जमशेदपुर: सर दोराबजी टाटा का जन्मदिवस आज है. यह दिन सिर्फ टाटा समूह ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के औद्योगिक इतिहास के लिए गर्व का क्षण है. सर दोराबजी टाटा को वह शख्स माना जाता है, जिन्होंने अपने पिता जमशेदजी नसरवानजी टाटा के सपनों को साकार कर टाटा स्टील की नींव को मजबूती दी. जमशेदजी टाटा ने स्टील प्लांट की कल्पना की थी, लेकिन इसे वास्तविकता में बदलने का श्रेय उनके बड़े बेटे सर दोराबजी को ही जाता है. उनके संकल्प और त्याग की वजह से आज टाटा स्टील 118 वर्षों से निरंतर स्टील उत्पादन कर रही है और देश की सबसे पुरानी कंपनी बनी हुई है.(नीचे भी पढ़े)

27 अगस्त, 1859 को जन्मे सर दोराबजी टाटा ने इंग्लैंड से शिक्षा प्राप्त की और करियर की शुरुआत पत्रकारिता से की. वे बॉम्बे गजट में कुछ समय तक पत्रकार रहे. इसके बाद उन्होंने पिता के अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प लिया. 1907 में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी की स्थापना के साथ उनका औद्योगिक सफर शुरू हुआ. 25 वर्षों तक चेयरमैन पद संभालते हुए उन्होंने उद्योग को मजबूती देने के लिए अथक प्रयास किये. दोराबजी टाटा सिर्फ एक उद्योगपति नहीं, बल्कि श्रमिकों के हितैषी भी थे. वे हमेशा जेएन टाटा द्वारा स्थापित कर्मचारी कल्याण की परंपरा को आगे बढ़ाते रहे. 1920 की हड़ताल के समय वे जमशेदपुर पहुंचे, श्रमिकों से संवाद किया और विवाद का शांतिपूर्ण समाधान कराया. श्रमिक कल्याण योजनाओं को लागू करने में उनका योगदान यादगार रहा. (नीचे भी पढ़े)

1932 में पहले संस्थापक दिवस पर उन्होंने श्रमिकों के कल्याण के लिए 25,000 रुपये दान दिये. दोराबजी का योगदान सिर्फ उद्योग जगत तक सीमित नहीं था. खेलों में भी उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है. कैम्ब्रिज में पढ़ाई के दौरान वे टेनिस, फुटबॉल और क्रिकेट में निपुण रहे. वह अच्छे घुड़सवार भी थे. युवावस्था में उन्होंने मात्र नौ घंटे में बॉम्बे से पुणे तक घुड़सवारी कर यह सिद्ध कर दिया था. 1920 के एंटवर्प ओलंपिक में उन्होंने अपनी निजी पूंजी से चार एथलीटों और दो पहलवानों को भेजा. यह वह दौर था जब भारत में कोई आधिकारिक ओलंपिक समिति भी अस्तित्व में नहीं थी. 1924 के पेरिस ओलंपिक में भारत की भागीदारी सुनिश्चित करायी और स्वयं अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के सदस्य बने. 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक में भारत ने हॉकी में पहला स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा. 1920 के दशक में जब टाटा स्टील गहरे आर्थिक संकट में फंस गयी थी, उस समय सर दोराबजी ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया. उन्होंने अपनी निजी संपत्ति गिरवी रख दी और पत्नी के गहने तक बेच दिये ताकि कर्मचारियों का वेतन दिया जा सके और कंपनी चलती रहे. यह त्याग आज भी टाटा समूह की नींव में गहराई से महसूस किया जाता है. (नीचे भी पढ़े)

सर दोराबजी का परोपकार व्यापक और दूरगामी था. उन्होंने जरूरतमंदों की सहायता के लिए तीन करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की संपत्ति ट्रस्ट को दान की. इस ट्रस्ट के माध्यम से टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़, टाटा मेमोरियल सेंटर और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फ़ंडामेंटल रिसर्च जैसे प्रतिष्ठित संस्थान स्थापित हुए. ये संस्थान आज भी अनगिनत जीवनों को दिशा और सहारा दे रहे हैं. 1910 में उन्हें ब्रिटिश सरकार की ओर से ‘नाइटहुड’ की उपाधि दी गयी. 3 जून, 1932 को उनका निधन हो गया, लेकिन वे पीछे ऐसी विरासत छोड़ गये जिसने भारत के औद्योगिक, सामाजिक और खेल इतिहास को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. इतिहास प्रायः उन्हीं व्यक्तित्वों को उजागर करता है जो मंच पर दिखाई देते हैं, जबकि निःस्वार्थ भाव से परदे के पीछे काम करने वाले समर्पित लोगों के प्रयास अनदेखे रह जाते हैं. इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण हैं सर दोराबजी टाटा—एक दूरदर्शी व्यक्तित्व, जिन्होंने अपने पिता के एक सशक्त और समृद्ध भारत के सपने को साकार करने के लिए निरंतर और निष्ठापूर्वक कार्य किया. सर दोराबजी एक सफल उद्योगपति ही नहीं, बल्कि गहन देशभक्ति से ओत-प्रोत व्यक्तित्व भी थे. (नीचे भी पढ़े)

