रांची: झारखंड हाई कोर्ट ने हजारीबाग और बोकारो में कोल परियोजनाओं के विस्थापितों को बिना मुआवजा हटाने के खिलाफ दाखिल याचिका पर बुधवार को उनके पक्ष में फैसला सुनाया. सुनवाई के बाद अदालत ने प्रार्थी को राहत प्रदान किया है और अगले आदेश तक उन्हें घर खाली करने पर रोक लगा दी है. जस्टिस राजेश कुमार की अदालत ने एनटीपीसी और सीसीएल दोनों से इस मामले में जवाब मांगा है. वहीं इस संबंध में वासुदेव साव सहित छह अन्य की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है.(नीचे भी पढ़े)
सुनवाई के दौरान प्रार्थियों के वकील श्रेष्ठ गौतम और हिमांशु हर्ष ने पक्ष रखा. उन्होंने बताया कि कोल बेयरिंग एरिया एक्ट के अनुसार 2009 प्रार्थियों की जमीन का अधिग्रहण किया गया. लेकिन उन्हें न तो मुआवजा मिला और न ही कंपनी ने जमीन पर कब्जा लिया.अब कंपनी उन्हें अचानक जमीन और घर खाली करने का नोटिस दे रही है. वकीलों ने दलील दी कि 2009 के हिसाब से मुआवजा देना सही नहीं है और उन्हें 2025 की कीमतों के अनुसार ही मुआवजा मिलना चाहिए. अदालत ने इस दलील पर गौर करते हुए सुनवाई को सुरक्षित रखते हुए अगले आदेश तक एनटीपीसी को विस्थापितों के घर न तोड़ने का निर्देश दिया है.(नीचे भी पढ़े)
बोकारो में भी सीसीएल ने रैयतों (जमीन मालिकों) को घर हटाने का नोटिस दिया था. वतन महतो के द्वारा इसके खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर किया गया. उनके वकीलों ने बताया कि सीसीएल ने 1984 में ही जमीन का अधिग्रहण कर लिया था, लेकिन अब तक उन्हें मुआवजा नहीं दिया गया है. उन्होंने मांग की कि उन्हें वर्तमान समय के हिसाब से मुआवजा दिया जाए.अदालत ने उनकी दलील स्वीकार कर ली है और सीसीएल से जवाब मांगा है. वहीं अगले आदेश तक उनके घरों को हटाने पर रोक लगा दी है.



