर सभी राजनीतिक दलों ने मतदाताओं को लुभाने का भरसक प्रयास किया था. लिहाजा अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि सरकार इस वादे को पूरा करने की दिशा में प्रक्रिया को आगे बढ़ाए. दिलचस्प बात यह है कि सत्तारूढ़ गठबंधन के अहम सहयोगी दल कांग्रेस ने ही इस मुद्दे को हवा दी है, जिसे देखते हुए अन्य राजनीतिक दलों ने भी सुर में सुर मिलाना आरंभ कर दिया है.ओबीसी संगठनों ने आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाने की मांग को लेकर सरकार के साथ-साथ राजभवन का दरवाजा खटखटाना आरंभ कर दिया है. आने वाले दिनों में ऐसे समूह और मुखर होकर सामने आ सकते हैं. ओबीसी जातियों को चिन्हित करने का मसला भी इसकी एक कड़ी है. केंद्र सरकार ने अब इसका जिम्मा राज्यों पर डालने का निर्णय किया है. इससे भी राज्य सरकारों की जिम्मेदारी बढ़ेगी. पहले केंद्र के पाले में गेंद डालकर राज्य सरकारें बच जाती थीं, लेकिन अब ऐसा नहीं हो पाएगा. गठबंधन सरकार को यह बखूबी पता है कि ओबीसी समुदाय को रिझाने की कवायद में इस मुद्दे को सुलझाने में जरा से भी चूक हो गई तो इसका बड़ा राजनीतिक खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है. इसकी पूरी संभावना है कि विधानसभा के मानसून सत्र में भी यह मुद्दा जोर-शोर से उठेगा.






