जमशेदपुर : जमशेदपुर के लेखन एवं कवि वरुण कुमार ने बलिदान दिवस पर वजीर रामसिंह पठानिया के बारे में विशेष बाते बताई है. उन्होंने बताया है कि भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल 1857 से शुरू हुआ आंदोलन नहीं था. अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध देश के अलग-अलग हिस्सों में इससे पहले भी अनेक वीरों ने विद्रोह का बिगुल बजाया था. हिमाचल प्रदेश की नूरपुर रियासत के वजीर रामसिंह पठानिया ऐसे ही अदम्य साहस और स्वाभिमान के प्रतीक थे, जिन्होंने 1848 में ही अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती दे दी थी. उनका संघर्ष उस समय हुआ, जब देश के अधिकांश हिस्सों में ब्रिटिश शासन लगातार अपना विस्तार कर रहा था. रामसिंह ने न केवल अपनी रियासत की स्वाधीनता के लिए हथियार उठाए, बल्कि आसपास के राजाओं और योद्धाओं में भी स्वतंत्रता की चेतना जगाई. वजीर रामसिंह पठानिया का जन्म 1824 में नूरपुर क्षेत्र में वजीर शामसिंह और इन्दौरी देवी के घर हुआ था. वे ऐसे परिवार में पले-बढ़े, जहां शौर्य, स्वाभिमान और मातृभूमि के प्रति निष्ठा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था. पिता के निधन के बाद वर्ष 1848 में रामसिंह ने नूरपुर रियासत के वजीर का पद संभाला. समय नूरपुर के राजा वीरसिंह का निधन हो चुका था और उनके पुत्र जसवन्त सिंह की आयु मात्र दस वर्ष थी. अंग्रेजों ने नाबालिग होने का बहाना बनाकर जसवन्त सिंह को वास्तविक रूप से राजा मानने से इनकार कर दिया. इसके बदले उनके लिए 20 हजार रुपये वार्षिक पेंशन निर्धारित कर दी गई. यह निर्णय रामसिंह पठानिया के स्वाभिमान को स्वीकार नहीं था. उनके लिए यह केवल एक राजपरिवार का प्रश्न नहीं, बल्कि अपनी मातृभूमि की संप्रभुता का प्रश्न था. रामसिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष की तैयारी शुरू कर दी. उन्होंने जम्मू से मनहास, जसवां से जसरोटिये, अपने क्षेत्र से पठानिये तथा कटोच राजपूतों को संगठित किया. पंजाब से सरनाचन्द लगभग 500 हरिचन्द राजपूतों के साथ उनके अभियान में शामिल हुए. 14 अगस्त 1848 की रात अंग्रेजों के अधिकार वाले शाहपुर कण्डी दुर्ग पर हमला किया गया. संघर्ष अत्यंत भीषण था. भारतीय वीरों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए अंग्रेजी सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया. अगले दिन, 15 अगस्त को रामसिंह पठानिया ने दुर्ग पर अपना झंडा फहरा दिया. (नीचे भी पढ़ें)

यह विजय केवल एक किले पर अधिकार की घटना नहीं थी. रामसिंह ने ढोल पिटवाकर मुनादी कराई कि नूरपुर रियासत से अंग्रेजी शासन समाप्त हो चुका है. उन्होंने स्पष्ट घोषणा की कि जसवन्त सिंह ही नूरपुर के राजा हैं और वे उनके वजीर के रूप में रियासत की रक्षा करेंगे. इस घोषणा ने आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों में नई ऊर्जा पैदा कर दी. अनेक शासक और योद्धा अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़े हुए. अंग्रेज इस चुनौती को लंबे समय तक सहन करने वाले नहीं थे. उन्होंने अतिरिक्त सैनिक और रसद जुटाकर शाहपुर कण्डी दुर्ग पर फिर हमला किया. हथियारों और संसाधनों की कमी के कारण रामसिंह को दुर्ग छोड़ना पड़ा, लेकिन उन्होंने संघर्ष समाप्त नहीं किया।वे पंजाब के रास्ते गुजरात पहुंचे और वहां से लगभग एक हजार सिख सैनिकों तथा आवश्यक रसद की सहायता लेकर वापस लौटे. इस सैन्य सहायता के बल पर उन्होंने दोबारा शाहपुर कण्डी दुर्ग पर अधिकार कर लिया. अंग्रेजी सेना को पीछे हटकर पठानकोट की ओर जाना पड़ा. रामसिंह की इस सफलता का व्यापक प्रभाव पड़ा. जसवां, दातारपुर, कांगड़ा और ऊना के शासकों ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता की घोषणा कर दी. ब्रिटिश सत्ता के लिए यह गंभीर चुनौती थी. अंग्रेजों ने अब और बड़ी सैन्य शक्ति जुटाई. कोलकाता से अतिरिक्त सैनिक बुलाए गए और रामसिंह के विरुद्ध अभियान तेज कर दिया गया. भारी सैन्य दबाव के कारण उन्हें फिर दुर्ग छोड़ना पड़ा. लेकिन उनके भीतर स्वतंत्रता की ज्वाला बुझी नहीं. ‘डल्ले की धार’ में निर्णायक संघर्ष रामसिंह ने राजा शेरसिंह के लगभग 500 वीर सैनिकों की सहायता से ‘डल्ले की धार’ पर मोर्चा संभाला. (नीचे भी पढ़ें)
