जमशेदपुर : करीब दो दशक तक सिंहभूम की राजनीति में दबदबा रखने वाले विजय सिंह सोय की पुण्यतिथि गुरुवार को मनायी गयी. करीब 25 साल पहले विजय सिंह सोय की गोली मारकर हत्या कर दिया गया था. उस वक्त वे लोकसभा चुनाव हारने के बाद चंद माह के बाद 10 अप्रैल 2000 को चक्रधरपुर की भीड़ भरी बाटा रोड पर अत्याधुनिक हथियारों से अंधाधुंध गोली चलाते हुए अपराधियों ने विजय सिंह सोय की हत्या कर दी थी. इसके बाद से राजनीति ने सिंहभूम में करवट ली और विजय सिंह सोय के युग का समय समाप्त हो गया. विजय सिंह सोय की पूरे सिंहभूम (सरायकेला खरसावां और पश्चिम सिंहभूम जिला) में तूती बोलती थी. दबंग विजय सिंह सोय ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत खरसावां विधानसभा क्षेत्र से बतौर निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव जीतकर की थी. चुनाव जीतने के कुछ दिनों पश्चात ही विजय सिंह सोय ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली थी. (नीचे भी पढ़ें)
इससे पूर्व स्वर्गीय सोय ने मात्र 22 वर्ष की उम्र में 1978 में खरसावां क्षेत्र में आतंक के पर्याय बने चिंतामणि महंथी के विरुद्ध बिगुल फूंका था. 1982 में छोटे भाई सूर सिंह सोय की चाईबासा में हत्या के बाद कायनाइट किंग के नाम से विख्यात चिंतामणि महंथी के गुंडों के विरुद्ध युवकों को गोलबंद कर विजय सिंह सोय ने सीधी कार्रवाई शुरू कर दी. इस दौरान अपराधियों के उन्मूलन का भी अभियान चलाया। पातर हेम्ब्रम, मो गनी, जाम्बिरा पूर्ति, मेघू प्रधान, दिलीप प्रधान, सुखलाल सोय, सोमाय गागराई, सालुका पाडे़या समेत अन्य कई चर्चित नाम भी विजय सिंह सोय के कभी मारक दास्ते के सदस्य रहे. समय गुजरने के साथ-साथ फेहरिस्त से कई नाम जुड़ते -हटते रहे. सन 1982-1983 में चिंतामणि महंथी गिरोह के पांच लोगों की टोकलो में हत्या के मामले में विजय सिंह सोय ने सुर्खियां हासिल की थी. इस दौरान क्षेत्र के आदिवासियों के मध्य विजय सिंह सोय की छवि राबिनहुड सरीखी बन चुकी थी. 1985 का विधानसभा चुनाव उन्होंने इसी लोकप्रियता के बल पर खरसावां से जीता था. 1985 में विधायक चुने जाने के पश्चात विजय सिंह सोय ने आदिवासी समाज में व्याप्त कुरीतियों की ओर ध्यान केन्द्रित किया. (नीचे भी पढ़ें)
नशे के घोर विरोधी विजय सिंह सोय ने हाट-बाजारों एवं विभिन्न मेलों में बिकने वाली हड़िया एवं देशी शराब की बिक्री रोकने हेतु अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया. 1990 में कांग्रेस के टिकट पर दूसरी बार श्री सोय विधायक चुने गए. 1991 में सिंहभूम संसदीय क्षेत्र से बतौर कांग्रेस प्रत्याशी चुनाव लड़े. पर्चा दाखिल करने के दिन झामुमो प्रत्याशी कृष्णा मार्डी एवं सोय समर्थकों के मध्य चाईबासा की सड़कों पर जबर्दस्त संघर्ष हुआ. सड़कों पर खुलेआम फायरिंग के पश्चात कृष्णा मार्डी व विजय सिंह सोय को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. कृष्णा मार्डी ने इस चुनाव में विजय सिंह सोय को परास्त किया. 1995 में तीसरी बार विधायक बनने की ख्वाहिश लिए विजय सिंह सोय पुन: खरसावां विधानसभा क्षेत्र से चुनावी मैदान में उतरे. झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा उनके विरुद्ध लगभग गुमनाम रहे अर्जुन मुंडा को टिकट दिया गया. अर्जुन मुंडा ने भारी उलटफेर करते हुए विजय सिंह सोय को पहली बार पराजय का स्वाद चखाया. 1998 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी विजय सिंह सोय ने भाजपा के चित्रसेन सिंकू को पराजित कर पिछली हार का बदला ले लिया. 1999 में चक्रधरपुर के विधायक लक्ष्मण गिलुवा ने रिकार्ड मतों के अंतर से विजय सिंह सोय को पराजित किया.



