
जमशेदपुर : तखत श्री हरमंदिर जी पटना साहिब प्रबंधन कमेटी के महासचिव सरदार इंद्रजीत सिंह ने कहा कि गुरमुख सिंह मुखे के आरोप निराधार हैं, तर्कहीन है और सच्चाई से कोसों दूर है. जत्थेदार ज्ञानी सिंह, रंजीत सिंह गौहर ए मसकीन ने गुरमुख सिंह एवं सेंट्रल गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के संबंध में जो फैसला लिया है, वह पंथिक परंपरा, इतिहास, विरासत, दृष्टांत के मद्देनजर लिया होगा. तखत श्री हरमंदिर जी पटना साहिब प्रबंधन कमेटी तख्त के प्रबंधन तक सीमित रहती है. पंथ से जुड़े धार्मिक एवं सामाजिक मामलों में जत्थेदार पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं और वह कोई भी फैसला लेते हैं, उस फैसले में प्रबंधन कमेटी की कोई भूमिका नहीं होती है. जत्थेदार के फैसले पर सवाल उठाने की सिख पंथ में कोई मिसाल नहीं है. पूर्वी भारत के राज्यों में रहने वाले सिखों के पंथिक एवं सामाजिक मामलों में फैसले लेने का शीर्ष अधिकार तख्त श्री हरमंदिर साहिब पटना के जत्थेदार सिंह साहब को है. वह नादान और मन्मुख सिख होगा जो श्री अकाल तख्त का हवाला देकर इसे चुनौती देगा. हर सच्चा सिख जत्थेदार साहब के आदेश को शिरोधार्य करता है और उसका अनुपालन करता है किंतु परंतु नहीं करता है. रही बात गुरमुख सिंह से तो व्यक्तिगत कोई विवाद नहीं है. सभी लोग गुरमुख सिंह और मेरी तथा शिकायत ले जाने वाले गुरुचरण सिंह बिल्ला की बिरादरी के बारे में जानते हैं. इंद्रजीत सिंह के अनुसार उन्होंने सीजीपीसी में अपने कार्यकाल में गुरमुख सिंह को स्कूली स्पोर्ट्स कराने की जिम्मेवारी सौंपी थी किंतु वे असफल हुए थे. हम एक दूसरे के परिवार के दुख-सुख में शामिल होते रहे हैं. गुरमुख सिंह के परिवार पर और उनके घर पर हमला हुआ तो मैं और मेरी टीम उनके घर गये थे और उनके साथ हम लोग डटे रहे थे. जब एक दूसरे के परिवार के गम एवं खुशी में शामिल होते हैं तो फिर मुझे गुरचरण सिंह बिल्ला की पैरवी करने और गुरमुख सिंह के खिलाफ प्रभाव का इस्तेमाल करने की मुझे जरूरत क्या है. गुरचरण सिंह बिल्ला मुझसे पूछकर शिकायत करने तख्त श्री हरमंदिर साहिब पटना एवं श्री अकाल तख्त अमृतसर नहीं गया था. गुरमुख सिंह एवं गुरचरण सिंह बिल्ला का जो मामला है, वह पूरी तरह से फौजदारी मामला है, आपराधिक मामला है और ऐसे में पंथ के हित में जो उचित होना चाहिए उसे देखते हुए जत्थेदार सिंह ने फैसला किया होगा. इंदरजीत सिंह ने कहा है कि वे गुरमुख सिंह को सलाह देते है कि वह जमशेदपुर में पंथ की चढ़दी कला के लिए इसे प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाने की बजाए समाज की मजबूती का फैसला माने.






