
संतोष वर्मा
चाईबासा : प्रतिवर्ष 4 अप्रैल को तांतनगर प्रखंड के इलीगाढ़ा गांव में शहीद गंगाराम कालुंडिया का शहादत दिवस श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। गंगाराम कालुंडिया ईचा-खरकई बहुद्देशीय बांध परियोजना के खिलाफ आंदोलन के प्रणेता थे। 1980 के दशक में उन्होंने इस डैम के विरोध में सशस्त्र आंदोलन का बिगुल बजाया था। इसमें बड़ी संख्या में डूब क्षेत्र के ग्रामीणों ने भी भाग लिया था। गंगाराम कालुंडिया में गजब की सांगठनिक क्षमता थी। साथ ही अदम्य साहस भी। वह आर्मी का जवान भी रह चुका था। 1971 के भारत-पाक युद्ध में असाधारण पराक्रम दिखाने के लिए उनको तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी के हाथों वीरता पुरस्कार से नवाजा गया था। इसी वजह से उनको सेना में सिपाही से सूबेदार पद पर प्रोन्नति भी दी गई थी। लेकिन जिस गंगाराम कालुंडिया को देश के दुश्मन भी मार नहीं पाए उसे अपने ही देश की पुलिस ने बेरहमी मार दिया।

गंगाराम कालुंडिया को मारने के लिए बनी थी स्पेशल टास्क फोर्स
आर्मी से सेवानिवृत्ति के बाद जब गंगाराम कालुंडिया अपने गांव इलीगाढ़ा आए तो देखा कि ईचा गांव में डैम बनाने का काम चल रहा है। सौ से अधिक गांवों के ग्रामीण विस्थापित हो रहे थे। उनके लिए ना तो पुनर्वास की कोई व्यवस्था थी और ना ही मुआवजा दिया जा रहा था। कई गांवों को विस्थापन का नोटिस थमा दिया गया था। यह सब देखकर आर्मी मैन गंगाराम कालुंडिया का खून खौल उठा। उन्होंने हर हाल में डैम का विरोध करने की ठानी। इसके उन्होंने ग्रामीणोइलाकों को डैम के विरोध में गोलबंद किया और सशस्त्र आंदोलन का बिगुल बजा दिया। आंदोलनकारियों ने गंगाराम कालुंडिया की अगुवाई में कार्यस्थल पर धावा बोल दिया। डैम निर्माण में जुटे कामगारों व इंजीनियरों पर भेलुवा तेल से हमला कर दिया गया। आंदोलनकारी पारंपरिक हथियारों से भी लैस थे। अचानक हुए इस हमले से अफरा-तफरी मच गई। सारे कामगार भाग खड़े हुए। यह 1980 के दशक की शुरुआत की घटना है। इस घटना ने पहली बार गंगाराम कालुंडिया को ना केवल सुर्खियों में ला दिया बल्कि वे सीधे बिहार सरकार की निगाह में आ गये। अब गंगाराम का टकराव सीधे बिहार सरकार से होना तय था। हुआ भी वही। डैम निर्माण रुक जाने से सरकार भी हिल गई थी। फिर गंगाराम कालुंडिया के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए। बावजूद गंगाराम कालुंडिया निडर होकर जल, जंगल व जमीन की लड़ाई जारी रखे हुए थे। डैम निर्माण रुकने से आंदोलन और तेज हुआ। डर से निर्माण स्थल पर कोई कामगार भी नहीं आना चाह रहा था। स्थिति विकट थी। आंदोलनकारियों के हौसले बुलंद थे। डैम निर्माण ठप हो गया। गांव-गांव में आंदोलनकारियों की डैम विरोधी बैठकें होने लगी। डैम निर्माण से जुड़े लोगों में गंगाराम कालुंडिया का खौफ था। इसी बीच 4 अप्रैल 1982 का वह वक्त भी जब बिहार मिलिट्री पुलिस पूरे लाव-लश्कर के साथ उनके गांव में दाखिल हुई। उसकी गिरफ्तारी के लिए स्पेशल टास्क फोर्स बनाई गई थी। नौ छोटे ट्रक व दो जीप में भरकर पुलिस 4 अप्रैल की अहले सुबह चार बजे इलीगाढ़ा पहुंची। गंगाराम को उसके ही घर से गिरफ्तार कर लिया गया। तब उसकी पत्नी विरंग कुई भी थी। उसी की आंखों के सामने गंगाराम कालुंडिया के दाएं पैर में गोली मारी गई। तब तक आसपास के लोग भी आ गये। लेकिन पुलिस को देखकर विरोध की हिम्मत किसी की नहीं हुई। पत्नी विरंग कुई का कहना है कि डर से वह भी भाग गई थी। फिर गंगाराम को पुलिस चाईबासा ले गई। इस दौरान आंदोलनकारियों ने तुईबाना गांव में गंगाराम को छुड़ाने के लिए फोर्स पर तीर से हमला भी किया गया था। लेकिन फायरिंग करते हुए आगे निकल गई। 5 मार्च की सुबह उसका शव चाईबासा के अमलाटोला स्थित पोस्टमार्टम हाऊस के बाहर लावारिश हालत में पाया गया। उसके शरीर पर बर्बर तरीके से हत्या किये जाने के निशान पाये गये थे। फिर इलीगाढ़ा के ग्रामीण बैलगाड़ी में शव लादकर खुद ही खींचकर ले गये। फिर गांव में हो रीति से उसकी अंत्येष्टि की गई। इसके बाद डूब क्षेत्र के सैकड़ों गांवों के ग्रामीणों ने उनको शहीद घोषित कल दिया। इसी के बाद उनका शहादत दिवस मनाने की अटूट परंपरा शुरू हुई।







