जमशेदपुर : टाटा स्टील कंपनी की स्थापना वर्ष 1907 में हुई. इसके बाद से लगातार वेतन बढ़ोत्तरी होती रही है. लेकिन बाद में चलकर भारत सरकार ने स्टील कंपनियों का वेतन तय करने के लिए नेशनल ज्वाइंट कमेटी फॉर स्टील इंडस्ट्री (एनजेसीएस) का गठन कर दिया था. अखिल भारतीय स्तर पर इसका सारा कुछ तय होता था और फिर टाटा स्टील में लागू हो जाता था. टाटा स्टील नेशनल ज्वाइंट कमेटी फॉर स्टील इंडस्ट्री (एनजेसीएस) से वर्ष 2006 के वेतन समझौते के दौरान आधिकारिक तौर पर अलग हुआ था. भारतीय इस्पात क्षेत्र में टाटा स्टील का एनजेसीएस से अलग होना एक बेहद बड़ा और ऐतिहासिक कदम माना जाता है. (नीचे भी पढ़ें)

एनजेसीएस मुख्य रूप से सेल और अन्य सार्वजनिक क्षेत्र पीएसयू के स्टील प्लांटों के लिए वेतनमान तय करती है. टाटा स्टील ने अपनी अलग कार्यप्रणाली, निजी क्षेत्र की चुनौतियों और अपने कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए 2007 में पहली बार स्वतंत्र रूप से वेतन समझौता किया था. उस वक्त टाटा वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष रघुनाथ पांडेय थे. एनजेसीएस से बाहर होकर 5 साल का वेतन समझौता हुआ था. टाटा स्टील प्रबंधन और टाटा वर्कर्स यूनियन ने मिलकर आपसी सहमति से यह फैसला लिया था. तब से लेकर वर्तमान (2026) तक कंपनी अपने वेतन समझौते सीधे यूनियन के साथ द्विपक्षीय वार्ता के जरिए तय करती है. (नीचे भी पढ़ें)
टाटा स्टील व टाटा वर्कर्स यूनियन ने संयुक्त रूप से एनजेसीएस से अलग होने का फैसला लिया था. इसकी मुख्य वजह सेल समेत अन्य कंपनियों के ढांचे में टाटा स्टील का फिट बैठना नहीं था. सेल में एलटीसी समेत अन्य सुविधाओं के लिए जिस तरह के मापदंड हैं, टाटा स्टील उससे बेहतर सुविधा पहले से दे रही थी. वहां वर्कर और सुपरवाइजर का ग्रेड ही नहीं है, जबकि यहां है. वहां सुपरवाइजर को आफिसर की केटेगरी में रखा जाता है. यदि यहां ऐसा किया जाता तो करीब हजारों सुपरवाइजरों को वे सुविधाएं नहीं मिलतीं जो मिल रही हैं. इस पर बाकायदा यूनियन की सहमति थी. टाटा स्टील में वेतन समझौतों के इतिहास पर नजर डालें तो एमजीबी में लगातार गिरावट दर्ज की गई है, जिसे अब कंपनी प्रबंधन एक परंपरा मानकर चल रहा है. इसके तहत 1997 से 2006 के लिए एनजेसीएस में 10 वर्ष का वेतन समझौता हुआ था, जिसमें कर्मचारियों को 20 प्रतिशत एमजीबी मिला था. (नीचे भी पढ़ें)
इसके बाद टाटा स्टील ने पहली बार स्वतंत्र तौर पर वेज रिवीजन समझौता पांच साल का किया था, जो 2007 से 2012 तक प्रभावी था. उस वक्त पूर्व यूनियन अध्यक्ष रघुनाथ पांडेय के कार्यकाल में यह बढ़कर 21 प्रतिशत हुआ था. इसके बाद वर्ष 2012 से 2018 तक का 6 वर्ष के लिए वेज रिवीजन समझौता हुआ था. उस वक्त यूनियन अध्यक्ष पीएन सिंह ने कर्मचारियों को 18.25 प्रतिशत एमजीबी दिलाया था. उसके बाद वर्ष 2019 से 2024 का 7 वर्ष के लिए वेज रिवीजन समझौता हआ था. उस वक्त यूनियन अध्यक्ष आर रवि प्रसाद थे. श्री प्रसाद के कार्यकाल में सबसे बड़ा झटका लगा और एमजीबी गिरकर महज 12.75 प्रतिशत रह गया. यानी सीधे 5.5% की गिरावट आई. इस बार ग्रेड रिवीजन में ओल्ड सीरीज का ग्रेड रिवीजन में एमजीबी 10 फीसदी रहा जबकि एनएस ग्रेड का एमजीबी 12.75 फीसदी रहा. सात साल का समझौता हुआ है.







