
जमशेदपुर : टाटा स्टील के एमडी टीवी नरेंद्रन ने लीडरशिप पर यूनियन नेताओं को दो टूक बातें कहीं है. उन्होंने लीडरशिप के बारे में विस्तृत तौर पर जानकारी देते हुए यूनियन के अध्यक्ष संजीव चौधरी टुन्नु समेत अन्य नेताओं को बताया है कि लीडरशिप का मतलब सिर्फ माला पहनकर घुमा जाये, यह नहीं होता है, बल्कि लीडरशिप को भविष्य को देखते हुए कड़े फैसले लेने पपड़ते है. इसके लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए. श्री नरेंद्रन सोमवार को यूनाइटेड क्लब में टाटा वर्कर्स यूनियन के नये कमेटी मेंबरों के स्वागत और ट्रेनिंग कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे. यह तीन दिवसीय ट्रेनिंग कार्यक्रम का नाम ”आगमन” रखा गया है. इसका उदघाटन विधिवत तौर पर टाटा स्टील के एमडी टीवी नरेंद्रन ने किया. इस मौके पर टाटा वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष संजीव चौधरी टुन्नु, महामंत्री सतीश सिंह, डिप्टी प्रेसिडेंट शैलेश सिंह समेत तमाम पदाधिकारी मौजूद थे. तीन दिन तक 214 कमेटी मेंबरों को यहां बताया जायेगा कि कंपनी को कैसे आगे ले जाना है और किस तरह यूनियन और प्रबंधन का समन्वय काम करता है. सस्टेनेबिलिटी, फ्यूचर रेडी, सेफ्टी, एथिक्स, रुल्स, रेगुलेशन, सस्टेनेबिलिटी, एटिलिटी समेत अन्य बिंदूओं पर सारे कमेटी मेंबरों को यह ट्रेनिंग दी जा रही है. इसके उदघाटन के मौके पर टाटा स्टील के एमडी टीवी नरेंद्रन ने कहा कि आने वाले समय में चुनौतियां काफी ज्यादा है. वर्ष 2030 तक कंपनी को अपना भविष्य तय कर लेना है क्योंकि माइंस को लेकर दिक्कतें होगी जबकि कई सारी चुनौतियां होगी. इसको लेकर यूनियन लीडरशिप को भी टफ फैसले लेने के लिए तैयार रहना चाहिए ताकि बेहतर फैसला लिया जा सके. इस दौरान उन्होंने यह भी बताया कि वर्ल्ड क्लास प्रोडक्टिविटी (उत्पादकता) को करना है, जिसके लिए यूनियन को आगे आना होगा. गौरतलब है कि टाटा स्टील में अभी प्रोडक्टिविटी 700 से कुछ ऊपर है यानी 700 टन प्रति कर्मचारी प्रति वर्ष का उत्पादन करते है जबकि वर्ल्ड क्लास रैंकिंग 1400 टन प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष का उत्पादन का है जबकि टाटा स्टील के ही कलिंगानगर प्लांट में 1200 टन प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष के हिसाब से उत्पादकता है. यहीं वजह है कि कंपनी अपनी उत्पादकता को बढ़ाना चाहती है. टाटा स्टील के एमडी ने साफ तौर पर कहा कि आने वाली चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए अगर सौ साल पहले से लेकर आज तक मैनेजमेंट और यूनियन कड़े फैसले नहीं लेती तो ऐसी स्थिति नहीं होती, जैसी आज है. इस कारण लीडरशिप को कई सारे लोकलुभावन फैसले के अलावा टफ फैसले भी लेना पड़ता है, जो लीडरशिप की असल पहचान भी है.






