जमशेदपुर : जमशेदपुर के बर्मामाइंस स्थित सीएसआईआर-राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला (एनएमएल) ने बेंगलुरु की मेसर्स सरकुओर प्राइवेट लिमिटेड के साथ खराब हो चुकी लिथियम-आयन बैटरियों के रिसाइक्लिंग के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीक हस्तांतरण करार किया है. इस करार के माध्यम से कंपनी को ऐसी तकनीक उपलब्ध होगी, जिससे इस्तेमाल के बाद खराब हो चुकी लिथियम-आयन बैटरियों से लिथियम, कोबाल्ट, मैंगनीज, निकिल, तांबा, ऐलुमिनियम और ग्रेफाइट जैसे उपयोगी और मूल्यवान पदार्थों को सुरक्षित, वैज्ञानिक और लाभकारी तरीके से निकाला जा सकेगा. यह करार भारत में बैटरी रिसाइक्लिंग, महत्वपूर्ण धातुओं की पुनर्प्राप्ति और परिपत्र अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. मेसर्स सरकुओर प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक श्रीकुमार वाचस्पति ने कहा कि आज के समय में बैटरी रिसाइक्लिंग का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक अयस्क सीमित हैं और दूसरी ओर लिथियम-आयन बैटरियों का उपयोग लगातार बढ़ रहा है. ऐसे में खराब हो चुकी बैटरियों को केवल कचरा मानकर छोड़ देना सही नहीं है, बल्कि यह भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण द्वितीयक संसाधन है. इन्हीं बैटरियों से कई महत्वपूर्ण धातुएं और पदार्थ वापस प्राप्त किए जा सकते हैं. इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मेसर्स सरकुओर प्राइवेट लिमिटेड ने सीएसआईआर-एनएमएल, जमशेदपुर के साथ बैटरी रिसाइक्लिंग तकनीक के हस्तांतरण का करार किया है. इस अवसर पर सीएसआईआर-एनएमएल के निदेशक डॉ. संदीप घोष चौधरी, मुख्य वैज्ञानिक और परियोजना प्रमुख डॉ. मनीष कुमार झा, धातु निष्कर्षण विभाग के प्रमुख डॉ. संजय कुमार, सीएसआईआर-एनएमएल के सीओए जय शंकर शरण और डॉ. अंकुर शर्मा आदि उपस्थित थे. व्यापार प्रमुख डॉ. एस. के. पाल और डॉ. बीना कुमारी ने इस करार को पूरा कराने में सहयोग किया. यह करार प्रयोगशाला में विकसित तकनीक को उद्योग तक पहुंचाने और बैटरी रिसाइक्लिंग को औद्योगिक स्तर पर मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है. आज के समय में मोबाइल फोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रिक वाहन, पावर बैंक, सोलर ऊर्जा भंडारण प्रणाली और बड़े ऊर्जा भंडारण उपकरणों में लिथियम-आयन बैटरियों का बड़े पैमाने पर उपयोग हो रहा है. (नीचे भी पढ़ें)

इन बैटरियों ने आधुनिक जीवन को आसान बनाया है और स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को भी बढ़ावा दिया है. लेकिन जब ये बैटरियां अपनी उपयोग अवधि पूरी कर लेती हैं, तो इनका सुरक्षित और वैज्ञानिक प्रबंधन बहुत जरूरी हो जाता है. यदि इन्हें सामान्य कचरे की तरह छोड़ दिया जाए या असुरक्षित तरीके से तोड़ा जाए, तो यह पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए हानिकारक हो सकता है. खराब हो चुकी लिथियम-आयन बैटरियां केवल बेकार सामग्री नहीं होतीं. इनमें लिथियम, कोबाल्ट, मैंगनीज, निकिल, तांबा, ऐलुमिनियम और ग्रेफाइट जैसे मूल्यवान पदार्थ मौजूद रहते हैं. ये सभी पदार्थ बैटरी उद्योग, इलेक्ट्रिक वाहन, ऊर्जा भंडारण प्रणाली और कई आधुनिक तकनीकी क्षेत्रों के लिए बहुत जरूरी हैं. यदि इन पदार्थों को वैज्ञानिक तरीके से दोबारा प्राप्त किया जाए, तो नई बैटरियों और अन्य औद्योगिक उपयोगों के लिए कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है. इससे प्राकृतिक खनन पर निर्भरता भी कम हो सकती है. वर्तमान समय में दुनिया भर में लिथियम-आयन बैटरी कचरे की मात्रा तेजी से बढ़ रही है. इलेक्ट्रिक वाहनों और पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के बढ़ते उपयोग के कारण आने वाले वर्षों में खराब हो चुकी बैटरियों की संख्या और अधिक बढ़ने की संभावना है इसलिए बैटरी रिसाइक्लिंग अब केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं है, बल्कि यह संसाधन सुरक्षा, औद्योगिक आत्मनिर्भरता और आर्थिक लाभ से भी जुड़ा हुआ विषय बन चुका है. सीएसआईआर-एनएमएल लंबे समय से धातु निष्कर्षण, अपशिष्ट संसाधनों से धातु पुनर्प्राप्ति और बैटरी रिसाइक्लिंग के क्षेत्र में काम कर रहा है. प्रयोगशाला ने ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसके माध्यम से खराब हो चुकी लिथियम-आयन बैटरियों से उपयोगी धातुओं और पदार्थों को अलग किया जा सकता है. इस तकनीक में धातुकर्म की उन्नत प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाता है, जिससे बैटरियों में मौजूद मूल्यवान पदार्थों को नियंत्रित, सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से प्राप्त किया जा सके. (नीचे भी पढ़ें)
