जमशेदपुर : टाटा स्टील के कर्मचारियों के वेतन पुनरीक्षण में नए इंक्रीमेंट की डिजाइन से उत्पन्न बंचिंग और उसके बाद की डी-बंचिंग का गणितीय पहलू सामने आया है. इसका अध्ययन टाटा स्टील के फील्ड मेंटेनेंस मैकेनिकल के कमेटी मेंबर शैलेन्द्र कुमार ने किया है. उन्होंने इसको लेकर अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष संजीव चौधरी टुन्नु को सौंपी है. इसमें कहा गया है कि यह किसी एक ग्रेड का मामला नहीं है. पुराने इंक्रीमेंट 710 रुपये, 725 रुपये, 740 रुपये, 770 रुपये, 790 रुपये और 810 रुपये संशोधित होकर क्रमशः 1,050 रुपये, 1,065 रुपये, 1,080 रुपये, 1,110 रुपये, 1,130 रुपये और 1,150 रुपये हुए हैं. हर मामले में इंक्रीमेंट 340 रुपये बढ़ा. पुराने इंक्रीमेंट के नए इंक्रीमेंट का लगभग 68 फीसदी होने के कारण गणितीय रूप से लगभग हर तीसरे पुराने स्टेप पर बंचिंग होती है. यह डिजाइन का परिणाम है. रिपोर्ट में बताया गया है कि एनएस 7 को केवल उदाहरण के रूप में लिया गया है. यहां 10वां स्टेप 30,595 रुपये और 11वां स्टेप 31,305 रुपये था- अंतर 710 रुपये, यानी एक पुराना इंक्रीमेंट है. फिटमेंट के बाद दोनों स्टेप एक ही संशोधित 1,050 रुपये स्टेप पर आ गए. अब डी-बंचिंग का प्रश्न है. जनवरी से दिसंबर 2024 तक कर्मचारियों को एक्स1-वाइ1 से एक्स 12-वाइ 12 तक देखें. प्रत्येक महीने वाइ, एक्स से केवल 710 रुपये आगे था. लेकिन 31 दिसंबर 2024 को मूल वेतन एक संशोधित स्थिति में निर्धारित हुआ और एक्स 1-एक्स 12 की अगली इंक्रीमेंट तिथि 1 जनवरी 2026 कर दी गई. कमेटी मेंबर शैलेंद्र ने बताया है कि नए और पुराने इंक्रीमेंट का अंतर 340 रुपये है. (नीचे भी पढ़ें)
डी-बंचिंग में इसका प्रभाव महीने के अनुसार बदलता है. जनवरी वाले मामले में 12/12 गुणा 340 रुपये = 340 रुपये , जबकि दिसंबर वाले मामले में 1/12 गुणा 340 रुपये = 28.33 रुपये है. उन्होंने कहा कि अब सवाल है कि यदि बंचिंग इंक्रीमेंट डिजाइन का गणितीय परिणाम है, तो डी-बंचिंग का प्रभाव उस महीने के आधार पर अलग-अलग क्यों हो, जिसमें कर्मचारी पुराने स्टेप पर पहुंचा था? बताया जाता है कि यह डी-बंचिंग नियम 1978 से लागू है. लेकिन तब से वेतन संरचना बदली है. वर्तमान पुनरीक्षण में न्यूनतम गारंटीकृत लाभ पहली बार दो हिस्सों में दिया गया है. ऐसे में पुराने नियम की समीक्षा कर उसे वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप बनाना क्यों संभव नहीं होना चाहिए? इसका संचयी प्रभाव महत्वपूर्ण है. वर्ष के शुरुआती महीनों में आने वाले कर्मचारी क्रमिक पुनरीक्षणों में अधिक प्रभाव झेल सकते हैं. यदि व्यवस्था वही रही, तो अगली वेतन पुनरीक्षण प्रक्रिया में इसका प्रभाव और व्यापक हो सकता है. बंचिंग यदि डिजाइन का परिणाम है, तो उसे डी-बंचिंग के माध्यम से कर्मचारी के लिए नुकसान का कारण नहीं बनना चाहिए. शैलेन्द्र कुमार ने मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा कर इसे अधिक तर्कसंगत, समानतापूर्ण और वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप बनाने की आवश्यकता बताई है.