अंग्रेजी सेना ने ‘कुमणी दे बैल’ में अपना डेरा डाला. इसके बाद मुकेसर और मरीकोट के जंगलों में कई स्थानों पर भीषण युद्ध हुए।रामसिंह पठानिया की वीरता इन संघर्षों में असाधारण थी. लोककथाओं में उनकी प्रसिद्ध तलवार ‘चण्डी’ का विशेष उल्लेख मिलता है. कहा जाता है कि यह तलवार अत्यंत भारी थी और रामसिंह उसे लेकर युद्धभूमि में जिस दिशा में बढ़ते, अंग्रेज सैनिकों में भय फैल जाता. उनके नेतृत्व और साहस ने ब्रिटिश सेना को परेशान कर दिया. संघर्ष की गंभीरता को देखते हुए अंग्रेजों ने और सैनिक भेजे. ब्रिगेडियर व्हीलर के नेतृत्व में अतिरिक्त सैन्य दल मैदान में उतारा गया. अब रामसिंह चारों ओर से घिर चुके थे. लोकप्रचलित वीरगाथाओं के अनुसार ब्रिटिश पक्ष का अधिकारी जॉन पील रामसिंह को पकड़कर पुरस्कार प्राप्त करना चाहता था. वह स्वयं उन्हें पकड़ने आगे बढ़ा, लेकिन युद्ध में रामसिंह की तलवार के वार से मारा गया. इस घटना ने अंग्रेजों के बीच उनके प्रति भय और बढ़ा दिया. प्रत्यक्ष युद्ध में रामसिंह को पराजित करना अंग्रेजों के लिए कठिन साबित हो रहा था. अंततः अंग्रेजों ने षड्यंत्र का सहारा लिया. एक संघर्ष में घायल रामसिंह को कई अंग्रेज सैनिकों ने मिलकर पकड़ लिया. उन पर ब्रिटिश सैन्य अदालत में मुकदमा चलाया गया. उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और दूर समुद्र पार सिंगापुर भेज दिया गया. बाद में उन्हें रंगून की जेल में स्थानांतरित किया गया. विदेशी धरती की जेल में बंद यह वीर अपने जीवन के अंतिम दिनों में भी अपनी मातृभूमि को नहीं भूला. स्वतंत्रता की आकांक्षा और अपने देश के प्रति प्रेम उनके भीतर अंत तक जीवित रहा. (नीचे भी पढ़ें)
17 अगस्त 1849 को रंगून की जेल में उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए. रामसिंह पठानिया का संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रारंभिक अध्यायों में विशेष स्थान रखता है. उन्होंने उस समय अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध हथियार उठाए, जब ब्रिटिश सत्ता अपनी सैन्य और राजनीतिक शक्ति के बल पर भारतीय रियासतों को अपने अधीन करने में लगी थी. उनका संघर्ष केवल नूरपुर के राजपरिवार की सत्ता बचाने तक सीमित नहीं था. उन्होंने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने के बजाय स्वाभिमान और स्वतंत्रता का रास्ता चुना. यही कारण है कि उनका नाम आज भी हिमाचल की वीर परंपरा में सम्मान से लिया जाता है. ‘डल्ले की धार’ पर लगा शिलालेख उनके बलिदान की स्मृति को जीवित रखता है. नूरपुर क्षेत्र में उनकी वीरगाथा लोकगीतों में ‘रामसिंह पठानिया की वार’ के नाम से गाई जाती है. लोकस्मृति में जीवित यह गाथा बताती है कि स्वतंत्रता की चेतना भारत के जन-जन में कितनी गहरी थी. 17 अगस्त को उनके बलिदान दिवस पर रामसिंह पठानिया को याद करना केवल इतिहास के एक वीर योद्धा को श्रद्धांजलि देना नहीं है. यह उस स्वाभिमान को नमन करना है, जिसने विदेशी सत्ता के सामने झुकने से इनकार किया. उन्होंने दिखाया कि स्वतंत्रता की लड़ाई बड़े संसाधनों से नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प, साहस और मातृभूमि के प्रति अटूट निष्ठा से लड़ी जाती है. रामसिंह पठानिया का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश देता है कि अन्याय और पराधीनता के सामने मौन रहना विकल्प नहीं है. उनका बलिदान हिमाचल की धरती ही नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता-संग्राम की उस व्यापक परंपरा का हिस्सा है, जिसमें असंख्य ज्ञात-अज्ञात वीरों ने अपनी मातृभूमि के लिए सर्वस्व अर्पित किया.