इस करार में डॉ. मनीष कुमार झा और उनकी टीम की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. डॉ. मनीष कुमार झा, मुख्य वैज्ञानिक और परियोजना प्रमुख, सीएसआईआर-एनएमएल, लंबे समय से खराब लिथियम-आयन बैटरियों और अन्य द्वितीयक संसाधनों से मूल्यवान धातुओं की वैज्ञानिक रिकवरी पर कार्य कर रहे हैं. उनकी टीम ने ऐसी तकनीकों को विकसित और मजबूत करने में योगदान दिया है, जिनसे बैटरी कचरे में मौजूद धातुओं और उपयोगी पदार्थों को सुरक्षित और प्रभावी तरीके से निकाला जा सके. यह कार्य तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ देश की संसाधन सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए भी उपयोगी है. इस तकनीक के माध्यम से मेसर्स सरकुओर प्राइवेट लिमिटेड खराब हो चुकी लिथियम-आयन बैटरियों का प्रसंस्करण कर सकेगी और उनसे लिथियम, कोबाल्ट, मैंगनीज, निकिल, तांबा, एलुमिनियम और ग्रेफाइट की रिकवरी कर सकेगी. यह तकनीक कंपनी को बैटरी रिसाइक्लिंग को लाभकारी और औद्योगिक रूप से उपयोगी बनाने में मदद करेगी. इससे बैटरी कचरे को सुरक्षित तरीके से संभालने के साथ-साथ उसमें मौजूद मूल्यवान पदार्थों को दोबारा अर्थव्यवस्था में लाया जा सकेगा. भारत के लिए यह तकनीक रणनीतिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है. वर्तमान समय में भारत लिथियम-आयन बैटरियों और उनसे जुड़ी कई महत्वपूर्ण सामग्रियों के लिए काफी हद तक अन्य देशों पर निर्भर है. लिथियम, कोबाल्ट, निकिल, मैंगनीज और ग्रेफाइट जैसी सामग्रियां इलेक्ट्रिक वाहनों, मोबाइल फोन, लैपटॉप और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के लिए बहुत जरूरी हैं. यदि इन सामग्रियों को खराब बैटरियों से वापस प्राप्त किया जा सके, तो इससे देश की आयात निर्भरता कम हो सकती है और घरेलू स्तर पर महत्वपूर्ण पदार्थों की उपलब्धता मजबूत हो सकती है. बैटरी रिसाइक्लिंग से पर्यावरण संरक्षण के साथ आर्थिक लाभ भी मिलता है. खराब बैटरियों में मौजूद धातुओं और ग्रेफाइट को वापस प्राप्त करके उन्हें दोबारा उद्योगों में उपयोग किया जा सकता है. (नीचे भी पढ़ें)
इससे नई धातुओं के खनन की आवश्यकता कम होती है, ऊर्जा और कच्चे माल की बचत होती है और कचरे की मात्रा भी घटती है. इस प्रकार बैटरी रिसाइक्लिंग परिपत्र अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देती है. परिपत्र अर्थव्यवस्था का अर्थ है संसाधनों को अधिक समय तक उपयोग में रखना और कचरे को फिर से उपयोगी सामग्री में बदलना. यह करार संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य 17 यानी साझेदारी के माध्यम से सतत विकास की भावना को भी आगे बढ़ाता है. इसमें अनुसंधान संस्थान और उद्योग मिलकर ऐसी तकनीक को आगे बढ़ा रहे हैं, जो संसाधन सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और औद्योगिक विकास में सहायक हो सकती है. लिथियम-आयन बैटरियों का सुरक्षित संग्रह, परिवहन, भंडारण और प्रसंस्करण भी बहुत जरूरी है. खराब बैटरियों को सामान्य कचरे में नहीं फेंकना चाहिए. इन्हें अधिकृत संग्रह केंद्रों या बैटरी रिसाइक्लिंग एजेंसियों तक पहुंचाया जाना चाहिए. यदि खराब बैटरियां सही चैनल से रिसाइक्लिंग प्लांट तक पहुंचेंगी, तभी उनमें मौजूद मूल्यवान पदार्थों को सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से वापस प्राप्त किया जा सकेगा. सीएसआईआर-एनएमएल द्वारा विकसित तकनीक इस दिशा में एक मजबूत वैज्ञानिक आधार देती है. प्रयोगशाला की विशेषज्ञता और उद्योग की कार्य क्षमता मिलकर इस तकनीक को व्यावहारिक रूप दे सकती है. मेसर्स सरकुओर प्राइवेट लिमिटेड प्राइवेट लिमिटेड के साथ हुआ यह करार इसी सहयोग को आगे बढ़ाने का प्रयास है. इससे न केवल खराब लिथियम-आयन बैटरियों का सुरक्षित प्रबंधन होगा, बल्कि महत्वपूर्ण धातुओं और पदार्थों की घरेलू उपलब्धता भी बढ़ेगी. कुल मिलाकर, सीएसआईआर-एनएमएल और मेसर्स सरकुओर प्राइवेट लिमिटेड के बीच हुआ यह करार भारत में बैटरी रिसाइक्लिंग के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल है. इससे खराब लिथियम-आयन बैटरियों से लिथियम, कोबाल्ट, मैंगनीज, निकिल, तांबा, ऐलुमिनियम और ग्रेफाइट की रिकवरी में मदद मिलेगी। साथ ही, सुरक्षित रिसाइक्लिंग व्यवस्था, महत्वपूर्ण पदार्थों की उपलब्धता, पर्यावरण संरक्षण, औद्योगिक विकास और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को भी बढ़ावा मिलेगा. सही तकनीक, बेहतर संग्रह व्यवस्था और उद्योगों के सहयोग से भारत बैटरी रिसाइक्लिंग के क्षेत्र में मजबूत कदम आगे बढ़ा सकता है.