उनका संकल्प एक आत्मनिर्भर भारत की स्थापना का था. इसी उद्देश्य से उन्होंने कठिन भूभाग छोटानागपुर में देश के पहले इस्पात संयंत्र की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने भारत की औद्योगिक प्रगति की नींव रखी. इसके साथ ही उन्होंने पश्चिमी घाट की दुर्गम पहाड़ियों में जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण का भी नेतृत्व किया, जिसने देश को ऊर्जा प्रदान की और राष्ट्र को आधुनिक विकास की राह पर आगे बढ़ाया. टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (आज की टाटा स्टील) की स्थापना में सर दोराबजी का नेतृत्व अत्यंत महत्वपूर्ण रहा. उनकी असाधारण दूरदर्शिता, दृढ़ संकल्प और मार्गदर्शन में कंपनी ने उल्लेखनीय प्रगति की. उनका ध्यान केवल इस्पात और ऊर्जा तक सीमित नहीं था, बल्कि वे गहरी सामाजिक संवेदनाओं से प्रेरित एक करुणामय व्यक्तित्व थे. उन्होंने अपने मज़दूरों के कल्याण को प्राथमिकता दी और अपने पिता के उस आदर्श को आगे बढ़ाया जिसमें न्यायपूर्ण व्यवहार और परस्पर सम्मान की संस्कृति को सबसे ऊपर रखा गया. सर दोराबजी भारत के प्राकृतिक संसाधनों के सदुपयोग के प्रति गहराई से समर्पित थे. उन्होंने अपने पिता की उस दूरदृष्टि पर अमल किया, जिसमें पश्चिमी घाट के जल को जलविद्युत उत्पादन के लिए प्रयोग करने की परिकल्पना की गई थी. इसी संकल्प से उन्होंने 1911 में टाटा पावर की स्थापना की, जिसने भारत की ऊर्जा व्यवस्था को बदल दिया और स्वच्छ ऊर्जा से संचालित भविष्य की नींव रखी. (नीचे भी पढ़े)
उन्होंने शिक्षा को राष्ट्रनिर्माण का आधार मानते हुए इस क्षेत्र में भी अपना अमूल्य योगदान दिया. 1909 में, अपने पिता जमशेदजी टाटा की दूरदृष्टि को साकार करने में सक्रिय सहयोग करते हुए, उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस की स्थापना में अहम भूमिका निभाई. यह संस्थान आज विज्ञान और नवाचार का वैश्विक केंद्र बन चुका है, जिसने भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान को नई ऊँचाइयों पर पहुंचाया. सर दोराबजी समाज को वापस लौटाने की भावना में गहराई से विश्वास रखते थे. इसी विचारधारा से, और अपने पिता की परोपकारी विरासत से प्रेरित होकर, उन्होंने सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट की स्थापना की. इसका उद्देश्य था संपत्ति का उपयोग समाज के उत्थान और प्रगति के लिए करना. इस ट्रस्ट ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़, टाटा मेमोरियल सेंटर, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च जैसे कई अग्रणी संस्थानों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. ये संस्थान आज भी अनगिनत जीवनों को सकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहे हैं और समाज को एक उज्जवल भविष्य की दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं. खेल हमेशा से टाटा की राष्ट्र-निर्माण की सोच का महत्वपूर्ण आधार रहे हैं. जमशेदपुर (तत्कालीन साकची) में स्टील वर्क्स की स्थापना के दौरान जमशेदजी नसरवानजी टाटा ने अपने पुत्र दोराब को विशेष रूप से यह निर्देश दिया था कि “फ़ुटबॉल, हॉकी और पार्कों के लिए पर्याप्त भूमि सुरक्षित रखी जाए.” पिता के इस दूरदर्शी सोच को आगे बढ़ाते हुए, सर दोराबजी टाटा ने कंपनी की संस्कृति में खेलों को गहराई से समाहित किया और उन्हें सामूहिक जीवन तथा प्रगति का अनिवार्य अंग बना दिया. (नीचे भी पढ़े)
भारतीय टीम को ओलंपिक में प्रतिस्पर्धा करते देखने की प्रबल इच्छा से प्रेरित होकर, और उस समय कोई आधिकारिक भारतीय ओलंपिक संगठन न होने के कारण, सर दोराबजी ने 1920 के एंटवर्प ओलंपिक खेलों के लिए भारत की पहली ओलंपिक टीम को स्वयं वित्तपोषित किया और चयन समिति की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उनकी 166वीं जयंती पर हम सर दोराबजी टाटा को न केवल एक सफल उद्योगपति, बल्कि एक सच्चे राष्ट्र-निर्माता और दूरदर्शी पथप्रदर्शक के रूप में नमन करते हैं. उन्होंने अपने संकल्प, करुणा और दूरदृष्टि से भारत के उज्जवल भविष्य की मज़बूत नींव रखी. उनकी जीवनगाथा हमें यह सिखाती है कि असली नायक प्रायः मंच की चमक से दूर रहकर, चुपचाप और निःस्वार्थ भाव से ऐसे कार्य करते हैं जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर कल का मार्ग प्रशस्त करते हैं.



