संतोष कुमार : अलग राज्य बनने के बाद विगत 23 वर्षों में झारखंड राज्य ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. राज्य की जनता इन 23 वर्षों में निर्दलीय मुख्यमंत्री से लेकर डबल इंजन वाली सरकार के मुख्यमंत्री तक का शासन देखा है तो झारखंड अलग राज्य के आंदोलन से लेकर कभी डोमिसाइल तो कभी सरना बिल को लेकर राज्य की राजनीति में उबाल आते भी देखा है. कभी बाहरी-भीतरी के नाम पर सियासत गर्म हुई है तो कभी ‘आबुआ राज’ की मांग को लेकर भी सियासत तेज हुई है. कभी बंद लिफाफे के राज को लेकर राजनीति हुई तो कभी ईडी-सीबीआइ की कार्रवाई को लेकर भी खूब राजनीति गरमाई. (नीचे भी पढ़ें)
कई अन्य मुद्दों को लेकर भी राज्य को अस्थिर करने की कोशिश होती रही. किन्तु इन सियासी दांवपेंचों की बिसात पर मोहरा यहां की जनता को बनना पड़ा. कभी डोमिसाइल की आग ने कुतुबमीनार वाले बाबा को सत्ता से बेदखल कराया तो कभी भ्रष्टाचार की आग ने मधु में कड़वाहट भर दी. बड़े तामझाम से सत्ता पर काबिज हुई डबल इंजिन की सरकार को पत्थलगड़ी की आग ने डिरेल कर दिया. अब फिलहाल आबुआ राज के नारे के साथ बनी सरकार में झारखंड एक बार फिर सुलग रहा है. (नीचे भी पढ़ें)
अभी खतियानी नियोजन नीति को लेकर एक बार फिर राज्य में घमासान मचा हुआ है तो वहीं सरना बिल को लेकर भी खूब सियासत हो रही है. राज्य की वर्तमान सरकार ने इन दोनों मुद्दों को केंद्र के पाले में डाल कर सियासी लाभ उठाने की चाल तो चली, मगर राज्यपाल द्वारा दोनों ही विधेयकों को बैरंग लौटा दिये जाने के कारण सकार को जो का झटका लगा है. आबुआ राज की सरकार को अब अपनों से ही चुनौती मिल रही है. (नीचे भी पढ़ें)
कभी बाहरी-भीतरी के नाम पर सियासत करने वालों को आज अपनों, यानी आदिवासी-मूलवासियों का ही कोपभाजन बनना पड़ रहा है. आज आदिवासी एवं मूलवासी दोनों ही अपने हक के लिए आमने-सामने हैं. खुद को मूलवासी बताने वाले कुड़मी 1932 के खतियान आधारित नियोजन नीति और खुद को एसटी का दर्जा दिये जाने की मांग को लेकर आंदोलित हैं तो वहीं आदिवसी इसे अपने अधिकारों का हनन बताते हुए इसके खिलाफ सरकार से दो-दो हाथ करने की तैयारी में हैं.(नीचे भी पढ़ें)
सरायकेला खरसावां जिले के चांडिल में रविवार को जो नजारा दिखा, उससे साफ हो गया कि प्रदेश एक बार फिर आग के ढेर पर खड़ा है. हालांकि इस बार इस आग में कोई बाहरी नहीं, बल्कि आदिवासी-मूलवासी ही इसकी चपेट में आनेवाले हैं और इसके लिए जिम्मेवार यहां की सियासी पार्टियां होंगी. बताते चलें कि यह आग उन्हीं सियासी दलों की देन है, जिसकी ज्वाला में आज 23 साल बाद भी राज्य जल रहा है. चांडिल में रविवार को आयोजित आदिवासियों की जनाक्रोश रैली की झलकियां एवं उसमें शामिल आदिवसी नेताओं के बयान सुनिये तो सोचने पर मजबूर होंगे कि क्या राज्य में एक और आंदोलन की चिंगारी नहीं सुलग रही है?(नीचे भी पढ़ें)
यूं देखें तो राज्य में सत्तारूढ़ रही हर सरकार ने यहां की साढ़े तीन करोड़ जनता को ठगने का काम ही किया है. अगर ऐसा नहीं होता तो आज डोमिसाइल के नाम पर राज्य को जलाने वाले चुप क्यों बैठे हैं. पत्थलगड़ी के नाम पर राज्य को अशांत करनेवाले आज कहां छुपे बैठे हैं. अबुआ दिशुम- अबुआ राज का नारा देनेवाले क्या कर रहे हैं. उनका राज कौन लूट रहा है. क्या बाहरी उन्हें परेशान कर रहे हैं? राज्य के आदिवासी- मूलवासियों के रहन-सहन, पहनावा, शिक्षा-दीक्षा में जो बदलाव हुए हैं उनके पीछे यहां की सियासत की नहीं, बल्कि बाहरी आबोहवा है, जिसकी वजह से आदिवासी- मूलवासी आज के दौर में हाइटेक हो रहे हैं. (नीचे भी पढ़ें)
जरूरत है सियासी लोगों को सबक सिखाकर आपसी सौहार्द से राज्य के विकास में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने की. क्योंकि झारखंड गरीब राज्य नहीं है. इसकी कोख में पूरे देश की अमीरी छिपी है. सियासी लोग यहां की साढ़े तीन करोड़ जनता को आपस में लड़ा कर इसकी कोख को खोखला बना रहे हैं. समय रहते इसपर लगाम नहीं लगी तो बाद में पछताने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा.



